दिखावे की चमक और रिश्तों की सच्चाई
रीना की विदाई के समय उसकी माँ उसे गले लगाकर रो रही थीं।
“बेटी, ससुराल में सबका दिल जीत लेना… और अगर कभी मुश्किल आए तो याद रखना, हम हमेशा तेरे साथ हैं।”
रीना आँसू पोंछकर मुस्कुरा दी। उसे लग रहा था कि वह बहुत खुशकिस्मत है। उसका ससुराल बहुत अमीर था, बड़े-बड़े ब्रांडेड कपड़े, बड़ी-बड़ी बातें, समाज में नाम और इज्जत।
उसे क्या पता था कि उस चमक के पीछे एक खालीपन छुपा है।
पहली रात की बेचैनी...
ससुराल पहुँचते ही रीना का भव्य स्वागत हुआ। दरवाज़े पर आरती उतारी गई, फूलों की खुशबू पूरे आँगन में फैल गई और रिश्तेदारों की मुस्कानें जैसे उसे अपना बनाने को बेताब थीं। हर कोई सजा-धजा था — महँगी साड़ियाँ, चमकते सूट, ऊँची हील्स और तेज़ परफ्यूम की खुशबू। रीना को लगा, सचमुच वह किसी बड़े और खुशहाल घर में आई है।
लेकिन जैसे ही मेहमान एक-एक करके जाने लगे और घर का दरवाज़ा बंद हुआ, माहौल अचानक बदल गया। उसकी सास ने अपनी भारी साड़ी उतारकर पुरानी, फीकी साड़ी पहन ली। ससुर जी ने कोट-पैंट हटाकर बनियान डाल ली। कुछ ही पलों में घर की सारी चमक जैसे उतर गई।
रीना ने खुद को समझाया —
“शायद घर में आराम से रहने के लिए ऐसे कपड़े पहनते होंगे…”
पर अगली सुबह जब वह नई साड़ी पहनकर नीचे आई, तो उसकी नजर सास की साड़ी की फटी हुई किनारी पर पड़ी। ससुर जी पुराने बनियान में अख़बार पढ़ रहे थे। वह कुछ पल उन्हें देखती रही। उसके मन में हल्की-सी उलझन उठी, जैसे कोई सवाल धीरे-धीरे सिर उठा रहा हो।
तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।
जो अगले पाँच मिनट में हुआ, वह रीना को भीतर तक हिला गया।
सास-ससुर जल्दी-जल्दी अपने कमरे में गए और कुछ ही देर में वापस लौटे — फिर से वही महंगे, चमकदार, ब्रांडेड कपड़ों में सजे हुए। चेहरे पर बनावटी मुस्कान, चाल में आत्मविश्वास, जैसे कुछ बदला ही न हो।
रीना वहीं खड़ी रह गई।
उसका दिल एकदम धक से रह गया।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में कुछ ऐसा है, जो सामने दिखता है… लेकिन सच शायद कुछ और है।
सच की पहली चोट...
एक दिन दूधवाला आया।
वह दरवाज़े पर खड़ा होकर कहने लगा—
“भैया, छह महीने से पैसे नहीं मिले… अब तो मेरी भी मजबूरी है।”
रीना के कानों में जैसे कोई तेज़ आवाज़ गूँज गई हो।
छह महीने से बकाया…?
वह धीरे-धीरे अंदर गई। उसके ससुर जी ने कहा,
“अगले हफ्ते आ जाना, अभी पैसा नहीं है।”
लेकिन रीना समझ गई—घर में पैसे की कमी है।
उस रात वह चुपचाप अपने कमरे में बैठी, आँखों से आँसू बहते रहे।
रवि ने धीरे से पूछा,
“क्या हुआ, रीना?”
रीना की आवाज़ कांप रही थी,
“मुझसे सच्चाई क्यों छुपाई? क्या मैं इतनी पराई हूँ कि मुझे भी नहीं बताया?”
रवि ने शर्मिंदा होकर नजरें झुका लीं।
“पापा चाहते हैं कि समाज में हमारी इज्जत बनी रहे… लोग हमें अमीर समझें। बस यही चाहत है।”
रीना की आँखों से फिर आँसू बह निकले।
“लेकिन झूठ की नींव पर बनी इज्जत…
कब तक टिकेगी?”
अपमान का दिन...
कुछ महीनों बाद रीना की छोटी बहन की शादी थी।
ससुराल वाले फिर से मॉल से भारी छूट वाले ब्रांडेड कपड़े खरीदकर बहुत खुश थे, जैसे किसी बड़ी जंग जीत ली हो।
शादी में वे सभी अपने महंगे-महंगे ब्रांडेड कपड़ों का दिखावा करने लगे।
तभी किसी ने धीरे से उनके कपड़ों के टैग की ओर इशारा किया और हँसी निकाल दी—
“ये नाम तो गलत लिखा है… ये असली ब्रांड नहीं है।”
धीरे-धीरे शादी में मौजूद लोग भी हंसने लगे।
रीना ने देखा कि उसके ससुर की आँखें झुक गईं,
सास का चेहरा पीला पड़ गया,
और रवि चुपचाप खड़ा था।
वह पूरा पल जैसे उनके दिलों पर भारी पत्थर गिर गया हो।
घर लौटते समय गाड़ी में सन्नाटा छाया हुआ था।
रीना ने धीरे-धीरे अपनी सास का हाथ थामा और कहा,
“माँजी… इज्जत कपड़ों से नहीं मिलती। आज लोग हमें देखकर हंसे, लेकिन अगर हम सच्चाई के साथ रहेंगे, तो वही लोग कल हमें असली सम्मान देंगे।”
ससुर जी की आँखें भर आईं। पहली बार उन्होंने नम आँखों से स्वीकार किया,
“बहु… हमने सारी जिंदगी दिखावे में गुजार दी। पर आज समझ आया कि हम खुद से ही कितने दूर हो गए थे।”
रीना ने मुस्कुराते हुए कहा,
“घर में सादगी कोई शर्म की बात नहीं है, लेकिन झूठ और दिखावे में जीना शर्म की बात है।”
उस दिन पहली बार उस घर में कोई ब्रांडेड कपड़े बदलने की जरूरत नहीं पड़ी।
सब साधारण कपड़ों में ही बैठे थे, लेकिन मन हल्का और दिल पूरी तरह सच्चाई के साथ शांत था।
नई शुरुआत...
धीरे-धीरे उन्होंने अपने पुराने कर्ज चुकाने शुरू किए।
दूधवाले को भी बाकी पैसे चुका दिए।
साथ ही, समाज में अब वे सादगी के साथ जाने लगे।
पहले लोग उनके बारे में फुसफुसाते थे।
फिर धीरे-धीरे यह आदत बन गई।
और आखिरकार उन्हें सच में सम्मान मिलने लगा।
एक दिन मोहल्ले में किसी ने कहा —
“इन लोगों में एक सच्चाई है, इसलिए इनकी असली इज्जत है।”
रीना मुस्कुराई।
आज उस घर में ब्रांडेड कपड़ों से ज्यादा भरोसा था,
दिखावे से ज्यादा अपनापन,
और झूठ से ज्यादा सच्चाई।
कहानी की सीख:
> "झूठ की चमक आँखों को भले चकाचौंध कर दे,
लेकिन सच्चाई दिल को सुकून देती है।
और जहाँ सुकून होता है, वहीं असली इज्जत होती है।"

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