सच्चे दिल की कीमत
दिन की शुरुआत हो चुकी थी।
सूरज धीरे-धीरे आसमान में ऊपर उठ रहा था और गांव की गलियों में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। दूर मंदिर की घंटी की आवाज सुनाई दे रही थी और खेतों की तरफ जाने वाले लोगों की हलचल शुरू हो चुकी थी।
मोहन अपने छोटे से घर के बाहर खड़ा आसमान की तरफ देख रहा था, जबकि अंदर रसोई में उसकी पत्नी चाय बना रही थी और उबलती चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
मोहन अपने घर का सबसे छोटा बेटा था। उसके दो बड़े भाई थे – राजेश और दिनेश।
तीनों भाइयों के माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं थे। जब माता-पिता की तबीयत खराब रहने लगी थी तब राजेश और दिनेश शहर जाकर अपना काम शुरू कर चुके थे।
घर की देखभाल और माता-पिता की सेवा की जिम्मेदारी मोहन के ऊपर ही आ गई थी।
मोहन ने कभी शिकायत नहीं की। उसने अपने सपनों को छोड़कर माता-पिता की सेवा की।
जब माता-पिता का देहांत हुआ तब तक राजेश और दिनेश शहर में अच्छा कारोबार जमा चुके थे।
मोहन गांव में ही रह गया। वह पास के गांव में एक छोटी सी नौकरी करने लगा और पुराने घर में अपनी पत्नी सुनीता के साथ रहने लगा।
मोहन हमेशा अपने भाइयों का बहुत सम्मान करता था।
एक दिन अचानक मोहन के पास उसके बड़े भाई राजेश का फोन आया।
राजेश ने पूछा,
“मोहन, कैसे हो?”
मोहन ने आदर से जवाब दिया,
“मैं ठीक हूँ भैया। आप सुनाइए, सब ठीक है ना?”
राजेश ने थोड़ा रुककर कहा,
“मोहन, तुम्हें एक जरूरी बात बतानी थी। पिताजी की शहर में एक पुरानी जमीन है। कई सालों से उस पर किसी का ध्यान नहीं है। अगर हम उस जमीन को ठीक करवा दें तो उसकी अच्छी कीमत मिल सकती है।”
मोहन ने तुरंत कहा,
“भैया, आप जैसा ठीक समझें वैसा कर लेते हैं।”
तब राजेश ने कहा,
“मेरा विचार है कि तुम कुछ समय के लिए शहर जाकर वहां रहो और जमीन की देखभाल करो। अगर सब ठीक से हो गया तो हम तीनों भाइयों को फायदा होगा।”
मोहन अपने बड़े भाई की बहुत इज्जत करता था, इसलिए उसने बिना ज्यादा सोचे तुरंत हाँ कर दी।
मोहन अपनी पत्नी के साथ शहर चला गया।
वह उस जमीन के पास ही एक छोटा-सा कमरा किराये पर लेकर रहने लगा। कुछ ही दिनों में उसने वहां एक छोटी नौकरी भी ढूंढ ली, ताकि घर का खर्च चल सके।
जिस जमीन की देखभाल के लिए वह आया था, उसकी हालत बहुत खराब थी। चारों तरफ ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ उग आई थीं और चारदीवारी कई जगह से टूट चुकी थी। जगह इतनी उजड़ी हुई लगती थी कि मानो वर्षों से किसी ने उसकी तरफ ध्यान ही न दिया हो।
मोहन ने हिम्मत नहीं हारी। उसने धीरे-धीरे उस जमीन को ठीक करवाना शुरू किया। छुट्टी के दिनों में वह खुद भी मजदूरों के साथ लगकर झाड़ियाँ साफ करवाता और टूटी दीवारों की मरम्मत कराता।
दिन-रात की मेहनत के बाद जमीन पूरी तरह साफ हो गई। उसने नई चारदीवारी भी बनवा दी, जिससे जगह अब सुरक्षित और साफ-सुथरी दिखने लगी।
कुछ ही महीनों में उस जमीन की सूरत बदल गई। अब वह पहले जैसी उजड़ी हुई नहीं लगती थी। आसपास के लोग भी उसकी तारीफ करने लगे और देखते-ही-देखते उस जमीन की कीमत भी काफी बढ़ गई।
लालच शुरू हुआ...
जब राजेश और दिनेश को यह पता चला कि उस जमीन की कीमत अब पहले से काफी ज्यादा बढ़ गई है, तो उनके मन में लालच पैदा हो गया।
दोनों ने सोचा कि अगर इस जमीन को अभी बेच दिया जाए, तो उन्हें बहुत अच्छा पैसा मिल सकता है।
इसी सोच के साथ दोनों शहर पहुँच गए और जमीन बेचने के लिए दलालों और खरीदारों से मिलने लगे।
उधर मोहन को इन बातों की ज्यादा जानकारी नहीं थी। वह तो अपने दोनों भाइयों पर पूरा भरोसा करता था और यही सोचता था कि वे जो भी करेंगे, परिवार की भलाई के लिए ही करेंगे।
जमीन बिक गई...
