मामा का सहारा
रात के करीब साढ़े बारह बजे थे।
आसमान में बादल छाए हुए थे और हल्की बारिश हो रही थी।
रमेश जी अपने कमरे में सो रहे थे। तभी अचानक मोबाइल की तेज़ घंटी बज उठी।
उन्होंने नींद में ही फोन उठाया।
“हैलो… कौन?”
दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज आई —
“क्या आप मीना जी के भाई बोल रहे हैं?”
रमेश जी चौंक गये।
“हाँ… मैं ही बोल रहा हूँ। आप कौन?”
आवाज़ आई —
“मैं सिविल हॉस्पिटल से बोल रहा हूँ। आपकी बहन मीना और जीजा सुरेश जी का एक्सीडेंट हो गया है। आप जल्दी से हॉस्पिटल आ जाइए।”
यह सुनते ही रमेश जी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी सीमा को जगाया और दोनों जल्दी-जल्दी कपड़े पहनकर हॉस्पिटल के लिए निकल पड़े।
जब वे अस्पताल पहुँचे तो एक डॉक्टर और पुलिस इंस्पेक्टर बाहर खड़े थे।
डॉक्टर ने धीमी आवाज में कहा —
“हमें अफसोस है… हम उन्हें बचा नहीं सके।”
यह सुनकर रमेश जी फूट-फूटकर रो पड़े।
उनकी बहन उनसे बहुत प्यार करती थी।
तभी पास में बैठी एक छोटी लड़की जोर-जोर से रो रही थी।
वह उनकी आठ साल की भांजी आर्या थी।
आर्या बार-बार कह रही थी —
“मम्मी… पापा… उठो ना…”
यह दृश्य देखकर रमेश जी का दिल टूट गया।
उन्होंने आर्या को गले से लगा लिया।
अगले दिन अंतिम संस्कार हो गया।
अब आर्या बिल्कुल अकेली रह गई थी।
रमेश जी उसे अपने घर ले आये।
शुरू-शुरू में सब ठीक था।
लेकिन कुछ दिन बाद सीमा को यह बात खटकने लगी।
एक दिन उसने कहा —
“सुनिए… हम खुद मुश्किल से घर चला रहे हैं। अब इस लड़की की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ेगी?”
रमेश जी बोले —
“वह मेरी बहन की बेटी है। मैं उसे कहीं नहीं भेजूंगा।”
सीमा बोली —
“लेकिन उसकी पढ़ाई… कपड़े… सब खर्च कैसे होगा?”
रमेश जी शांत आवाज में बोले —
“भगवान ने चाहा तो सब हो जाएगा।”
लेकिन सीमा का मन बदल नहीं रहा था।
धीरे-धीरे उसने आर्या से काम करवाना शुरू कर दिया।
झाड़ू, बर्तन, कपड़े — सब।
आर्या चुपचाप सब करती रहती।
वह कभी शिकायत नहीं करती थी।
एक दिन रमेश जी अचानक दोपहर में घर आ गये।
उन्होंने देखा कि सीमा आर्या को डांट रही है।
आर्या के हाथ में बर्तन था और उसकी आंखों में आंसू थे।
रमेश जी का दिल टूट गया।
उन्होंने आर्या को अपने पास बुलाया।
आर्या रोते हुए बोली —
“मामा… मुझे कहीं छोड़ दीजिए। मैं यहां नहीं रहना चाहती।”
यह सुनकर रमेश जी की आंखों से भी आंसू बहने लगे।
उन्होंने कहा —
“नहीं बेटी… अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगा।”
उस रात रमेश जी ने फैसला कर लिया।
अगली सुबह उन्होंने अपना सामान बांधा और आर्या को साथ लेकर घर छोड़ दिया।
वे अपने पुराने गांव चले गये।
वहां उनका एक छोटा सा मकान था।
शुरू में बहुत मुश्किलें आईं।
रमेश जी ने गांव में एक छोटी चाय की दुकान खोल ली।
सुबह से रात तक मेहनत करते।
आर्या स्कूल जाती।
स्कूल से लौटकर दुकान पर बैठकर पढ़ाई करती।
धीरे-धीरे दुकान चलने लगी।
चाय की दुकान अब छोटे से ढाबे में बदल गई।
गांव के लोग रमेश जी की ईमानदारी की बहुत तारीफ करते थे।
समय बीतता गया।
आर्या पढ़ाई में बहुत तेज थी।
उसने मेहनत करके कॉलेज में दाखिला लिया।
रमेश जी हमेशा कहते —
“बेटी तू खूब पढ़… यही तेरी असली ताकत है।”
कुछ साल बाद आर्या ने सरकारी नौकरी की परीक्षा पास कर ली।
पूरा गांव खुशी से झूम उठा।
रमेश जी की आंखों में खुशी के आंसू थे।
उन्होंने कहा —
“आज मेरी बहन बहुत खुश होगी।”
कुछ समय बाद आर्या की शादी की बात चलने लगी।
एक अच्छा लड़का मिला जो इंजीनियर था।
लड़के वालों ने साफ कहा —
“हमें कोई दहेज नहीं चाहिए।”
शादी की तैयारियां शुरू हो गईं।
इसी बीच एक दिन घर के बाहर कोई खड़ा था।
रमेश जी ने दरवाजा खोला।
सामने सीमा खड़ी थी।
वह बहुत कमजोर लग रही थी।
उसकी आंखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
सीमा रोते हुए बोली —
“मुझे माफ कर दो। मैंने बहुत बड़ी गलती की।”
रमेश जी चुप रहे।
तभी आर्या बाहर आई।
सीमा को देखते ही उसकी आंखों में आंसू आ गये।
सीमा बोली —
“बेटी… मुझे माफ कर दे।”
आर्या दौड़कर उसके गले लग गई।
“मामी… आप भी तो मेरी मां जैसी हैं।”
यह सुनकर तीनों रो पड़े।
कुछ दिनों बाद आर्या की शादी धूमधाम से हुई।
रमेश जी और सीमा ने मिलकर उसका कन्यादान किया।
विदा होते समय आर्या बोली —
“मामा… आपने मेरे लिए जो किया है, शायद कोई पिता भी नहीं कर सकता।”
रमेश जी मुस्कुराए और बोले —
“बेटी… मैंने कुछ नहीं किया। बस अपनी बहन से किया वादा निभाया है।”
आर्या गले लगकर रो पड़ी।
उस दिन रमेश जी के दिल में एक ही सुकून था —
उन्होंने अपनी बहन की जिम्मेदारी पूरी कर दी थी।

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