पुराने संदूक की चाबी

 

Indian woman giving an inspirational speech on stage in a community hall while people listen and clap


आँगन में रखे पुराने संदूक की चाबी आज फिर गायब थी।


सरिता ने पूरे घर में ढूँढ लिया था—रसोई के शेल्फ से लेकर अलमारी के ऊपर तक। मगर चाबी कहीं नहीं मिली।


वह थोड़ा झुंझलाकर बोली,

“अरे मोहित! तुमने कहीं देखा है क्या उस पुराने संदूक की चाबी?”


मोहित मोबाइल में गेम खेल रहा था। बिना ऊपर देखे बोला,

“माँ, उस पुराने कबाड़ में क्या रखा है? फेंक ही दो उसे।”


सरिता कुछ पल चुप रह गई।


उस संदूक को उसने ऐसे देखा जैसे उसमें सिर्फ सामान नहीं, उसका पूरा जीवन रखा हो।


“कबाड़ नहीं है वो,” उसने धीमे से कहा, “उसमें तुम्हारे पापा की यादें हैं।”


मोहित ने मोबाइल नीचे रखा। उसे समझ आ गया कि माँ फिर भावुक हो जाएँगी।


सरिता के पति अरुण का निधन चार साल पहले हो गया था। एक सड़क दुर्घटना में।


उसके बाद सरिता ने ही सिलाई करके घर चलाया। लोगों के कपड़े सिलती, फॉल लगाती, ब्लाउज बनाती।


धीरे-धीरे उसने मोहल्ले में अपना छोटा सा नाम बना लिया था।


मोहित इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। कॉलेज की फीस, किताबें, हॉस्टल—सब कुछ सरिता की सिलाई से चलता था।


मोहित कभी-कभी सोचता था कि माँ इतनी मेहनत क्यों करती हैं।


एक दिन उसने कहा भी था,

“माँ, इतना काम मत किया करो। थक जाती हो।”


सरिता हँस दी थी।


“थकान तब लगती है जब मन खाली हो। जब बच्चों का भविष्य बनाना हो ना, तब हाथ अपने-आप चलते रहते हैं।”


उसी शाम दरवाज़े पर दस्तक हुई।


मोहल्ले की शांता चाची खड़ी थीं।


“सरिता, मेरी बहू की शादी है अगले महीने। दस-बारह साड़ी का फॉल लगवाना है।”


सरिता ने मुस्कुराकर कहा,

“ले आओ चाची, हो जाएगा।”


काम बढ़ता जा रहा था।


रात के ग्यारह बजे तक सिलाई मशीन चलती रहती।


मोहित कई बार जाग जाता और देखता—माँ अब भी मशीन चला रही हैं।


“सो जाओ माँ,” वह कहता।


सरिता बस इतना बोलती,

“बस ये आखिरी पीस है।”


एक दिन मोहल्ले में रहने वाली कॉलेज की लड़की रिया सरिता के घर आई।


रिया सोशल मीडिया पर वीडियो बनाती थी।


वह बोली,

“आंटी, आप इतना सुंदर ब्लाउज बनाती हो। क्या मैं आपका वीडियो बना सकती हूँ?”


सरिता चौंक गई।


“अरे नहीं बेटा, मैं कहाँ कैमरे-वामरे में आती हूँ।”


रिया हँस पड़ी।


“आंटी, आप समझ नहीं रही हो। लोग सीखना चाहते हैं ये सब।”


सरिता ने मना कर दिया।


“मुझे नहीं आता ये सब।”


मोहित यह सब सुन रहा था।


उसके मन में एक विचार आया।


अगले दिन उसने चुपके से माँ का सिलाई करते हुए छोटा सा वीडियो बना लिया।


माँ कपड़े पर निशान लगा रही थीं और समझा रही थीं—


“ब्लाउज काटते समय सबसे जरूरी चीज़ होती है नाप। अगर नाप सही हो जाए तो आधा काम वहीं पूरा हो जाता है।”


मोहित ने वह वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया।


चैनल का नाम रखा—

“माँ के हाथ”


पहले दिन कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई।


दूसरे दिन भी कुछ खास नहीं हुआ।


तीसरे दिन अचानक वीडियो पर हजारों व्यू आने लगे।


लोग कमेंट कर रहे थे—


“मेरी माँ भी ऐसे ही सिलाई करती थीं।”


“इतना साफ तरीका किसी ने नहीं समझाया।”


“आंटी को सलाम।”


मोहित खुश हो गया।


उसने माँ को बताया।


सरिता घबरा गई।


“तुमने मेरा वीडियो इंटरनेट पर डाल दिया?”


