बराबरी की असली कीमत
शाम का समय था। बाहर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन घर के अंदर का माहौल गर्म और भारी था।
कविता रसोई में खड़ी चुपचाप चाय बना रही थी। चम्मच से कप में चीनी घोलते हुए उसकी नजर बार-बार ड्राइंग रूम की ओर जा रही थी, जहाँ आज एक अहम बातचीत होने वाली थी।
वह ट्रे में चाय रखकर बाहर आई।
सोफे पर उसके ससुर, हरिराम जी, सीधे होकर बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। सामने उसकी ननद, नेहा, अपने पर्स को कसकर पकड़े बैठी थी। पति, रोहित, सिर झुकाए मोबाइल में कुछ देखने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी उंगलियाँ स्थिर थीं।
कविता ने सबके सामने चाय रखी और खुद एक कुर्सी खींचकर बैठ गई।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर नेहा ने गहरी सांस लेकर बात शुरू की—
“भैया, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है… और मैं उम्मीद करती हूँ कि आप मुझे समझेंगे।”
रोहित ने हल्के से सिर उठाया, “हाँ नेहा, बोलो।”
“पापा की जो जमीन है…,” नेहा ने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, “उसमें मेरा भी बराबर का हक है। मुझे मेरे हिस्से के पैसे चाहिए।”
कमरे की हवा जैसे अचानक ठहर गई।
हरिराम जी ने तुरंत कहा, “बिल्कुल सही कह रही है नेहा। आजकल बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता। जो उसका हक है, वो उसे मिलना चाहिए।”
रोहित ने धीरे से पूछा, “तुम्हें अचानक पैसों की जरूरत क्यों पड़ी?”
नेहा ने नजरें मिलाईं, “मैं अपना छोटा सा बिज़नेस शुरू करना चाहती हूँ। ससुराल में बार-बार हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता।”
कविता चुपचाप सब सुन रही थी।
फिर उसने धीरे से कहा—
“दीदी की बात बिल्कुल सही है पिताजी। उन्हें उनका हक जरूर मिलना चाहिए।”
नेहा के चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान आ गई।
लेकिन कविता यहीं नहीं रुकी।
“पर…” उसने आगे कहा, “अगर हम बराबरी की बात कर रहे हैं, तो फिर वह हर चीज में होनी चाहिए।”
हरिराम जी की भौंहें सिकुड़ गईं, “क्या कहना चाहती हो बहू?”
कविता उठी, अंदर गई और एक फाइल लेकर वापस आई।
उसने फाइल टेबल पर रखी और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया—
“पिताजी, पिछले साल आपकी बीमारी में लगभग दस लाख रुपये खर्च हुए थे। फिर रोहित की नौकरी छूटने के समय घर चलाने के लिए हमने पंद्रह लाख का पर्सनल लोन लिया था।”
रोहित ने हल्की नजर उठाकर कविता को देखा—जैसे वह खुद भी ये सब फिर से सुन रहा हो।
“और इस घर की मरम्मत के लिए जो लोन लिया गया था… उसका भी करीब आठ लाख अभी बाकी है।”
कमरे में खामोशी गहराने लगी।
कविता ने नेहा की तरफ देखा—
“कुल मिलाकर लगभग तैंतीस लाख का कर्ज है, दीदी… जिसे हम दोनों पिछले डेढ़ साल से चुका रहे हैं।”
नेहा का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।
“दीदी,” कविता ने शांत स्वर में कहा, “अगर पापा की जमीन साठ लाख की है… और आप उसमें आधा हिस्सा चाहती हैं, तो क्या कर्ज में भी आपका आधा हिस्सा नहीं होना चाहिए?”
नेहा तुरंत बोली, “भाभी, ये कैसी बात कर रही हैं आप? कर्ज चुकाना तो बेटे की जिम्मेदारी होती है।”
कविता मुस्कुराई—लेकिन उस मुस्कान में तर्क था।
“तो फिर हक भी उसी का होना चाहिए ना, दीदी?”
अब कोई कुछ नहीं बोला।
हरिराम जी थोड़े नाराज़ होकर बोले, “बहू, ये सब बातें करके तुम क्या साबित करना चाहती हो?”
कविता ने बहुत सम्मान से कहा—
“मैं कुछ साबित नहीं करना चाहती पिताजी… बस एक बात समझना चाहती हूँ।
अगर नेहा दीदी इस घर की बराबर की वारिस हैं, तो क्या वे जिम्मेदारियों में भी बराबर की भागीदार नहीं हैं?”
रोहित अब तक चुप था, लेकिन अब उसने धीरे से कहा—
“पापा… कविता गलत नहीं कह रही है।
मैं हर महीने अपनी आधी सैलरी ईएमआई में दे देता हूँ। कई बार तो महीने के अंत में बचत शून्य रह जाती है।”
नेहा ने थोड़ा तीखा स्वर अपनाया—
“तो क्या मैं अपने ससुराल में जाकर कहूँ कि मैं मायके का कर्ज चुकाऊंगी?”
कविता ने बिना आवाज ऊँची किए जवाब दिया—
“जैसे आप यह कह सकती हैं कि आप मायके की संपत्ति में हिस्सा ले रही हैं।”
नेहा चुप।
पूरी तरह चुप।
कुछ देर तक कमरे में सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
फिर कविता ने धीरे से कहा—
“हम एक सीधा रास्ता चुन सकते हैं।”
सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।
“जमीन बेच दीजिए।
जो भी पैसा आए—पहले कर्ज चुकाया जाए।
जो बचे—उसे बराबर बांट लिया जाए।”
रोहित ने तुरंत कहा, “मुझे यह ठीक लगता है।”
हरिराम जी अब असमंजस में थे।
उन्होंने नेहा की तरफ देखा, “तुम क्या चाहती हो?”
नेहा की आँखों में अब पहले जैसी जिद नहीं थी… बल्कि सोच थी।
कुछ पल बाद उसने धीमे स्वर में कहा—
“शायद… मैं सिर्फ हक देख रही थी… जिम्मेदारी नहीं।”
कविता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“हक लेना आसान होता है दीदी…
लेकिन जिम्मेदारी निभाना ही असली बराबरी है।”
नेहा की आँखें हल्की-सी नम हो गईं।
“भाभी… आपने गलत नहीं कहा।”
कमरे का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।
हरिराम जी ने गहरी सांस ली—
“शायद हम सच में आधी बात ही समझते रहे…”
रोहित ने पहली बार राहत की सांस ली।
कविता उठी और कप समेटने लगी।
रसोई में जाते-जाते उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा—
आज उस घर में सिर्फ संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ था…
सोच का भी बंटवारा खत्म हुआ था।

Post a Comment