रिश्तों का घर
बारिश थम चुकी थी, लेकिन आँगन में अब भी मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली हुई थी। घर के अंदर हल्की-हल्की ठंडक थी, पर माहौल में एक अजीब-सी खामोशी थी।
नेहा रसोई में चुपचाप सब्ज़ी काट रही थी। चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी, लेकिन उसने कभी किसी से कुछ कहा नहीं। तभी उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर “छोटा भाई” लिखा देखकर उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन जैसे ही उसने कॉल उठाई, वो मुस्कान गायब हो गई।
“दीदी… माँ की तबियत बहुत खराब है… डॉक्टर कह रहे हैं कि तुरंत ऑपरेशन करना पड़ेगा… मैं अकेला हूँ… समझ नहीं आ रहा क्या करूँ…” भाई की आवाज़ रोते-रोते भर्रा गई।
नेहा के हाथ से चाकू गिर गया।
“क्या? माँ…!” उसकी आँखों में आँसू भर आए।
वो बिना एक पल गंवाए हॉल में गई, जहाँ उसकी सास, कमला देवी, और ननद पूजा बैठी थीं।
“मम्मी जी… मुझे अभी मायके जाना होगा। माँ की हालत बहुत गंभीर है,” नेहा ने कांपती आवाज़ में कहा।
कमला देवी ने बिना उसकी तरफ देखे ही जवाब दिया, “हर बार मायके जाने का बहाना मिल जाता है तुम्हें।”
नेहा सन्न रह गई।
पूजा ने भी बात आगे बढ़ाई, “भाभी, शादी के बाद लड़की का असली घर ससुराल होता है। मायके की जिम्मेदारियाँ अब भाई की हैं, आपकी नहीं।”
नेहा की आँखों से आँसू बहने लगे, “लेकिन पूजा, वो मेरी माँ है…”
कमला देवी ने तीखे स्वर में कहा, “माँ है तो क्या? अब वो तुम्हारे लिए उतनी जरूरी नहीं जितना ये घर है। कल तेरे ससुर जी के दोस्त आने वाले हैं, उनकी तैयारी कौन करेगा?”
इतने में नेहा का पति, अमित, ऑफिस से घर आया। उसने माहौल देखा और समझ गया कि कुछ ठीक नहीं है।
“क्या हुआ?” उसने नेहा से पूछा।
नेहा कुछ बोल नहीं पाई, बस फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया। अमित ने भाई की बात सुनी और तुरंत बोला, “नेहा, तुम अभी निकलो। मैं यहाँ सब संभाल लूंगा।”
लेकिन कमला देवी गुस्से में बोलीं, “अमित! तुम्हें अपने घर की कोई परवाह है या नहीं? बहू जाएगी तो मेहमानों का क्या होगा?”
अमित ने शांत रहते हुए कहा, “मम्मी, मेहमान बाद में भी आ सकते हैं… लेकिन माँ की जान नहीं।”
कमला देवी कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी उनके फोन की घंटी बजी।
फोन उनके छोटे भाई का था।
“दीदी… मुझे हार्ट अटैक आया है… मैं अस्पताल में हूँ… अगर हो सके तो एक बार आ जाओ…” उधर से धीमी आवाज़ आई।
कमला देवी का चेहरा उतर गया।
उन्होंने तुरंत पूजा की तरफ देखा, “पूजा, जल्दी से बैग पैक कर। हमें अभी जाना होगा।”
पूजा अचानक चुप हो गई।
कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा, “मम्मी… मैं कैसे जाऊँ? आपने ही तो कहा था कि शादी के बाद लड़की का घर ससुराल होता है… और वैसे भी, नानी के जाने के बाद मामा का घर अब आपका मायका तो नहीं रहा…”
कमला देवी के हाथ से फोन लगभग छूट गया।
उनकी ही कही बातें आज उनके सामने खड़ी थीं—सच बनकर।
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
तभी नेहा धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसने अपनी सास के पास जाकर बहुत शांत आवाज़ में कहा—
“मम्मी जी… रिश्ते जगह से नहीं, दिल से जुड़े होते हैं।”
कमला देवी ने उसकी तरफ देखा—आँखों में सवाल और शर्म दोनों थे।
नेहा ने आगे कहा,
“माँ के जाने से मायका खत्म नहीं होता… और शादी के बाद बेटी की जिम्मेदारियाँ खत्म नहीं होतीं।”
“आज आपके भाई को आपकी जरूरत है… और मेरी माँ को मेरी…”
“अगर आज मैं नहीं जाऊँगी, तो कल पूजा भी अपने मायके जाने से पहले सौ बार सोचेगी।”
नेहा की आवाज़ में न कोई गुस्सा था, न शिकायत—बस सच्चाई थी।
कमला देवी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने धीरे से नेहा का हाथ पकड़ा और कहा,
“मुझे माफ कर दे बेटा… मैं रिश्तों का मतलब ही भूल गई थी…”
फिर उन्होंने अमित की तरफ देखा,
“अमित, नेहा को तुरंत उसके मायके छोड़ आओ… और पूजा, तुम मेरे साथ चलो… हमें अपने रिश्तों को निभाना है।”
पूजा भी शर्मिंदा थी। उसने नेहा के पास आकर उसका हाथ पकड़ा,
“भाभी… मुझे माफ कर दीजिए… मैंने बहुत गलत कहा…”
नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“रिश्तों में माफी नहीं, समझ जरूरी होती है…”
कुछ ही देर में घर का माहौल बदल गया।
जहाँ पहले ताने थे, वहाँ अब अपनापन था।
उस रात—
नेहा अपनी माँ के पास अस्पताल में थी,
और कमला देवी अपने भाई के पास।
दूरी थी…
लेकिन दिल पहले से कहीं ज्यादा करीब थे।
सीख :
"मायका सिर्फ माँ या एक घर से नहीं बनता…
बल्कि उन रिश्तों से बनता है, जहाँ प्यार, सम्मान और अपनापन हमेशा जिंदा रहता है।"

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