बिना सास के भी सास
सुबह का समय था।
खिड़की से हल्की धूप कमरे में आ रही थी और बाहर सड़क पर दूधवाले की साइकिल की घंटी सुनाई दे रही थी।
एकता अभी गहरी नींद में थी। तभी कमरे का दरवाज़ा जोर से खुला।
“एकता… अभी तक सो रही हो?”
एकता ने करवट बदलते हुए कहा,
“अरे अभी तो सात ही बजे हैं।”
पति रोहित ने घड़ी दिखाते हुए कहा,
“सात बजे बहुत होते हैं। घर की बहू को जल्दी उठना चाहिए। कम से कम छह बजे तो उठ जाया करो।”
एकता मन ही मन सोचने लगी — सास साथ नहीं रहती, फिर भी सास वाली बातें कौन कर रहा है?
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप उठकर किचन में चली गई।
थोड़ी देर बाद रोहित फिर किचन में आ गया।
“आज नाश्ते में क्या बना रही हो?”
“पराठे बना रही हूँ,” एकता ने जवाब दिया।
रोहित तुरंत बोला,
“रोज़ पराठे! थोड़ा बदलाव किया करो। कभी पोहा, कभी उपमा, कभी इडली भी बना लिया करो।”
एकता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“ठीक है महाराज, कल से होटल जैसा मेनू भी बना दूँगी।”
रोहित ने बात समझी नहीं और चाय पीते हुए अखबार पढ़ने लगा।
कुछ देर बाद एकता पूजा करके प्रसाद देने कमरे में गई तो देखा कि रोहित फोन पर अपनी माँ से बात कर रहा है।
“हाँ माँ, मैंने उसे कह दिया है कि सुबह जल्दी उठा करे। घर का मंदिर भी साफ रखा करे। आपकी तरह सब सीख जाएगी।”
एकता यह सुनकर चुप हो गई।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसका पति अपनी माँ से हर बात की रिपोर्ट करता है।
थोड़ी देर बाद उसने रोहित से कहा,
“सुनिए, आज घर का सारा काम हो गया है। मुझे मेरी सहेली सीमा के घर छोड़ दीजिए।”
रोहित बोला,
“अरे अभी से घूमने की क्या जरूरत है? होली आने वाली है। बाजार से सामान लाना है, पापड़ बनाने हैं, नमकीन बनानी है।”
एकता ने थोड़ा नाराज़ होकर कहा,
“अगर आप नहीं ले जाएंगे तो मैं खुद चली जाऊँगी।”
रोहित ने गहरी सांस ली और बोला,
“अच्छा ठीक है, चलो छोड़ देता हूँ।”
कुछ देर बाद वह एकता को सीमा के घर छोड़ आया।
सीमा अपनी सास के साथ बैठकर बातें कर रही थी।
“अरे एकता! आओ आओ,” सीमा खुशी से बोली।
सीमा की सास ने भी प्यार से कहा,
“आओ बेटा, बहुत दिनों बाद आई हो।”
फिर वह बोलीं,
“तुम लोग बातें करो, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।”
जैसे ही सास किचन में गईं, एकता ने लंबी सांस ली।
सीमा ने पूछा,
“क्या हुआ? परेशान लग रही हो।”
एकता बोली,
“यार, मेरी जिंदगी तो मुश्किल हो गई है।”
सीमा हँसकर बोली,
“अरे तेरे तो मजे हैं। तू तो पति के साथ अकेली रहती है। न सास, न ससुर।”
एकता ने सिर हिलाते हुए कहा,
“मजे? मेरा पति ही सास बन गया है।”
सीमा हँसते-हँसते बोली,
“मतलब?”
एकता बोली,
“सुबह जल्दी उठो, ये बनाओ, वो बनाओ, घर ऐसा रखो, वैसा रखो। ऊपर से अपनी माँ को मेरी चुगली भी करता है।”
सीमा बोली,
“मतलब रिमोट तेरे पति के हाथ में नहीं, तेरी सास के हाथ में है।”
दोनों हँसने लगीं।
फिर सीमा ने धीरे से एकता के कान में एक योजना बताई।
अगले दिन सुबह एकता अचानक जोर-जोर से कराहने लगी।
“अरे मेरी टांग… बहुत दर्द हो रहा है।”
रोहित घबरा गया।
“क्या हुआ तुम्हें?”
एकता बोली,
“लगता है मोच आ गई है। मैं तो उठ भी नहीं पा रही।”
रोहित ने तुरंत अपनी माँ को फोन किया।
“माँ, आप कुछ दिनों के लिए यहाँ आ जाओ। एकता की तबीयत ठीक नहीं है।”
दो दिन बाद रोहित की माँ आ गईं।
रोहित बोला,
“माँ, आप ही इसे सिखाइए। आपकी तरह सब काम करना सीख जाएगी।”
माँ मुस्कुरा दीं।
लेकिन अगले ही दिन असली कहानी शुरू हुई।
सुबह नौ बजे तक सासु माँ सोती रहीं।
रोहित हैरान था।
“माँ, आप अभी तक सो रही हैं?”
माँ बोलीं,
“बेटा, मेरी आदत है देर से उठने की।”
रोहित चुप हो गया।
उस दिन नाश्ता भी बाहर से आया और रात का खाना भी।
तीन दिन बाद रोहित परेशान हो गया।
घर बिखरा रहता, खाना देर से बनता।
एक दिन उसने खुद ही कहा,
“माँ, सच कहूँ तो एकता ही ठीक थी। वह धीरे-धीरे सही, पर सब काम अच्छे से कर लेती थी।”
माँ हँसते हुए बोलीं,
“बेटा, घर संभालना इतना आसान नहीं होता।”
कुछ दिनों बाद माँ वापस अपने घर चली गईं।
एकता भी ठीक हो गई।
उस दिन रोहित चुपचाप किचन में आया और बोला,
“एकता… अगर कभी देर से उठ जाओ तो कोई बात नहीं।”
एकता मुस्कुरा दी।
उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी लोगों को समझाने के लिए शब्द नहीं, अनुभव जरूरी होता है।
सीख:
कभी-कभी हमें जो आसान लगता है, उसे निभाना उतना आसान नहीं होता। इसलिए दूसरों की मेहनत की कदर करनी चाहिए।

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