शक का साया

Emotional Indian family scene where a woman accuses her sister-in-law while family members look shocked in a living room.



सुबह का समय था।


सूरज की हल्की सुनहरी किरणें आंगन में फैल रही थीं। पेड़ों की पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं और चिड़ियों की मीठी आवाज़ के साथ घर में दिन की हलचल शुरू हो चुकी थी।


रसोई में नेहा चाय बना रही थी। उसकी शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। घर में उसके सास-ससुर, पति रोहित,  देवर अमन और बड़ी भाभी संध्या रहते थे।


संध्या इस घर की बड़ी बहू थी। उसका पति दो साल पहले एक हादसे में चल बसा था। उसके बाद भी उसने घर को कभी टूटने नहीं दिया। सबका ख्याल रखती, सबके लिए खाना बनाती और पूरे घर को संभालती थी।


घर में सभी लोग संध्या की बहुत इज्जत करते थे।


लेकिन नेहा के मन में कहीं न कहीं एक कमी थी। वो माँ बनना चाहती थी।


एक दिन नेहा ने रोहित से कहा,


"सुनिए, आप बाजार से प्रेग्नेंसी टेस्ट किट ला दीजिए ना।"


रोहित मुस्कुराकर बोला,

"अरे अभी तो हमारी शादी को ज्यादा समय नहीं हुआ है। फिर भी अगर तुम्हें तसल्ली होगी तो मैं ले आता हूँ।"


रोहित शाम को किट लेकर आ गया।


अगली सुबह नेहा जल्दी उठी। उसने भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की।


"हे भगवान, इस बार मुझे निराश मत करना।"


लेकिन जब उसने टेस्ट किया तो रिपोर्ट नेगेटिव आई।


ये देखकर उसका दिल टूट गया। वो बिस्तर पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगी।


तभी दरवाज़ा खुला और संध्या अंदर आई।


नेहा को रोता देखकर वो समझ गई कि क्या हुआ है।


वो नेहा के पास बैठ गई और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,


"अरे पगली, इतनी जल्दी हिम्मत क्यों हार रही हो? भगवान सबकी सुनते हैं। आज नहीं तो कल इस घर में बच्चे की किलकारी जरूर गूंजेगी।"


नेहा चुप हो गई लेकिन उसके दिल में दर्द बना रहा।



रात की घटना...


दो दिन बाद रात के करीब 12 बजे नेहा की नींद खुली।


उसे बहुत प्यास लगी थी।


उसने देखा कि कमरे में रखा जग खाली है।


वो धीरे-धीरे उठकर किचन की तरफ जाने लगी।


जैसे ही वो किचन के पास पहुंची, उसे अंदर से धीमी आवाजें सुनाई दीं।


वो दरवाज़े के पीछे रुक गई और झांककर देखने लगी।


अंदर संध्या और अमन बात कर रहे थे।


अमन बोला,


"भाभी, मुझे डर लग रहा है। अगर घरवालों को पता चल गया तो क्या होगा?"


संध्या बोली,


"डरने की जरूरत नहीं है अमन। सच कभी न कभी सबके सामने आ ही जाता है।"


नेहा ये सुनकर हैरान रह गई।


उसने मन ही मन सोचा,


"ओह… तो ये बात है। बड़ी भाभी और देवर के बीच कुछ चल रहा है।"


उस रात नेहा को बिल्कुल नींद नहीं आई।



धीरे-धीरे बढ़ता शक...


अगले दिन सुबह का समय था।


घर में रोज़ की तरह हलचल शुरू हो चुकी थी। आंगन में हल्की धूप फैल रही थी और रसोई से चाय और नाश्ते की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।


संध्या रसोई में खड़ी सबके लिए नाश्ता तैयार कर रही थी। तभी अमन रसोई में आया और बोला,


"भाभी, मेरी नीली शर्ट प्रेस हो गई क्या?"


संध्या मुस्कुराते हुए बोली,


"हाँ अमन, मैंने प्रेस करके तुम्हारे कमरे में टेबल पर रख दी है। जाओ, पहन लो।"


अमन सिर हिलाकर अपने कमरे की तरफ चला गया।


थोड़ी देर बाद विश्वनाथ जी रसोई के पास आए और बोले,


"बहू, मेरी खाली पेट खाने वाली दवाइयाँ कहीं मिल नहीं रही हैं। जरा देख तो लेना, वरना फिर तुम ही कहोगी कि मैंने दवाई नहीं खाई।"


संध्या तुरंत अपना काम छोड़कर बोली,


"जी पिताजी, अभी ढूंढकर देती हूँ।"


वह उनके कमरे में गई और थोड़ी ही देर में दवाइयाँ ढूंढकर ले आई।


कुछ देर बाद कल्पना जी ने आवाज लगाई,


"बहू, मेरा चश्मा नहीं मिल रहा। मैं अखबार पढ़ रही थी। जरा ढूंढकर दे देगी क्या?"


संध्या तुरंत हॉल में गई और थोड़ी देर बाद चश्मा ढूंढकर अपनी सास को दे दिया।


यह सब देखकर कल्पना जी मुस्कुराते हुए बोलीं,


"संध्या बहू, तुमने तो पूरे घर को संभाल रखा है। अगर तुम नहीं होती तो पता नहीं हम लोगों का क्या होता। भगवान ऐसी बहू बड़ी किस्मत वालों को देते हैं। हमें तुम पर बहुत गर्व है।"


घर के सभी लोग यह सुनकर मुस्कुरा रहे थे।


लेकिन नेहा चुपचाप यह सब देख रही थी।


उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान जरूर थी, लेकिन मन ही मन वह सोच रही थी,


"अगर इन सबको सच्चाई पता चल जाए, तो पता नहीं उस दिन क्या होगा।"



अस्पताल की घटना...