कुछ दिनों की बातचीत और मोलभाव के बाद आखिरकार जमीन का सौदा तय हो गया।
वह जमीन पूरे पचास लाख रुपये में बिक गई।
मोहन ने बिना किसी शक के सभी कागज़ों पर साइन कर दिए, क्योंकि उसे अपने दोनों भाइयों पर पूरा भरोसा था। उसे विश्वास था कि उसके भाई उसके साथ कभी गलत नहीं करेंगे।
सौदा पूरा होने के बाद तीनों भाई साथ में अपने शहर लौट आए। उस समय मोहन को जरा भी अंदाज़ा नहीं था कि आगे चलकर यही जमीन उनके रिश्तों की असली परीक्षा बनने वाली है।
धोखा...
एक दिन राजेश ने मोहन को घर बुलाया।
राजेश ने मोहन को दस लाख रुपये देते हुए कहा –
“ये लो मोहन, तुम्हारा हिस्सा।”
मोहन हैरान होकर बोला –
“भैया, मुझे तो किसी ने बताया कि जमीन पचास लाख में बिकी है। तो मेरे हिस्से में तो सोलह-सत्रह लाख आने चाहिए थे।”
यह सुनकर दोनों भाई थोड़े घबरा गये।
दिनेश बोला –
“नहीं मोहन, जमीन सिर्फ तीस लाख में बिकी है।”
मोहन कुछ देर चुप रहा।
फिर वह धीरे से बोला –
“अगर ऐसा है तो ये पैसे भी आप ही रख लीजिये। मुझे आपकी खुशी ज्यादा जरूरी लगती है।”
यह कहकर मोहन वहां से चला गया।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे बहुत दुख हुआ था, लेकिन उसने अपने भाइयों से कुछ नहीं कहा।
सच्चाई का एहसास...
जब मोहन वहां से चला गया तो घर में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। तभी राजेश की पत्नी सीमा को बहुत गुस्सा आया और उसने दोनों भाइयों को डांटना शुरू कर दिया।
सीमा गुस्से में बोली —
“आप लोगों को जरा भी शर्म नहीं आई? जिस भाई ने अपने सपनों को छोड़कर माँ-बाप की सेवा की, आज आप उसी के साथ धोखा कर रहे हैं। अगर उस समय मोहन माता-पिता की जिम्मेदारी न उठाता, तो क्या आप लोग आज इतना पैसा कमा पाते?”
यह सुनकर राजेश और दिनेश दोनों चुप हो गए।
तभी दिनेश की पत्नी भी बोल पड़ी —
“और देखिए, मोहन कितना सीधा है। अगर वह चाहता तो इस मामले को अदालत तक ले जा सकता था और आप दोनों को बड़ी परेशानी में डाल सकता था। लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वह आज भी आप दोनों का सम्मान करता है।”
पत्नी की बातें सुनकर दोनों भाइयों का सिर शर्म से झुक गया।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि लालच में आकर उन्होंने अपने ही छोटे भाई के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर दिया है।
पछतावा...
कई दिनों तक दोनों भाइयों को बिल्कुल भी चैन नहीं मिला।
उन्हें बार-बार मोहन का भोला स्वभाव और उसका अपने भाइयों के प्रति सम्मान याद आता रहा। उन्हें यह सोचकर शर्म महसूस होने लगी कि जिस भाई ने हमेशा उन पर भरोसा किया, उसी के साथ उन्होंने गलत किया।
आखिर एक दिन दोनों भाइयों ने बैठकर गंभीरता से बात की और फैसला किया कि वे अपनी गलती को जरूर सुधारेंगे और मोहन से माफी मांगेंगे।
अगले रविवार दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ मोहन के घर पहुंचे।
मोहन उन्हें देखकर खुश हो गया।
“अरे भैया, आइये बैठिये,” मोहन बोला।
राजेश की आँखों में आँसू थे।
वह बोला –
“मोहन, हमें माफ कर दो। हमने लालच में आकर बहुत बड़ी गलती कर दी।”
दिनेश ने मोहन को एक फाइल देते हुए कहा –
“ये तुम्हारे नये घर के कागज हैं। हमने तुम्हारे लिए शहर में एक अच्छा घर खरीदा है।”
मोहन की आँखों से आँसू बहने लगे।
वह बोला –
“भैया, मुझे घर या पैसे से ज्यादा आपका प्यार चाहिए।”
राजेश ने मोहन को गले लगा लिया।
उस दिन तीनों भाइयों के बीच का प्यार पहले से भी ज्यादा मजबूत हो गया।
सीख:
उस दिन सभी को एक बात समझ आ गई —
पैसा कभी भी रिश्तों से बड़ा नहीं होता।
सच्चे रिश्ते वही होते हैं जिनमें प्यार और सम्मान हो।

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