एक सास में पचास सासों की ताकत

 

Young Indian bride and her supportive mother-in-law sharing a happy moment while sitting on a scooter in a traditional home courtyard, symbolizing love and understanding in a family.



नेहा की शादी को अभी सिर्फ पाँच दिन ही हुए थे।


वह पहली बार अपने ससुराल आई थी।

मन में ढेर सारे सपने थे—

नई ज़िंदगी, नया घर, नए रिश्ते।


लेकिन ससुराल आते ही उसे सबसे ज़्यादा डर एक ही इंसान से लगने लगा था — अपनी सास, शारदा जी से।


शारदा जी बहुत सख्त स्वभाव की थीं।

उनकी आवाज़ तेज़ थी और घर में उनका ही नियम चलता था।



पहला दिन...


सुबह के पाँच बजे थे।


नेहा अभी गहरी नींद में सो रही थी कि तभी अचानक उसके कमरे के दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।


“नेहा… अभी तक सो रही हो?

हमारे घर की बहुएँ सूरज निकलने से पहले उठ जाती हैं।”


सास की आवाज़ सुनते ही नेहा घबरा कर तुरंत उठ बैठी।


“जी… मम्मी जी… अभी उठती हूँ।”


वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर रसोई की तरफ चली गई।


लेकिन जैसे ही वह रसोई में पहुँची और चाय बनाने लगी, तभी पीछे से फिर शारदा जी की आवाज़ आई—


“अरे… चाय ऐसे बनाते हैं क्या?

पहले दूध डालो… फिर अदरक और चायपत्ती।”


नेहा ने धीरे से सिर झुकाकर कहा—


“जी मम्मी जी… अभी ठीक कर देती हूँ।”


उस दिन के बाद से शारदा जी नेहा को हर छोटी-छोटी बात पर समझाने और टोकने लगीं।


उसे कभी काम करने का तरीका सिखातीं, तो कभी घर के नियम बतातीं।


दूसरा दिन...


नेहा ने साड़ी उल्टे पल्ले में पहन ली थी।


जैसे ही शारदा जी की नज़र उस पर पड़ी, उन्होंने तुरंत कहा —


“ये क्या है नेहा? हमारे घर की बहुएँ सीधे पल्ले की साड़ी पहनती हैं।”


नेहा थोड़ा झिझकते हुए धीरे से बोली —

“मम्मी जी… मुझे सीधे पल्ले की साड़ी पहननी नहीं आती।”


शारदा जी ने सख्त आवाज़ में कहा —

“तो सीखो। बहू बनने के बाद बहुत सी चीज़ें सीखनी पड़ती हैं।”


शारदा जी की बात सुनकर नेहा चुप हो गई।


उस रात वह अपने कमरे में गई, मोबाइल निकाला और इंटरनेट पर वीडियो देखकर सीधे पल्ले की साड़ी पहनना सीखने लगी।


थोड़ी देर कोशिश करने के बाद आखिरकार उसने खुद ही सही तरीके से साड़ी पहनना सीख लिया।


तीसरा दिन...


सुबह नहाकर नेहा कमरे की ओर जा ही रही थी कि तभी पीछे से शारदा जी की आवाज़ आई—


“रुको… बाथरूम की बिजली बंद की?”


नेहा अचानक रुक गई और थोड़ा घबराकर बोली—


“न… नहीं मम्मी जी।”


शारदा जी ने फिर पूछा—


“और बाथरूम साफ किया?”


नेहा धीरे से बोली—


“नहीं… वो अभी कर दूँगी।”


शारदा जी सख़्त आवाज़ में बोलीं—


“हमारे घर में एक नियम है — जो नहाता है, वही बाथरूम साफ भी करता है। आगे से ध्यान रखना।”


नेहा चुपचाप वापस बाथरूम की ओर चली गई और सफाई करने लगी।


सफाई करते हुए उसके मन में बार-बार एक ही ख्याल आ रहा था—


“हे भगवान… मेरी एक सास ही पचास सासों के बराबर है।”



चौथा दिन...


शाम को शारदा जी ने नेहा को सौ रुपये देते हुए कहा —


“जाओ, सब्ज़ी मंडी से सब्ज़ी लेकर आओ।”


नेहा थोड़ा हैरान होकर बोली —

“मम्मी जी… मॉल से ले आएँ?”


शारदा जी ने तुरंत जवाब दिया —

“मॉल में पैसे उड़ते हैं,

मंडी में समझदारी होती है।”


नेहा पहली बार सब्ज़ी मंडी गई।

वह हर सब्ज़ी को ध्यान से देखने लगी—कहीं मुरझाई हुई तो नहीं, कहीं सड़ी हुई तो नहीं।

काफी देर तक परखने के बाद उसने ताज़ी सब्ज़ियाँ खरीदीं और घर लौट आई।


घर पहुँचकर उसने सारी सब्ज़ियाँ शारदा जी के सामने रख दीं।


शारदा जी ने सब्ज़ियों को गौर से देखा।

सब्ज़ियाँ सच में बहुत ताज़ी थीं।


वह अंदर ही अंदर खुश हुईं,

लेकिन उनके चेहरे पर ज़्यादा भाव नहीं आए।


उन्होंने बस इतना कहा —


“ठीक है।”


नेहा मन ही मन सोचने लगी —


“कम से कम एक बार तो मेरी तारीफ कर दीजिए…”


लेकिन वह चुपचाप सब्ज़ियाँ रसोई में रखने चली गई।



पाँचवाँ दिन...


