दूरी नहीं, अपनापन जरूरी है
आँगन में रखे तुलसी के पास दिया बुझ चुका था, लेकिन घर के अंदर माहौल अभी भी भारी था। अलका रसोई में चुपचाप खड़ी थी। हाथ काम कर रहे थे, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था।
“अलका, ज़रा इधर आना,” सास सुशीला जी की आवाज़ आई।
अलका तुरंत हाथ पोंछते हुए बाहर आई,
“जी मम्मी जी?”
“तुम्हारे पापा का फोन आया था… तुम्हारी छोटी बहन की सगाई तय हो गई है,” सुशीला जी ने कहा।
अलका के चेहरे पर एक पल में चमक आ गई,
“सच में मम्मी जी? कब है सगाई?”
“परसों,” जवाब आया।
खुशी के साथ ही उसके चेहरे पर हल्की चिंता भी आ गई। वह कुछ बोलते-बोलते रुक गई।
“क्या हुआ?” सुशीला जी ने पूछा।
“कुछ नहीं… बस ऐसे ही,” अलका ने बात टाल दी।
तभी उसकी ननद प्रीति वहाँ आ गई। उसने पूरी बात सुन ली थी।
“मम्मी, अब देखना… भाभी फिर मायके जाने की तैयारी करेंगी,” उसने हल्के ताने के साथ कहा।
अलका चुप रही। उसकी नजरें झुक गईं।
सुशीला जी ने प्रीति की तरफ देखा,
“तो क्या हुआ? बहन की सगाई है, जाएगी ही।”
“मम्मी, हर बार यही होता है। कभी कोई फंक्शन, कभी कोई बहाना… भाभी को तो बस मायके जाना होता है,” प्रीति ने नाराज़गी जताई।
अलका के दिल को ये बात चुभ गई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
रात को जब सब लोग खाने की मेज पर बैठे, तब भी घर का माहौल भारी ही बना हुआ था। अलका चुपचाप सबको खाना परोस रही थी, लेकिन उसके चेहरे की खामोशी साफ बता रही थी कि उसके मन में बहुत कुछ चल रहा है।
खाना खत्म होने के बाद, सुशीला जी ने प्रीति को अपने कमरे में बुलाया।
“प्रीति, तुझे अलका के मायके जाने से इतनी परेशानी क्यों है?” उन्होंने सीधे पूछा।
प्रीति ने बिना झिझक जवाब दिया—
“क्योंकि उनके जाने के बाद घर का सारा काम मुझ पर आ जाता है। और फिर… ऐसा लगता है जैसे उन्हें इस घर से ज्यादा अपने मायके की परवाह है।”
सुशीला जी कुछ देर चुप रहीं, फिर धीरे से बोलीं—
“तुझे पता है, जब मैं इस घर में आई थी ना… तब मुझे अपने मायके जाने के लिए कितनी बार मना किया गया।”
प्रीति ने आश्चर्य से पूछा—
“सच में?”
“हाँ,” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“तेरी दादी बहुत सख्त थीं। उन्हें लगता था कि बहू का बार-बार मायके जाना ठीक नहीं।”
उनकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई—
“एक बार मेरे भाई की शादी थी… मैं बहुत जाना चाहती थी। लेकिन मुझे नहीं जाने दिया गया। उस दिन मैं कमरे में बैठकर बहुत रोई थी।”
प्रीति अब ध्यान से सुन रही थी।
“उस दिन मैंने मन ही मन एक बात तय की थी—अगर कभी मैं सास बनूँगी, तो अपनी बहू को कभी उसके मायके जाने से नहीं रोकूँगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“प्रीति, मायका सिर्फ एक घर नहीं होता… वो हमारी जड़ होता है। वहाँ जाकर हम खुद को फिर से महसूस करते हैं।”
प्रीति की आँखें नरम पड़ गईं।
“और जहाँ तक काम की बात है…” सुशीला जी ने कहा,
“घर के काम हम सब मिलकर भी तो कर सकते हैं।”
अगले दिन सुबह, अलका चुपचाप अपना काम कर रही थी। उसने पहले से ज्यादा काम निपटा दिया था—सब्ज़ी बना दी, आटा गूँथ दिया, घर भी साफ कर दिया।
वह जाने की तैयारी कर ही रही थी कि पीछे से आवाज़ आई—
“भाभी…”
अलका ने मुड़कर देखा—प्रीति खड़ी थी।
“आप आराम से तैयार हो जाओ… बाकी का काम मैं संभाल लूंगी,” प्रीति ने कहा।
अलका हैरान रह गई,
“नहीं, मैं सब कर दूंगी…”
“कहा ना, मैं कर लूंगी,” प्रीति ने मुस्कुराते हुए कहा,
“और हाँ… सगाई में अच्छे से enjoy करना।”
अलका की आँखें भर आईं।
“धन्यवाद,” उसने धीमे से कहा।
प्रीति ने हल्के मजाक में कहा—
“बस धन्यवाद से काम नहीं चलेगा… मेरे लिए भी कुछ अच्छा सा लेकर आना पड़ेगा।”
दोनों हँस पड़ीं।
जब अलका मायके गई, तो इस बार उसके मन में कोई बोझ नहीं था। वह पूरी तरह खुश थी।
सगाई में उसने खुलकर हँसी, परिवार के साथ समय बिताया, और जब वापस लौटी—तो चेहरे पर सुकून साफ दिख रहा था।
घर पहुँचते ही उसने सबसे पहले प्रीति को गले लगा लिया।
“तुमने मेरा दिल हल्का कर दिया,” उसने कहा।
प्रीति मुस्कुराई—
“अब समझ में आ गया है भाभी… मायका छूटता नहीं, बस थोड़ा दूर हो जाता है।”
सुशीला जी दरवाजे पर खड़ी ये सब देख रही थीं। उनके चेहरे पर गर्व था।
उन्होंने मन ही मन कहा—
“रिश्ते तब मजबूत होते हैं, जब हम किसी को बाँधते नहीं… बल्कि समझते हैं।”

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