अधूरी नहीं… अलग थी वो

 

Emotional illustration of a young man watching a calm and graceful woman with a walking support on a peaceful evening street near a tea stall, warm golden light, heartfelt moment



शाम ढलने लगी थी।

आसमान में हल्की सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी और सड़क पर लोगों की आवाजाही धीरे-धीरे बढ़ रही थी।


राहुल ऑफिस से लौटते हुए सड़क किनारे एक चाय की दुकान पर रुक गया।

थकान उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी।


“भैया, एक कटिंग चाय देना,” उसने कहा।


चाय लेते ही उसने एक लंबी साँस ली और पास रखी बेंच पर बैठ गया।


तभी उसकी नजर सामने पड़ी।


एक लड़की धीरे-धीरे चल रही थी…

उसके हाथ में फाइलें थीं और एक कंधे पर बैग टंगा था।

पर उसकी चाल में कुछ अलग था…


वह हल्का-सा लंगड़ा कर चल रही थी।


राहुल ने ध्यान से देखा—

उसके एक पैर में सपोर्ट लगा हुआ था।


पर जो चीज सबसे अलग थी…

वह थी उसके चेहरे की शांति।


ना कोई शिकायत…

ना कोई हड़बड़ाहट…


बस सुकून।



अगले दिन…


राहुल फिर उसी समय चाय की दुकान पर रुका।


और जैसे उसे उम्मीद थी—

वह लड़की फिर उसी रास्ते से गुजरी।


इस बार उसने हिम्मत करके आवाज दी—


“एक मिनट… सुनिए…”


लड़की रुकी।

धीरे से पलटी और बोली—

“जी?”


राहुल थोड़ा हड़बड़ा गया—


“वो… मैं बस ये पूछना चाहता था कि आप रोज इसी टाइम आती हैं क्या?”


लड़की ने हल्का-सा भौंहें चढ़ाईं—


“क्यों?”


राहुल मुस्कुरा दिया—


“क्योंकि मैं रोज इसी टाइम चाय पीता हूँ… और आप रोज मुझे दिख जाती हैं।”


लड़की ने कुछ पल उसे देखा…

फिर बोली—


“तो क्या आप हर रोज हर गुजरने वाले से यही पूछते हैं?”


राहुल झेंप गया—


“नहीं… बस आपसे पूछ लिया।”


लड़की ने पहली बार हल्की मुस्कान दी—


“मेरा नाम नंदिनी है।”


“राहुल,” उसने तुरंत जवाब दिया।



धीरे-धीरे दोनों की बातचीत शुरू हो गई।


राहुल बिंदास था…

और नंदिनी… शांत।


राहुल छोटी-छोटी बातों पर हँसता…

और नंदिनी सिर्फ मुस्कुरा देती।


एक दिन राहुल ने पूछ ही लिया—


“तुम इतनी कम क्यों बोलती हो?”


नंदिनी ने सीधा जवाब दिया—


“क्योंकि मैंने बहुत जल्दी समझ लिया था कि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।”


राहुल कुछ देर चुप रहा…


फिर बोला—


“और हँसना?”


नंदिनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—


“हँसना… मैंने सीखा है… भूलना नहीं।”



कुछ दिनों बाद…


बारिश का दिन था।


सड़क पर पानी भर गया था और लोग छतों के नीचे खड़े थे।


नंदिनी भी एक दुकान के शेड के नीचे खड़ी थी।


राहुल भागता हुआ आया—


“अरे! तुम भी फँस गई?”


नंदिनी ने हल्की मुस्कान दी—


“लगता तो ऐसा ही है।”


राहुल ने अपने बैग से एक छोटा-सा पेपर बोट (कागज़ की नाव) निकाला और पानी में छोड़ दिया।


नंदिनी ने हैरानी से पूछा—


“ये क्या है?”


राहुल हँसा—


“बचपन… जो अभी तक गया नहीं।”


नंदिनी उस नाव को पानी में तैरते हुए देखती रही…


फिर अचानक उसके होंठों पर एक सच्ची मुस्कान आ गई।


“तुम अजीब हो,” उसने कहा।


“और तुम खूबसूरत,” राहुल के मुँह से निकल गया।


दोनों कुछ पल के लिए चुप हो गए।



धीरे-धीरे रिश्ता गहराने लगा।


एक दिन राहुल ने पूछा—


“तुम हमेशा इतनी मजबूत कैसे रहती हो?”