ठंड का मौसम था।


एक दिन शारदा जी ने नेहा से कहा—


“नेहा, चलो छत पर चलो। आज तुम्हें बाजरे की रोटी बनानी सिखाऊँगी।”


नेहा थोड़ा हैरान होकर बोली—


“मम्मी जी… मुझे तो बाजरे की रोटी बनानी नहीं आती।”


शारदा जी मुस्कुराकर बोलीं—


“कोई भी काम जन्म से नहीं आता। जो इंसान कोशिश करता है, वही सीख जाता है।”


दोनों छत पर पहुँच गईं।

वहाँ मिट्टी का पुराना चूल्हा रखा हुआ था।


शारदा जी ने पहले चूल्हे में लकड़ियाँ लगाईं और आग जलाई।

फिर उन्होंने नेहा को बाजरे का आटा गूंथना सिखाया।


नेहा ने ध्यान से देखा और धीरे-धीरे आटा गूंथने लगी।


इसके बाद शारदा जी ने उसे समझाया कि बाजरे की रोटी कैसे हाथ से थपथपाकर बनाई जाती है।


पहली रोटी बनाते समय नेहा की रोटी टेढ़ी-मेढ़ी बन गई।


शारदा जी बोलीं—

“घबराओ मत… पहली बार में ऐसा ही होता है।”


नेहा ने फिर कोशिश की।

दूसरी रोटी थोड़ी ठीक बनी।


तीसरी बार में नेहा ने अच्छी गोल रोटी बना ली।


शारदा जी ने उसे चूल्हे पर सेकना भी सिखाया।


थोड़ी ही देर में नेहा ने कई बाजरे की गरम-गरम रोटियाँ बना लीं।


उस दिन पूरे घर ने चूल्हे पर बनी बाजरे की रोटियाँ बड़े स्वाद से खाईं।


सबको रोटियाँ बहुत पसंद आईं।


लेकिन शारदा जी ने हमेशा की तरह बस इतना ही कहा—


“चलो… अब तुम ठीक-ठाक रोटी बनाना सीख गई हो।”



कुछ दिन बाद...


एक दिन शारदा जी ने नेहा को आवाज़ लगाई।


“नेहा, ज़रा इधर आओ… मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है।”


नेहा तुरंत उनके पास आकर खड़ी हो गई।

“जी मम्मी जी, कहिए।”


शारदा जी थोड़ी गंभीर आवाज़ में बोलीं—


“नेहा… कल तुम्हारी दादी सास गाँव से यहाँ आने वाली हैं।”


यह सुनते ही नेहा एकदम चौंक गई।


“दादी सास…?”


“हाँ,” शारदा जी ने कहा, “और सुन लो… वो स्वभाव से बहुत सख्त हैं। उन्हें घर के तौर-तरीके और संस्कार बहुत पसंद हैं। इसलिए उनके सामने कोई भी गलती नहीं होनी चाहिए।”


यह सुनकर नेहा के मन में हल्की घबराहट भर गई।

उसे ऐसा लगा जैसे अचानक कोई बड़ी परीक्षा सामने आ गई हो।


उसने धीरे से कहा—

“जी… मम्मी जी, मैं पूरी कोशिश करूँगी कि उनसे कोई शिकायत का मौका न मिले।”


लेकिन अंदर ही अंदर नेहा के हाथ-पाँव सच में ठंडे पड़ चुके थे।



अगली सुबह...


सुबह दरवाज़े पर ज़ोर से दस्तक हुई।


“अरे… कोई है घर में? या सब अभी भी सो रहे हैं?”


दरवाज़े के बाहर दादी सास गायत्री देवी खड़ी थीं।


उनकी आवाज़ पूरे आँगन में गूँज रही थी।


तभी अचानक उनके कानों में अंदर से भजन की मधुर आवाज़ सुनाई दी।


गायत्री देवी ने ध्यान से सुना और धीरे-धीरे घर के अंदर की ओर बढ़ीं।


मंदिर के पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि नेहा सुबह-सुबह नहाकर मंदिर में बैठी पूजा कर रही थी और बहुत ही सुर में भजन गा रही थी।


वह दृश्य देखकर गायत्री देवी कुछ पल के लिए वहीं खड़ी रह गईं।


उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई।


उन्होंने धीरे से कहा—


“वाह… शहर की बहू होकर भी इतना सुंदर भजन गाती है!”


भजन खत्म होते ही नेहा ने मुड़कर देखा कि दादी सास सामने खड़ी हैं।


वह तुरंत उठी और झुककर उनके पैर छू लिए।


गायत्री देवी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोलीं—


“बहुत संस्कारी बहू है… हमें तो बहुत पसंद आई।”


यह देखकर गायत्री देवी सच में बहुत खुश हो गईं।



दोपहर...


