रिश्तों की असली समझ

 

Indian family moment where a young woman talks with her mother-in-law about giving a small gift to her sister, emotional household discussion scene.



दोपहर का समय था।

घर के आँगन में हल्की धूप फैली हुई थी और नीम के पेड़ की छाया जमीन पर हिलती हुई दिखाई दे रही थी।


रसोई में खड़ी राधिका चाय बना रही थी। तभी बाहर से उसकी सास शारदा देवी की तेज आवाज सुनाई दी—


“अरे राधिका…! जरा इधर तो आना।”


राधिका ने गैस धीमी की और बाहर आकर बोली,

“जी मम्मी जी, क्या हुआ?”


शारदा देवी के हाथ में एक छोटा सा डिब्बा था। उन्होंने डिब्बा मेज पर रखते हुए कहा—


“ये क्या है? पड़ोस वाली सविता बता रही थी कि तुम कल अपने मायके जाते समय ये डिब्बा लेकर गई थी और वहां अपने भतीजे को दे आई।”


राधिका थोड़ी चौंकी। फिर शांत आवाज में बोली—


“जी मम्मी जी… वो बस एक छोटा सा खिलौना था। भैया का बेटा बहुत दिनों से कह रहा था कि बुआ कुछ लेकर आए।”


“खिलौना?” शारदा देवी ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा।

“खिलौना मुफ्त में मिलता है क्या? कम से कम पाँच-छह सौ का होगा।”


उसी समय राधिका का पति आदित्य भी ऑफिस से लौटकर घर में घुसा। माहौल देखकर वो समझ गया कि फिर वही बात शुरू हो गई है।


शारदा देवी ने तुरंत कहा—


“लो आ गया तुम्हारा पति। इसे ही पूछो। इसकी कमाई ऐसे ही खर्च करती रहती है तुम्हारी बीवी।”


आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा,

“क्या हुआ मम्मी?”


“क्या हुआ? तुमसे छुपाकर तुम्हारी बीवी अपने मायके खिलौने लेकर जाती है। और तुम चुप बैठे रहते हो।”


राधिका ने तुरंत कहा—

“मैंने कुछ छुपाया नहीं है। आदित्य को पहले ही बता दिया था।”


आदित्य ने सिर हिलाया—

“हाँ मम्मी, मुझे पता था।”


शारदा देवी थोड़ी और नाराज़ हो गईं—

“तुम दोनों को समझ ही नहीं है। बहन-बेटियों से कुछ लिया नहीं जाता। हम लोग तो अपने जमाने में मायके जाते थे तो उल्टा हमें ही कितना कुछ देकर भेजा जाता था।”


राधिका चुप हो गई। वो जानती थी कि सास का स्वभाव ऐसा ही है। उन्हें लगता था कि मायके में कुछ देना मतलब ससुराल का पैसा खर्च करना।


कुछ देर बाद राधिका अपने कमरे में चली गई।


आदित्य भी उसके पीछे आ गया और बोला—


“तुम परेशान मत हो। मम्मी को बस आदत है ऐसा बोलने की।”


राधिका ने धीरे से कहा—


“मैं समझती हूँ। पर हर बार ऐसा सुनना अच्छा नहीं लगता। भैया का बेटा छोटा है। अगर मैं उसके लिए एक खिलौना ले जाऊँ तो क्या गलत है?”


आदित्य ने कहा—

“गलत तो कुछ भी नहीं है।”


दिन गुजरते गए।


कुछ ही दिनों बाद खबर आई कि राधिका की छोटी बहन नेहा की सगाई तय हो गई है। घर में खुशी का माहौल था।


राधिका बहुत खुश थी। वो चाहती थी कि बहन के लिए कोई अच्छा सा तोहफा ले जाए।


एक दिन वो बाजार गई और अपनी बचत से एक सुंदर चांदी का कंगन खरीद लाई।


जब वो घर लौटी तो शारदा देवी ने पूछ लिया—


“कहाँ गई थी?”


“मम्मी जी… नेहा के लिए कंगन लेने गई थी।”


“क्या?” शारदा देवी ने चौंककर कहा।

“कंगन? वो भी चांदी का?”


राधिका ने शांत स्वर में कहा—

“जी… बस छोटा सा तोहफा है।”


शारदा देवी ने तुरंत आदित्य को आवाज लगाई—


“आदित्य… जरा इधर आओ। सुनो तुम्हारी बीवी क्या कर रही है।”


आदित्य बाहर आया।


“ये अपनी बहन के लिए चांदी का कंगन खरीद लाई है।”


आदित्य ने कंगन देखा और बोला—

“अच्छा है।”


“अच्छा है?” शारदा देवी ने कहा।

“तुम्हें समझ नहीं है क्या? मायके वाले क्या तुम्हारी बीवी से तोहफे लेंगे?”


राधिका धीरे से बोली—


“मम्मी जी… वो मेरी छोटी बहन है। उसकी सगाई है। मैं उसे कुछ दूँगी तो उसे अच्छा लगेगा।”


“पर रिवाज भी कोई चीज होती है।” शारदा देवी बोलीं।


राधिका ने पहली बार थोड़ा खुलकर कहा—


“रिवाज अगर रिश्तों को खुश करने से रोक दे तो वो रिवाज किस काम का?”


घर में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।


आदित्य ने भी धीरे से कहा—


“मम्मी… अगर राधिका अपनी बहन को कुछ देना चाहती है तो देने दीजिए। इसमें बुरा क्या है?”


शारदा देवी ने गहरी सांस ली।


“तुम लोग नए जमाने के हो। तुम्हें क्या समझ आएगा।”


कुछ दिन बाद नेहा की सगाई थी।


जब राधिका और आदित्य वहां पहुँचे तो राधिका ने मुस्कुराते हुए कंगन नेहा को दे दिया।


नेहा की आँखों में खुशी आ गई।


उसने कहा—


“दीदी… इसकी क्या जरूरत थी?”


राधिका ने हँसते हुए कहा—

“जरूरत नहीं थी… मन था।”


सगाई के बाद जब सब लोग बातें कर रहे थे तो नेहा की सास राधिका के पास आईं और बोलीं—


“बहुत अच्छे संस्कार हैं आपके। आजकल लोग मायके वालों को भूल जाते हैं।”


ये बात आदित्य ने भी सुनी।


जब दोनों घर लौटे तो आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा—


“देखा… आज तुम्हारे तोहफे से सब खुश हो गए।”


राधिका बोली—


“तोहफे की कीमत से ज्यादा भावना की कीमत होती है।”


उसी समय शारदा देवी भी उनकी बातें सुन रही थीं।


वो कुछ देर चुप रहीं।


फिर धीरे से बोलीं—


“शायद मैं ही पुराने विचारों में अटक गई थी।”


राधिका ने तुरंत कहा—


“नहीं मम्मी जी… आपकी सोच गलत नहीं है। बस समय थोड़ा बदल गया है।”


शारदा देवी ने हल्की मुस्कान दी।


“चलो अच्छा है… कम से कम रिश्ते तो मजबूत हो रहे हैं।”


उस दिन के बाद शारदा देवी ने राधिका को कभी मायके में तोहफा ले जाने से नहीं रोका।


क्योंकि उन्हें भी समझ आ गया था—


रिश्ते पैसे से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं।






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