समोसे की खुशबू

 

Hardworking village woman cooking hot samosas at a small roadside stall while an elderly man smiles and villagers gather to buy food on a cold winter morning.



सर्दियों की एक ठंडी सुबह थी।

गांव की कच्ची गलियों में हल्का-हल्का कोहरा फैला हुआ था। दूर कहीं चूल्हों से उठता धुआँ आसमान में घुल रहा था।


उसी गांव के एक छोटे से टूटे-फूटे घर में सोनिया चूल्हे के पास बैठी रोटी सेक रही थी। उसके पास उसकी दो साल की बेटी गुड़िया बैठी थी, जो बार-बार खाँस रही थी। दूसरी तरफ पाँच साल की बेटी पायल अपनी दादी के पास बैठी थी।


सोनिया की सास शारदा जी धीरे से बोलीं,

“बेटा सोनिया, आज गुड़िया की तबियत ठीक नहीं लग रही। इसे बुखार भी है।”


सोनिया ने बच्ची का माथा छूकर देखा।

“हाँ माजी, बहुत तेज़ बुखार है। लेकिन क्या करूँ, अगर आज काम पर नहीं गई तो घर में खाने तक के पैसे नहीं आएँगे।”


इतना कहकर सोनिया ने जल्दी-जल्दी रोटियाँ बनाई, सबको खाना दिया और अपनी बच्ची को गोद में लेकर काम की तलाश में निकल पड़ी।


गांव की हर गली में सोनिया ने दरवाज़े खटखटाए।


“बहन जी, अगर आपको कामवाली चाहिए तो मुझे रख लीजिए। मैं झाड़ू-पोछा, बर्तन सब कर दूँगी।”


लेकिन हर जगह उसे एक ही जवाब मिला।


“नहीं सोनिया, हमें कामवाली नहीं चाहिए।”


कुछ लोग तो उसके पति की बीमारी का नाम सुनते ही दरवाज़ा बंद कर देते थे।


थकी-हारी सोनिया आखिर गांव के बस स्टैंड के पास बैठ गई। ठंडी हवा चल रही थी और उसकी बच्ची उसकी गोद में सिमटकर सो गई थी।


तभी उसकी नज़र सामने एक छोटी सी समोसे की दुकान पर पड़ी।


दुकान पर एक बूढ़ा आदमी समोसे तल रहा था और आवाज़ लगा रहा था—


“आओ भाई… गरमा-गरम समोसे!”


लेकिन दुकान पर ज़्यादा ग्राहक नहीं थे।


सोनिया धीरे से उसके पास गई।


“बाबा, अगर आपको बुरा न लगे तो मैं एक बात कहूँ?”


बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।


“हाँ बेटा, बोलो।”


सोनिया बोली,

“मैं खाना बनाने में अच्छी हूँ। अगर आप चाहें तो मैं आपके लिए समोसे बना सकती हूँ।”


बूढ़ा आदमी हँस पड़ा।


“अरे बेटा, समोसे बनाना इतना आसान नहीं होता।”


सोनिया ने धीरे से कहा,

“अगर आप इजाज़त दें तो मैं बनाकर दिखा दूँ?”


बूढ़े ने सोचा, फिर बोला,

“ठीक है, बना कर दिखाओ।”


सोनिया ने आटा गूंथा, आलू का मसाला तैयार किया और समोसे बनाने लगी।


कुछ ही देर में गरमा-गरम समोसे कड़ाही में तलने लगे। उनकी खुशबू दूर तक फैल गई।


सोनिया ने फिर जल्दी से वही मसाला मिर्च भी बना दी, जो उसकी सास ने उसे सिखाई थी।


थोड़ी ही देर में वहाँ ग्राहकों की भीड़ लग गई।


“भाई साहब, चार समोसे देना!”


“मुझे भी दो प्लेट!”


“वाह! आज तो समोसे बहुत स्वादिष्ट हैं!”


सब लोग समोसे और मसाला मिर्च की बहुत तारीफ कर रहे थे।


बूढ़ा आदमी हैरान होकर सोनिया की तरफ देखने लगा।


“बेटा, तेरे हाथ में तो सच में जादू है।”


उस दिन सारी समोसे जल्दी बिक गए।


शाम को बूढ़े ने सोनिया को पैसे देते हुए कहा,


“अगर तू चाहे तो रोज़ मेरे साथ काम कर सकती है। हम दोनों मिलकर यह दुकान चलाएँगे।”


सोनिया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।


“सच बाबा?”


“हाँ बेटा।”



धीरे-धीरे उस दुकान के समोसे पूरे गांव में मशहूर हो गए।


लोग दूर-दूर से समोसे खाने आने लगे।


कुछ ही महीनों में दुकान अच्छी चलने लगी।


एक दिन बूढ़े बाबा ने सोनिया से कहा,


“बेटा, अब यह दुकान आधी तेरी भी है। तूने इसे इतना चलाया है।”


सोनिया को विश्वास ही नहीं हो रहा था।


अब उसके घर की हालत भी सुधरने लगी।


उसने अपने पति मोहन का इलाज शुरू करवाया।

धीरे-धीरे मोहन की तबियत भी ठीक होने लगी।


बच्चियाँ स्कूल जाने लगीं और घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।



एक दिन सोनिया उसी रास्ते से गुजर रही थी जहाँ कभी उसे काम माँगने पर लोगों ने धक्के देकर भगा दिया था।


वहीं कुछ लोग उसके पास आए और बोले,


“सोनिया, अगर हमारे घर काम करना चाहो तो आ जाना।”


सोनिया मुस्कुरा दी।


“अब मैं कामवाली नहीं… समोसे वाली सोनिया हूँ।”


पास खड़ी उसकी बेटी हँसते हुए बोली,


“मेरी मम्मी के समोसे पूरे गांव में सबसे अच्छे हैं!”


सोनिया ने अपनी बेटी को प्यार से गले लगा लिया।


ठंडी हवा चल रही थी…

लेकिन आज उस हवा में संघर्ष नहीं, बल्कि जीत की खुशबू थी।


सीख:

मेहनत, धैर्य और हिम्मत के बल पर इंसान सबसे कठिन परिस्थितियों को भी बदल सकता है और अपनी किस्मत खुद बना सकता है।





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