गायत्री देवी बोलीं—


“बहू… मुझे चूल्हे की बाजरे की रोटी खाने का मन है।”


शारदा जी तुरंत बोलीं—


“अभी बनाकर लाती है हमारी बहू।”


नेहा छत पर गई।


चूल्हा जलाया…

बाजरे की गोल-गोल रोटियाँ बनाई।


दादी सास ने खाकर कहा—


“वाह! ऐसी रोटी तो गाँव में भी कम मिलती है।”


फिर उन्होंने अपने हाथों से खानदानी कंगन उतारकर नेहा को दे दिए।


“आज से ये तुम्हारे हैं।”


सच सामने आया...


दादी सास के जाने के बाद नेहा धीरे-धीरे अपनी सास शारदा जी के पास आई। उसके चेहरे पर हल्की झिझक थी और आँखों में नमी।


वह धीमी आवाज़ में बोली—


“मम्मी जी… मुझे माफ़ कर दीजिए।

मैंने आपको बहुत गलत समझा।

मुझे लगता था कि आप बिना वजह मेरे साथ इतनी सख्ती करती हैं।

लेकिन आज समझ में आया कि आप ऐसा क्यों कर रही थीं।”


शारदा जी हल्के से मुस्कुराईं और नेहा के सिर पर प्यार से हाथ रखकर बोलीं—


“बेटा, मुझे पहले से पता था कि तुम्हारी दादी सास आने वाली हैं।

और उनका स्वभाव बहुत सख्त है।

मैं चाहती थी कि जब वो आएँ तो तुम्हें किसी भी बात पर टोक न सकें।

तुम उनकी हर परीक्षा में पास हो जाओ।”


यह सुनकर नेहा की आँखें भर आईं।


वह भावुक होकर बोली—


“तो मम्मी जी… आप मुझे डाँटती इसलिए थीं…?”


शारदा जी ने प्यार से कहा—


“हाँ बेटा… ताकि तुम जल्दी-जल्दी सब कुछ सीख जाओ।

मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हें वो सब सहना पड़े जो मैंने अपनी सास के समय सहा था।”


नेहा ने तुरंत आगे बढ़कर शारदा जी को गले लगा लिया।


उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि

सख्ती के पीछे भी कभी-कभी बहुत गहरा प्यार छिपा होता है।



उसके बाद...


अगले दिन सुबह शारदा जी ने नेहा को आवाज़ लगाई—


“नेहा… ज़रा जल्दी तैयार हो जाओ।”


नेहा हैरानी से बोली—

“मम्मी जी, कहाँ जाना है?”


शारदा जी हल्के से मुस्कुराईं—

“चलो, आज तुम्हें मॉल लेकर चलते हैं।”


नेहा थोड़ी हैरान भी थी और खुश भी। वह जल्दी से तैयार होकर बाहर आ गई।


दोनों मॉल पहुँचीं।

वहाँ शारदा जी ने नेहा के लिए एक सुंदर सी ड्रेस पसंद की और उसे खरीद दिया।


नेहा बोली—

“मम्मी जी, इसकी क्या ज़रूरत थी?”


शारदा जी प्यार से बोलीं—

“बहू सिर्फ घर के काम करने के लिए नहीं होती, उसे खुश रहना भी चाहिए।”


फिर शारदा जी ने कहा—


“और अब तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”


नेहा उत्सुक होकर बोली—

“क्या मम्मी जी?”


शारदा जी उसे मॉल के बाहर एक शोरूम में ले गईं और वहाँ से उसके लिए नई स्कूटी खरीद दी।


नेहा खुशी से चौंक गई।


“मम्मी जी… सच में मेरे लिए?”


शारदा जी मुस्कुराते हुए बोलीं—

“हाँ, अब तुम मुझे भी स्कूटी चलाना सिखाओगी।”


यह सुनकर नेहा हँस पड़ी और खुशी से शारदा जी के गले लग गई।



घर लौटते समय...


नेहा स्कूटी चला रही थी और शारदा जी पीछे बैठी थीं।


उन्हें ऐसे साथ घूमते देखकर पड़ोस की औरतें हैरान रह गईं।


एक पड़ोसन मुस्कुराकर बोली—

“अरे शारदा जी… ये क्या! आप तो बिल्कुल मॉडर्न हो गई हैं।”


शारदा जी हल्के से हँसते हुए बोलीं—

“अरे भई, समय के साथ बदलना ही पड़ता है।”


फिर उन्होंने प्यार से नेहा की तरफ देखा और कहा—


“याद रखना बेटा…

अगर सास को अपनी बहू से इज़्ज़त चाहिए,

तो उसे पहले अपनी बहू को दिल से प्यार देना पड़ता है।”


नेहा मुस्कुराई और बोली—


“सच मम्मी जी…

मेरी एक सास में सचमुच पचास सासों की ताकत है।”





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