संस्कृति और समझदारी
जिज्ञासा एक समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी। उसे अपनी भारतीय संस्कृति, सादगी और पारंपरिक कपड़े बहुत पसंद थे।
जब उसका परिवार कई साल पहले विदेश चला गया था, तब जिज्ञासा छोटी थी। लेकिन उसकी पढ़ाई के लिए उसे भारत में ही दादा-दादी के पास छोड़ दिया गया।
दादा-दादी के साथ रहते हुए उसने भारतीय संस्कार, परंपराएं, त्योहार और सादा जीवन बहुत करीब से देखा और सीखा। सुबह की पूजा, घर का सादा खाना, बड़ों का सम्मान — ये सब उसकी आदत बन गए थे।
उधर उसकी माँ वैशाली और भाभी को वेस्टर्न कपड़े, पार्टियाँ और आधुनिक जीवनशैली पसंद थी। उन्हें फैशन और विदेशी खान-पान में खास दिलचस्पी थी।
कई साल बाद जब जिज्ञासा अपनी पढ़ाई पूरी करके माता-पिता के पास विदेश गई, तब उसे लगा जैसे वह किसी अलग ही दुनिया में आ गई हो…
एक दिन घर में फिर से वेस्टर्न पार्टी की बात चल रही थी।
“जिज्ञासा, इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा,” मां ने कहा, “तुम्हें हमारे साथ पार्टी में चलना ही होगा।”
जिज्ञासा ने धीरे से कहा, “मां, मुझे पार्टी से दिक्कत नहीं है, पर मैं वहां जाकर खुद को बदल नहीं सकती। मैं जैसी हूं, वैसी ही रहना चाहती हूं।”
लेकिन इस बार परिवार के दबाव में उसे जाना पड़ा।
पार्टी की रात...
पार्टी बहुत बड़ी और चमकदार थी। तेज़ म्यूजिक, डांस, रंग-बिरंगी लाइटें और विदेशी खाना। सब लोग छोटे वेस्टर्न कपड़ों में थे।
जिज्ञासा ने सादा लेकिन सभ्य ड्रेस पहनी थी। वह एक कोने में खड़ी सब देख रही थी।
तभी एक विदेशी लड़की उसके पास आई और बोली,
“हेलो, लेट्स एंजॉय अ ड्रिंक टुगेदर।”
जिज्ञासा मुस्कुराई, “नो थैंक यू, आई डोंट ड्रिंक।”
लड़की ने भी मुस्कुराकर कहा, “ओके, नो प्रॉब्लम।”
दूर खड़े उसके पिता निलेश यह सब देख रहे थे।
उन्होंने आकर थोड़ा गुस्से में कहा, “तुम थोड़ी मिल-जुल कर नहीं रह सकती? हमारी इज्जत का सवाल है।”
जिज्ञासा ने शांत आवाज़ में कहा, “पापा, किसी के साथ सम्मान से बात करना और अपनी आदतें बदलना — ये दो अलग बातें हैं। मैं किसी की बेइज्जती नहीं कर रही, बस खुद जैसी हूं वैसी रहना चाहती हूं।”
निलेश चुप हो गए, लेकिन उनके मन में नाराज़गी थी।
भारत वापसी...
कुछ महीनों बाद निलेश का ट्रांसफर वापस भारत हो गया। यह खबर सुनकर पूरा परिवार अपने पुराने घर लौट आया। घर में दोबारा रौनक आ गई थी।
जिज्ञासा सबसे ज्यादा खुश थी। उसके मन में एक सुकून था।
उसने मन ही मन सोचा,
“अब मैं अपने तरीके से जी सकूंगी, अपनी पसंद के कपड़े पहन सकूंगी और अपनी संस्कृति को खुलकर अपना सकूंगी।”
लेकिन भारत आने के बाद भी उसकी मां वैशाली और भाभी ने अपना वेस्टर्न स्टाइल नहीं छोड़ा। वे पहले की तरह ही छोटे और मॉडर्न कपड़े पहनती रहीं। मोहल्ले के लोग उन्हें देखकर आपस में बातें करने लगे।
एक दिन पड़ोस की एक आंटी ने हल्के से मुस्कुराते हुए वैशाली से कहा,
“बहन जी, यहां का माहौल थोड़ा अलग है। लोग यहां पारंपरिक तरीके से रहना पसंद करते हैं।”
वैशाली को यह बात सुनकर अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा जैसे कोई उनकी आलोचना कर रहा हो। लेकिन उसी पल उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि हर जगह की अपनी संस्कृति और अपना वातावरण होता है, और उसी के अनुसार चलना ही समझदारी होती है।
खाने की मेज़ पर बहस...
