जिम्मेदारी का फैसला
दिल्ली के एक शांत से इलाके में रहने वाली नेहा एक बड़ी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थी।
उसके परिवार में उसके पापा महेश जी और मां सुनीता जी थे।
नेहा बचपन से ही बहुत मेहनती थी।
उसने अपनी पढ़ाई भी स्कॉलरशिप से पूरी की थी और अब अपनी मेहनत के दम पर कंपनी में अच्छी पोस्ट पर पहुंच चुकी थी।
एक सुबह वह जल्दी-जल्दी ऑफिस जाने की तैयारी कर रही थी।
सुनीता जी रसोई से आवाज लगाती हैं —
सुनीता जी: नेहा बेटा, टिफिन ले जाना मत भूलना।
नेहा: हां मम्मी, रख दिया बैग में।
सुनीता जी: और नाश्ता?
नेहा: मम्मी आज बहुत जरूरी मीटिंग है, ऑफिस में कर लूंगी।
इतना कहकर नेहा जल्दी से निकल जाती है।
नेहा के जाने के बाद सुनीता जी अपने पति से कहती हैं —
सुनीता जी: सुनिए जी, अब नेहा की शादी के बारे में भी सोचना चाहिए।
महेश जी: हां, लेकिन नेहा को अभी शादी की जल्दी नहीं है।
सुनीता जी: बच्चों को कब जल्दी होती है? हमें ही सोचना पड़ता है।
कुछ दिनों बाद सुनीता जी की एक रिश्तेदार किरण एक अच्छे लड़के का रिश्ता लेकर आती हैं।
लड़के का नाम अभिषेक था।
वह भी एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर था।
किरण ने उसका फोटो और बायोडाटा भेज दिया।
शाम को जब नेहा ऑफिस से घर आती है तो उसके माता-पिता उससे बात करते हैं।
महेश जी: बेटा एक लड़के का रिश्ता आया है, एक बार मिल तो लो।
नेहा: पापा मैंने अभी शादी के बारे में सोचा ही नहीं है।
सुनीता जी: बस एक बार मिल लो, अगर पसंद न आए तो मना कर देना।
बहुत समझाने के बाद नेहा मिलने के लिए तैयार हो जाती है।
दो दिन बाद एक कैफे में नेहा और अभिषेक की मुलाकात होती है।
दोनों काफी देर तक बातें करते हैं।
कुछ देर बाद नेहा साफ-साफ कहती है —
नेहा: देखिए अभिषेक, मैं अपनी नौकरी बहुत पसंद करती हूं।
मैं शादी के बाद भी काम जारी रखना चाहती हूं।
अभिषेक: इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
नेहा: और मेरा काम बहुत जिम्मेदारी वाला है। कई बार देर तक काम करना पड़ता है।
अभिषेक: मुझे समझ है। अगर इंसान अपने काम से ईमानदार है तो वह हर रिश्ते को भी निभा सकता है।
नेहा को अभिषेक की बात पसंद आती है।
कुछ ही दिनों में दोनों परिवार मिलते हैं और शादी की तारीख तय हो जाती है।
शादी की तैयारी...
शादी में अभी एक महीना बाकी था।
उधर नेहा की कंपनी को एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिल जाता है और उसकी जिम्मेदारी नेहा को दी जाती है।
नेहा दिन-रात मेहनत करने लगती है।
एक शाम वह घर लौटती है।
सुनीता जी: बेटा अब शादी में बस पंद्रह दिन रह गए हैं, थोड़ा काम कम कर दे।
नेहा: मम्मी कोशिश कर रही हूं, लेकिन यह प्रोजेक्ट बहुत जरूरी है।
महेश जी: बेटा शादी भी तो जिंदगी का बड़ा फैसला है।
नेहा: पापा, मैं सब संभाल लूंगी।
इधर घर में शादी की सारी तैयारियां चल रही थीं।
कपड़े, गहने, कार्ड, सजावट — सब हो चुका था।
लेकिन नेहा अभी भी ऑफिस के काम में लगी रहती।
शादी का दिन...
आखिर शादी का दिन आ गया।
घर में मेहमानों की भीड़ थी और बारात भी आ चुकी थी।
नेहा और अभिषेक स्टेज पर जयमाला के बाद बैठे थे।
तभी नेहा के फोन पर लगातार कॉल आने लगे।
वह थोड़ा परेशान हो जाती है।
उसकी एक सहेली पास आकर कहती है —
सहेली: नेहा, ऑफिस से बहुत जरूरी कॉल है।
नेहा फोन उठाती है।
नेहा: क्या? सर्वर क्रैश हो गया?
उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
फोन रखने के बाद वह अभिषेक से कहती है —
नेहा: मुझे थोड़ी देर के लिए काम देखना पड़ेगा।
अभिषेक: अभी?
नेहा: अगर अभी समस्या हल नहीं हुई तो कंपनी को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है।
अभिषेक कुछ पल सोचता है और फिर कहता है —
अभिषेक: ठीक है, अगर इतना जरूरी है तो काम कर लो।
नेहा वहीं स्टेज के पास बैठकर लैपटॉप खोल लेती है।
उसकी टीम के दो लोग भी वहां पहुंच जाते हैं।
लगभग दो घंटे तक नेहा लगातार काम करती रहती है।
इधर मेहमान भी हैरान थे।
पंडित जी बार-बार कह रहे थे —
पंडित जी: मुहूर्त निकलता जा रहा है।
नेहा के पापा थोड़ा परेशान होकर कहते हैं —
महेश जी: बेटा अब चलो, सब इंतजार कर रहे हैं।
नेहा कहती है —
नेहा: बस पापा, थोड़ा सा काम बाकी है।
उधर अभिषेक के पापा थोड़ा नाराज हो जाते हैं।
अभिषेक के पापा: अगर आपकी बेटी को शादी से ज्यादा काम जरूरी है तो हम बारात वापस ले जाते हैं।
यह सुनकर सब चुप हो जाते हैं।
तभी अभिषेक आगे बढ़कर कहता है —
अभिषेक: पापा, थोड़ा धैर्य रखिए।
फिर वह नेहा की तरफ देखकर मुस्कुराता है —
अभिषेक: जो लड़की अपने काम के प्रति इतनी ईमानदार है, वह रिश्तों को भी उतनी ही सच्चाई से निभाएगी।
कुछ ही देर में नेहा का काम पूरा हो जाता है।
वह लैपटॉप बंद करती है और सबके सामने खड़ी हो जाती है।
नेहा: अगर आज यह समस्या हल नहीं होती तो हमारी कंपनी को बहुत बड़ा नुकसान हो जाता। वहां सैकड़ों लोग काम करते हैं। उनकी नौकरी भी खतरे में पड़ सकती थी।
अभिषेक के पापा कुछ देर चुप रहते हैं।
फिर मुस्कुराकर कहते हैं —
अभिषेक के पापा: बेटी, हमें गर्व है तुम पर। अब से मुझे अंकल नहीं, पापा कहना।
यह सुनकर सब लोग खुश हो जाते हैं।
थोड़ी ही देर में नेहा और अभिषेक फेरे लेते हैं।
और उस दिन सभी को यह समझ आ जाता है —
जो इंसान अपने काम और जिम्मेदारी के प्रति सच्चा होता है, वह हर रिश्ते को भी सच्चाई से निभाता है।

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