नंदिनी ने पहली बार अपने बारे में बताया—


“जब मैं 10 साल की थी, एक एक्सीडेंट हुआ था।

मेरे पैर में हमेशा के लिए कमजोरी आ गई।”


राहुल ध्यान से सुन रहा था।


“लोगों ने मुझे कमजोर समझा…

पर मैंने खुद को कभी कमजोर नहीं माना।”



समय बीतता गया…


और एक दिन…


राहुल ने कुछ पल आँखें बंद कीं, जैसे अपने भीतर हिम्मत जुटा रहा हो।

फिर धीमी लेकिन साफ आवाज़ में बोला—


“नंदिनी… मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”


नंदिनी एकदम शांत हो गई।

उसने नजरें झुका लीं, जैसे इस एक शब्द ने उसके भीतर कई भाव जगा दिए हों।


कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीरे से कहा—


“तुम जानते हो ना… मैं पूरी नहीं हूँ?”


राहुल ने बिना एक पल गंवाए उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में अपनापन था, कोई झिझक नहीं—


“नंदिनी… तुम पूरी हो।

बस देखने वालों की नजर अधूरी है।”


नंदिनी ने हल्के से सिर हिलाया।

उसकी आँखों में एक गहरी समझ और हल्की-सी पीड़ा थी—


“नहीं राहुल… बात इतनी आसान नहीं है।

जिंदगी सिर्फ भावनाओं से नहीं चलती…

हकीकत भी साथ चलती है।”



अगले दिन…


नंदिनी ने कुछ पल चुप रहकर उसकी आँखों में देखा, फिर धीरे से बोली—


“मैं तुम्हें पसंद करती हूँ… शायद… प्यार भी करती हूँ…”


वह रुकी, जैसे शब्दों को संभाल रही हो—


“लेकिन… मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती।”


राहुल जैसे ठहर सा गया—

“क्यों, नंदिनी?”


नंदिनी की आवाज धीमी थी, पर उसमें अजीब-सी दृढ़ता थी—


“क्योंकि मैं किसी की जिम्मेदारी बनकर नहीं जीना चाहती, राहुल।”


राहुल ने तुरंत उसकी बात काटी—


“तुम जिम्मेदारी नहीं हो… तुम मेरी खुशी हो।”


नंदिनी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द छुपा था—


“आज तुम्हें ऐसा लगता है… लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती।”


वह आगे बोली—


“हो सकता है… कभी ऐसा वक्त आए जब मैं तुम्हें बोझ लगने लगूँ…

या उससे भी ज्यादा… मुझे खुद ही ये महसूस होने लगे कि मैं तुम्हारे लिए बोझ हूँ।”


राहुल कुछ कहना चाहता था, पर शब्द जैसे कहीं अटक गए।


नंदिनी ने धीरे से कहा—


“और जब कोई इंसान खुद को बोझ समझने लगे ना…

तो वो रिश्ता भी उसे भारी लगने लगता है… और जिंदगी भी।”


कुछ पल की खामोशी के बाद उसने उसकी ओर देखकर कहा—


“एक बात बताओ राहुल…

क्या हर रिश्ते को किसी नाम या बंधन में बाँधना जरूरी होता है?”


राहुल चुप रहा।


नंदिनी की आँखों में एक सुकून था—


“कुछ रिश्ते… बिना किसी नाम के… ज्यादा सच्चे, ज्यादा खूबसूरत और ज्यादा आज़ाद होते हैं।”


उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा—


“मैं चाहती हूँ… हमारा रिश्ता भी ऐसा ही रहे—

पावन… सच्चा… और बिना किसी बंधन के…”


राहुल की आँखें भर आईं…


पर उसने कुछ नहीं कहा।



उस दिन के बाद…


दोनों मिलते रहे…


बातें भी होती रहीं…


पर उनके बीच एक समझ बन गई थी—


बिना किसी बंधन के… एक सच्चा रिश्ता।



एक शाम…


फिर वही चाय की दुकान…


राहुल ने पूछा—


“अगर कभी मैं दूर चला जाऊँ तो?”


नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—


“तो याद रखना…

मैं अधूरी नहीं थी…

बस अलग थी।”



और राहुल समझ गया…


हर प्यार का अंत शादी नहीं होता…

पर हर सच्चा रिश्ता… हमेशा रहता है।





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