स्वाभिमान की रोटी
दोपहर का समय था।
आसमान में हल्के बादल छाए हुए थे और घर के आँगन में आम के पेड़ की छाया फैली हुई थी।
रीना रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी। उसके चेहरे पर हल्की थकान साफ दिखाई दे रही थी। सुबह से वह लगातार काम में लगी हुई थी—पहले पूरे घर की सफाई, फिर सबके लिए नाश्ता, और अब दोपहर के खाने की तैयारी।
उसी समय उसकी जेठानी कविता कमरे से बाहर आई और रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली—
“रीना, अभी तक खाना तैयार नहीं हुआ क्या? मुझे बच्चों को स्कूल से लेने भी जाना है।”
रीना ने धीमी आवाज़ में कहा—
“बस भाभी, दस मिनट में हो जाएगा। आज थोड़ी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी इसलिए देर हो गई।”
कविता ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा—
“तबीयत ठीक नहीं है तो क्या हुआ? घर के काम तो करने ही पड़ेंगे। यहाँ कोई आराम करने नहीं बैठा है।”
रीना चुप रही। वह जानती थी कि जवाब देने का मतलब घर में नया झगड़ा खड़ा करना है।
रीना की शादी इस घर में डेढ़ साल पहले हुई थी। उसके पति अमित एक छोटी प्राइवेट कंपनी में काम करते थे और उनकी सैलरी ज्यादा नहीं थी।
घर में सास शारदा देवी, जेठ सुनील, जेठानी कविता और उनके दो बच्चे रहते थे।
सुनील की सरकारी नौकरी थी और उनकी अच्छी आय थी। इसी वजह से घर में सबसे ज्यादा उनकी और उनकी पत्नी कविता की ही चलती थी।
शादी के बाद शुरू में सब कुछ ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे कविता का व्यवहार बदलने लगा।
वह अक्सर रीना को ताने देती—
“हमारे सहारे रह रही हो… थोड़ा काम कर लिया करो।”
रीना चुपचाप सब सहती रहती। उसे लगता था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
एक दिन की बात है।
सुबह के करीब आठ बजे थे। रीना रसोई में नाश्ता बना रही थी। उसी समय कविता की बेटी पायल भागती हुई आई और बोली—
“चाची, मम्मी बुला रही हैं।”
रीना तुरंत हाथ पोंछते हुए कमरे में गई। कविता अलमारी के सामने खड़ी थी।
“मेरी साड़ी प्रेस करके रख दो। मुझे आज शादी में जाना है,” कविता ने आदेश के लहजे में कहा।
रीना ने धीरे से कहा—
“भाभी, अभी मैं नाश्ता बना रही हूँ। सबको स्कूल और ऑफिस जाना है। उसके बाद प्रेस कर दूँगी।”
कविता को यह बात पसंद नहीं आई।
“इतना सा काम भी नहीं हो सकता तुमसे? हर बात में बहाना बना देती हो।”
इतना कहकर वह गुस्से में कमरे से बाहर चली गई।
उस दिन शाम को जब अमित ऑफिस से लौटे तो रीना थोड़ी उदास थी।
अमित ने पूछा—
“क्या हुआ? तुम इतनी चुप क्यों हो?”
रीना ने धीरे-धीरे सारी बात बता दी।
अमित कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला—
“मुझे पता है कि तुम्हें बहुत कुछ सहना पड़ रहा है। लेकिन अभी मेरी कमाई कम है। अगर अलग रहेंगे तो खर्चा संभालना मुश्किल हो जाएगा।”
रीना ने मुस्कुराते हुए कहा—
“मैं ज्यादा कुछ नहीं चाहती अमित। बस थोड़ा सम्मान चाहिए।”
अमित ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
“मैं कोशिश कर रहा हूँ। जल्द ही सब ठीक होगा।”
समय बीतता गया।
एक दिन घर में मेहमान आने वाले थे। कविता ने सुबह-सुबह ही रीना को आवाज़ लगाई—
“रीना! जल्दी उठो, बहुत काम है।”
रीना उस समय बुखार से परेशान थी। रात भर उसे नींद भी ठीक से नहीं आई थी।
उसने धीरे से कहा—
“भाभी, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है।”
कविता ने ताना मारते हुए कहा—
“तबीयत तो तुम्हारी रोज ही खराब रहती है।”
उस दिन रीना ने फिर भी पूरे घर का काम किया।
लेकिन शाम को जब वह थोड़ा आराम करने कमरे में गई तो कविता मेहमानों के सामने ही बोल पड़ी—
“कुछ लोग तो इस घर में बस आराम करने आए हैं।”
यह सुनकर रीना की आँखों में आँसू आ गए।
अमित भी यह सब सुन रहा था।
उस रात उसने माँ शारदा देवी से कहा—
“माँ, मैं सोच रहा हूँ कि अब हम अलग रहने लगें।”
शारदा देवी चौंक गईं।
“अलग? क्यों बेटा?”
अमित ने शांत स्वर में कहा—
“माँ, यहाँ रोज-रोज की बातों से माहौल खराब हो रहा है। मैं नहीं चाहता कि रीना को रोज अपमान सहना पड़े।”
शारदा देवी कुछ देर तक सोचती रहीं।
फिर बोलीं—
“ठीक है बेटा। अगर तुम्हें यही सही लगता है तो ऊपर वाले कमरे में तुम दोनों रह सकते हो।”
कुछ ही दिनों में अमित और रीना ऊपर वाले दो छोटे कमरों में रहने लगे।
अब उनका खर्च सीमित था। कई बार महीने के अंत में पैसे भी कम पड़ जाते थे।
लेकिन उनके चेहरे पर एक सुकून था।
एक दिन शाम को रीना छत पर बैठी चाय पी रही थी। अमित भी वहीं आकर बैठ गया।
अमित ने मुस्कुराते हुए कहा—
“रीना, आज कंपनी में मेरी प्रमोशन हो गई।”
रीना की आँखें खुशी से चमक उठीं।
“सच?”
अमित ने सिर हिलाया।
“हाँ, अब सैलरी भी बढ़ जाएगी।”
रीना ने धीरे से कहा—
“देखा, भगवान देर से देते हैं लेकिन देते जरूर हैं।”
नीचे आँगन में खड़ी कविता यह सब देख रही थी।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस बहू को वह कमजोर समझती थी, वही आज अपने सम्मान के साथ जी रही थी।
रीना और अमित के पास शायद ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन उनके पास सबसे बड़ी चीज थी—
सम्मान और सुकून।
और सच भी यही है—
सोने की थाली में अपमान की रोटी खाने से बेहतर है
सम्मान के साथ मिट्टी की थाली में सूखी रोटी खाना।

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