“हाँ माँ… लोग बहुत पसंद कर रहे हैं।”


सरिता को विश्वास नहीं हुआ।


“मुझे दिखाओ।”


मोहित ने फोन में वीडियो दिखाया।


हजारों लाइक्स देखकर सरिता की आँखें फैल गईं।


“इतने लोग… देख रहे हैं?”


मोहित मुस्कुराया।


“हाँ माँ।”


धीरे-धीरे चैनल पर और वीडियो आने लगे।


सरिता अलग-अलग चीजें सिखाने लगी—


ब्लाउज काटना

पेटीकोट बनाना

पुरानी साड़ी से नया सूट बनाना


लोगों को बहुत पसंद आने लगा।


एक दिन एक कंपनी ने मेल भेजा।


“हम आपके चैनल को स्पॉन्सर करना चाहते हैं।”


मोहित ने जब बताया कि कंपनी पचास हजार रुपये देने को तैयार है, तो सरिता चुप रह गई।


“इतने पैसे…?”


मोहित ने कहा,

“हाँ माँ, सिर्फ एक वीडियो के लिए।”


सरिता ने धीरे से कहा,


“मैं तो इतने पैसे महीने भर सिलाई करके भी नहीं कमाती।”


उस दिन पहली बार उसने महसूस किया कि उसका हुनर सिर्फ मोहल्ले तक सीमित नहीं है।


कुछ महीनों में चैनल बहुत लोकप्रिय हो गया।


लाखों लोग वीडियो देखने लगे।


एक दिन एक बुजुर्ग महिला का मैसेज आया—


“बेटा, मेरी आँखें कमजोर हो गई हैं। मैं सिलाई छोड़ चुकी थी। पर तुम्हारी माँ का वीडियो देखकर फिर से मशीन निकाली है।”


सरिता ने जब यह पढ़ा तो उसकी आँखें भर आईं।


“सोचो मोहित… किसी ने फिर से सिलाई शुरू की।”


मोहित बोला,


“माँ, यही तो आपकी असली कमाई है।”


कुछ समय बाद सरिता को एक सिलाई स्कूल से बुलावा आया।


उन्हें बच्चों को सिखाने के लिए कहा गया।


मंच पर खड़ी सरिता थोड़ी घबराई हुई थी।


उसने माइक्रोफोन पकड़ा और कहा—


“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी सिलाई मशीन मुझे यहाँ तक ले आएगी।”


“मैं तो बस अपने बेटे का भविष्य बनाने के लिए काम करती थी।”


फिर उसने मुस्कुराकर कहा—


“पर आज समझ आया… कि जब हम दिल से काम करते हैं, तो वह सिर्फ घर नहीं चलाता… वह दुनिया से जोड़ देता है।”


लोगों ने तालियाँ बजाईं।


घर लौटते समय सरिता ने वही पुराना संदूक खोला।


इस बार चाबी मिल गई थी।


अंदर अरुण की पुरानी डायरी रखी थी।


उसमें एक लाइन लिखी थी—


“सरिता के हाथों में जादू है। एक दिन दुनिया इसे जरूर देखेगी।”


सरिता की आँखों से आँसू गिर पड़े।


मोहित ने धीरे से पूछा,


“क्या लिखा है माँ?”


सरिता मुस्कुराई।


“तुम्हारे पापा को मुझ पर मुझसे ज्यादा भरोसा था।”


मोहित ने माँ को गले लगा लिया।


और उस घर में जहाँ कभी सिर्फ सिलाई मशीन की आवाज़ आती थी…


अब वहाँ उम्मीद, हौसले और नए सपनों की आवाज़ भी सुनाई देने लगी।





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