एक दिन फिर डाइनिंग टेबल पर पिज़्ज़ा और पास्ता रखा हुआ था। सब लोग बड़े शौक से खाने लगे, लेकिन जिज्ञासा चुपचाप बैठी रही।
कुछ देर बाद उसने शांत आवाज़ में कहा,
“मां, क्या हम कभी-कभी घर का सादा खाना भी बना सकते हैं? दाल-चावल, रोटी, सब्ज़ी… सब मिलकर खाएँगे तो अच्छा लगेगा। घर जैसा स्वाद भी मिलेगा और अपनापन भी महसूस होगा।”
उसकी बात में शिकायत कम और अपनापन ज़्यादा था।
इस बार निलेश ने गुस्सा नहीं किया। उन्होंने बेटी के चेहरे की तरफ देखा और कुछ पल सोचा। फिर नरम स्वर में बोले,
“तुम ठीक कह रही हो, बेटा। कल से हफ्ते में दो दिन घर का सादा खाना बनेगा। सब मिलकर खाएँगे।”
जिज्ञासा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
धीरे-धीरे परिवार को समझ आने लगा कि जिज्ञासा किसी आधुनिक चीज़ के खिलाफ नहीं है। वह बस अपनी पसंद, अपनी पहचान और अपने संस्कारों को संजोकर रखना चाहती है। उसे बदलाव से परेशानी नहीं थी, लेकिन अपनी जड़ों से दूर होना उसे मंजूर नहीं था।
शादी की बात...
एक दिन शाम को निलेश ने जिज्ञासा को अपने पास बैठाया। उनकी आवाज़ गंभीर थी।
“जिज्ञासा,” उन्होंने कहा, “मेरा एक विदेशी दोस्त है। उसका बेटा बहुत अच्छा और पढ़ा-लिखा है। मैं सोच रहा था कि अगर तुम चाहो तो तुम्हारी शादी उससे कर दी जाए।”
जिज्ञासा कुछ पल चुप रही। उसने अपने पापा की ओर सम्मान से देखा और धीरे से बोली,
“पापा, मैं आपकी हर बात का सम्मान करती हूं। लेकिन शादी मेरे जीवन का सबसे बड़ा फैसला है। मैं चाहती हूं कि मेरी शादी ऐसे परिवार में हो जहाँ मेरे संस्कार, मेरी सोच और मेरी पहचान को समझा और स्वीकार किया जाए। मैं किसी भारतीय परिवार में शादी करना चाहती हूं, जहाँ मैं खुद जैसी हूं, वैसी ही रह सकूं।”
उसकी आवाज़ में न जिद थी, न गुस्सा — सिर्फ सच्चाई और विनम्रता थी।
निलेश कुछ देर तक चुप रहे। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने हमेशा अपनी सोच को सही माना, लेकिन कभी अपनी बेटी के दिल की बात ठीक से नहीं सुनी। आज पहली बार उन्होंने उसकी भावनाओं को समझने की कोशिश की।
उन्होंने गहरी सांस ली और प्यार से कहा,
“ठीक है बेटा। अगर यही तुम्हारी इच्छा है, तो इस बार फैसला तुम्हारा होगा। तुम्हारी खुशी से बढ़कर मेरे लिए कुछ भी नहीं है।”
यह सुनते ही जिज्ञासा की आंखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर अपने पापा का हाथ थाम लिया।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि उसके पापा ने सच में उसे समझा है।
अंतिम संदेश:
समय के साथ पूरे परिवार को एक गहरी बात समझ में आ गई —
संस्कृति केवल कपड़ों, भाषा या खाने से नहीं बनती,
संस्कृति हमारी सोच, हमारे संस्कार और दूसरों के प्रति सम्मान से बनती है।
वेस्टर्न हो या इंडियन, सही-गलत का फैसला पहनावे से नहीं होता।
असली मायने यह रखते हैं कि हम अपनी पहचान को सम्मान दें
और साथ ही दूसरों की पसंद और जीवन-शैली को भी स्वीकार करें।
जिज्ञासा ने अपने परिवार को यह सिखा दिया कि —
आधुनिक बनना बुरा नहीं है,
लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों और मूल्यों को भूल जाना भी जरूरी नहीं है।
इंसान वही सबसे अच्छा होता है
जो नए को अपनाए,
पर अपने संस्कारों को भी सहेज कर रखे।

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