कुछ दिन बाद नेहा और रोहित डॉक्टर के पास गए।


डॉक्टर से जांच करवाने के बाद जब वे दोनों केबिन से बाहर आए, तो रोहित ने नेहा से कहा,


“नेहा, तुम यहीं इस बेंच पर बैठो। मैं दवाइयाँ लेकर आता हूँ।”


ऐसा कहकर रोहित मेडिकल स्टोर की तरफ चला गया।


नेहा वहीं बेंच पर बैठकर इधर-उधर देखने लगी। तभी उसकी नजर सामने की ओर गई।


उसने देखा कि संध्या और अमन अस्पताल के कॉरिडोर से बाहर आते हुए दिखाई दे रहे थे। उनके हाथ में कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स थीं।


नेहा तुरंत उठकर पास के दरवाजे के पीछे खड़ी हो गई और चुपचाप उनकी बातें सुनने लगी।


अमन मुस्कुराते हुए संध्या से कह रहा था,


“भाभी, जैसा हम सोच रहे थे वैसा कुछ भी नहीं है। सब कुछ बिल्कुल नॉर्मल है। यह बहुत अच्छी बात है।”


संध्या ने राहत की सांस लेते हुए कहा,


“हाँ अमन, सच में भगवान का शुक्र है।”


दोनों बातें करते हुए आगे बढ़ गए।


लेकिन उनकी बातें सुनकर नेहा के मन में फिर से शक पैदा हो गया।


वह मन ही मन सोचने लगी,


“हे भगवान… कहीं भाभी प्रेग्नेंट तो नहीं हैं?”



सच सामने आता है....


कुछ दिनों बाद घर में पूजा रखी गई।


उस दिन घर में काफी रौनक थी। आंगन में फूलों की सजावट की गई थी और हॉल में सभी लोग एक साथ बैठे हुए थे। पूजा की तैयारी चल रही थी।


तभी बुआजी ने सबकी तरफ देखते हुए कहा,

“इस बार पूजा में कलश स्थापना बड़ी बहू संध्या करेगी।”


यह सुनते ही नेहा से रहा नहीं गया। उसके मन में पहले से ही शक भरा हुआ था।


वह अचानक गुस्से में खड़ी हो गई और तेज आवाज में बोली,

“नहीं! ये पूजा में नहीं बैठ सकती।”


नेहा की बात सुनकर सभी लोग हैरान रह गए। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया।


रोहित ने हैरानी से नेहा की तरफ देखा और कहा,

“नेहा, ये तुम क्या कह रही हो? तुम्हें होश है?”


नेहा ने गुस्से में अपना मोबाइल निकालते हुए कहा,

“हाँ, मुझे पूरा होश है। आप सब जिसे इस घर की इज्जत समझते हैं, वही इस घर की इज्जत के साथ खेल रही है। इनका अमन के साथ रिश्ता है।”


ये सुनते ही संध्या के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे और वह वहीं खड़ी-खड़ी रोने लगी।


तभी अमन आगे आया। उसके चेहरे पर नाराज़गी भी थी और दुख भी।


उसने शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा,

“भाभी, आपने बहुत बड़ी गलतफहमी पाल ली है। सच जाने बिना इतना बड़ा आरोप लगा दिया।”


फिर उसने सबको सच्चाई बताई।


“असल में मैं अपनी गर्लफ्रेंड रीमा से शादी करना चाहता हूँ। हम दोनों कॉलेज के समय से एक-दूसरे से प्यार करते हैं। लेकिन रीमा का परिवार बहुत गरीब है। इसलिए मुझे डर लग रहा था कि घर वाले हमारे रिश्ते को स्वीकार करेंगे या नहीं।”


“इस बात की जानकारी सिर्फ संध्या भाभी को थी। वही मेरी मदद कर रही थीं और मुझे समझा रही थीं कि सच बताने से ही सब ठीक होगा।”


इसके बाद अमन ने अस्पताल की रिपोर्ट सबके सामने रखी।


जब सबने ध्यान से रिपोर्ट देखी तो उस पर किसी और लड़की का नाम लिखा था।


अमन बोला,

“ये रिपोर्ट रीमा की बड़ी बहन की है। उस दिन हम उसके साथ अस्पताल गए थे क्योंकि उसे डर लग रहा था। भाभी सिर्फ हमारी मदद करने के लिए हमारे साथ गई थीं।”


अब नेहा को अपनी गलती समझ में आने लगी।


उसे एहसास हुआ कि उसने बिना सच जाने कितना बड़ा आरोप लगा दिया।


उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह तुरंत संध्या के पास गई और उनके पैरों में गिर पड़ी।


रोते हुए बोली,

“भाभी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने बिना सच जाने आप पर इतना बड़ा इल्जाम लगा दिया। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”


संध्या ने तुरंत नेहा को उठाया और उसे गले से लगा लिया।


फिर प्यार से बोली,

“गलती हर इंसान से होती है। लेकिन जो अपनी गलती मान लेता है, वही सच्चा और अच्छा इंसान होता है।”


ये सुनकर घर के सभी लोग भावुक हो गए। उस दिन नेहा को समझ में आ गया कि शक हमेशा रिश्तों को तोड़ता है, और विश्वास ही रिश्तों को जोड़कर रखता है।



कहानी का संदेश:


उस दिन के बाद नेहा ने एक बात सीख ली —


शक रिश्तों को तोड़ देता है,

लेकिन विश्वास रिश्तों को हमेशा जोड़कर रखता है।


और सच ही कहा गया है —


रिश्तों को बचाने के लिए प्यार चाहिए,

शक नहीं।





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