जब ‘ना’ कहना जरूरी हो जाता है
घर का दरवाज़ा धीरे से खुला और प्रिया अंदर आई। कंधे झुके हुए थे, चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। हाथ में ऑफिस का बैग था और दिमाग में दिनभर की भागदौड़।
जैसे ही वह हॉल में पहुँची, उसने देखा—सास कमला जी और देवरानी नेहा आराम से टीवी देख रही थीं। सामने टेबल पर गरम-गरम पकौड़े और चाय रखी थी।
प्रिया को देखते ही नेहा ने हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन कमला जी ने सीधा कहा,
“आ गई? अच्छा है, अब जल्दी से किचन में जाकर खाना बना ले। आज सबको जल्दी खाना चाहिए।”
प्रिया ने एक पल के लिए टेबल की तरफ देखा—पकौड़े खत्म हो चुके थे। एक भी उसके लिए नहीं बचा था।
उसने धीरे से पूछा,
“माँ जी… मेरे लिए कुछ रखा है क्या?”
कमला जी ने भौंहें चढ़ाते हुए जवाब दिया,
“तुम्हारे लिए अलग से कोई इंतजाम नहीं होता यहाँ। घर की बहू हो, समय से आओगी तो खाओगी।”
यह सुनकर प्रिया चुप हो गई। वह बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई।
कमरे में उसका पति रवि मोबाइल पर वीडियो देख रहा था। प्रिया ने उम्मीद से कहा,
“रवि, आज बहुत थक गई हूँ… क्या तुम माँ से कह सकते हो कि आज बाहर से खाना मंगा लें?”
रवि ने बिना नजर उठाए कहा,
“तुम्हें पता है ना माँ को बाहर का खाना पसंद नहीं। थोड़ा एडजस्ट कर लो।”
बस, यही शब्द थे—“एडजस्ट कर लो”—जो प्रिया को अंदर तक चुभ गए।
वह कुछ देर चुप बैठी रही। फिर धीरे-धीरे उठी, चेहरा धोया, अपनी पसंद की नीली साड़ी पहनी और खुद को आईने में देखा।
इस बार उसकी आँखों में थकान कम और आत्मविश्वास ज्यादा था।
वह बाहर आई और सीधे सोफे पर बैठ गई।
कमला जी ने उसे बैठा देखकर तीखे स्वर में कहा,
“ये क्या हो रहा है? खाना कौन बनाएगा?”
प्रिया ने शांत आवाज में कहा,
“माँ जी, आज मैं बहुत थकी हूँ। आज खाना नहीं बना पाऊँगी।”
कमला जी गुस्से में बोलीं,
“तो क्या हम भूखे रहें?”
प्रिया ने उसी शांति से जवाब दिया,
“नहीं, आप चाहें तो बाहर से मंगा सकते हैं… या फिर हम सब मिलकर बना सकते हैं।”
पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
रवि ने पहली बार मोबाइल नीचे रखा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोले।
कमला जी ने गुस्से में कहा,
“बहू होकर ऐसे जवाब देती हो?”
प्रिया ने धीरे से कहा,
“बहू हूँ… मशीन नहीं। मैं भी इंसान हूँ, मुझे भी थकान होती है।”
तभी ससुर जी, जो अब तक चुप थे, बोले,
“कमला, आज बाहर से खाना मंगा लेते हैं। बहू सही कह रही है।”
कमला जी चौंक गईं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई प्रिया का साथ देगा।
कुछ देर बाद प्रिया ने एक और बात कही,
“माँ जी, अगर आपको लगता है कि घर के काम ज्यादा जरूरी हैं, तो मैं नौकरी छोड़ देती हूँ। फिर पूरा समय घर को दे दूँगी।”
यह सुनते ही कमला जी के चेहरे का रंग बदल गया।
उन्हें याद आया—घर का लोन, खर्चे, सुविधाएं—सब कुछ प्रिया और रवि की कमाई से ही चल रहा है।
उन्होंने तुरंत अपना लहजा बदला और कहा,
“अरे नहीं-नहीं, नौकरी क्यों छोड़ोगी? तुम काम करती हो, ये बहुत अच्छी बात है।”
फिर उन्होंने नेहा से कहा,
“जा बेटा, प्रिया के लिए चाय बना ला। और हाँ, खाना बाहर से ही मंगवा लेते हैं।”
प्रिया पहली बार मुस्कुराई।
उस दिन उसने सिर्फ आराम नहीं किया, बल्कि अपनी अहमियत भी समझी—और दूसरों को भी समझा दी।
उसके बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा। अब काम बाँटे जाने लगे, और प्रिया से पहले पूछ लिया जाता कि वह कैसी है।
सीख:
जब आप खुद अपनी इज़्ज़त करना शुरू करते हैं, तभी दुनिया भी आपकी कदर करना सीखती है। हर बार सहना मजबूरी नहीं, कभी-कभी ‘ना’ कहना भी जरूरी होता है।

Post a Comment