घर की चाबी
“सुनो सुमन… ये अलमारी की चाबी तुमने ली थी क्या?”
राजेश ने कमरे में आते ही पूछा।
सुमन रसोई में रोटियाँ बेल रही थी। उसने बिना पीछे देखे कहा —
“नहीं, मैंने नहीं ली।”
राजेश थोड़ा परेशान होकर बोला —
“अजीब बात है… सुबह यहीं रखी थी।”
तभी बाहर आंगन में बैठी सास सावित्री देवी बोलीं —
“चाबी मैंने रख ली है।”
राजेश बाहर आया —
“आपने क्यों रख ली मां?”
सावित्री देवी बोलीं —
“क्योंकि घर की अलमारी की चाबी अब मेरे पास ही रहेगी।”
राजेश चौंक गया।
“लेकिन मां, उसमें तो हमारे जरूरी कागज़ और पैसे रहते हैं।”
सावित्री देवी बोलीं —
“घर मेरा है… इसलिए चाबी भी मेरे पास रहेगी।”
सुमन चुपचाप सब सुन रही थी।
उसे यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
दरअसल, राजेश की शादी को अभी एक साल ही हुआ था। वह शहर में नौकरी करता था, लेकिन उसके माता-पिता गांव में ही रहते थे। शादी के बाद सुमन भी गांव में आकर ससुराल में रहने लगी थी।
शुरुआत में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। घर का माहौल भी सामान्य था और सुमन भी धीरे-धीरे नए घर में खुद को ढालने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन समय के साथ उसे महसूस होने लगा कि इस घर में उसकी कोई खास जिम्मेदारी या अधिकार नहीं है। घर के लगभग सभी फैसले सावित्री देवी ही करती थीं। किस दिन क्या बनेगा, क्या खरीदना है, कौन सा सामान कहाँ रखा जाएगा — हर छोटी-बड़ी बात वही तय करती थीं।
सुमन बस चुपचाप अपना काम करती रहती और ज्यादा कुछ कहे बिना घर के माहौल को समझने की कोशिश करती रहती।
एक दिन सुमन ने देखा कि घर में नया फ्रिज आ गया है।
वह खुश होकर बोली —
“अरे मांजी, नया फ्रिज आ गया!”
सावित्री देवी बोलीं —
“हाँ, मैंने खरीद लिया।”
सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा —
“अच्छा किया मांजी।”
लेकिन तभी सावित्री देवी बोलीं —
“लेकिन इसमें तुम्हारा कोई सामान नहीं रखा जाएगा।”
सुमन हैरान रह गई।
“क्यों मांजी?”
सावित्री देवी बोलीं —
“क्योंकि ये फ्रिज मैंने अपने पैसों से खरीदा है।”
सुमन चुप हो गई।
उसे पहली बार बहुत बुरा लगा।
शाम को राजेश घर आया।
सुमन ने धीरे से कहा —
“आपसे एक बात कहनी है।”
राजेश ने पूछा —
“क्या हुआ?”
सुमन बोली —
“इस घर में मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं मेहमान हूँ।”
राजेश हैरान रह गया।
“ऐसा क्यों कह रही हो?”
सुमन बोली —
“क्योंकि यहाँ किसी चीज़ पर मेरा हक नहीं है… न अलमारी पर, न फ्रिज पर… न फैसलों पर।”
राजेश कुछ देर चुप रहा।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि सुमन सच कह रही है।
अगली सुबह राजेश ने नाश्ते की मेज़ पर अपनी माँ से शांत स्वर में कहा,
“माँ, यह घर सिर्फ आपका ही नहीं है… अब सुमन भी इस घर की सदस्य है।”
सावित्री देवी ने उसकी ओर देखा और बोलीं,
“मैंने कब मना किया?”
राजेश ने धीरे से कहा,
“अगर ऐसा है, तो अलमारी की चाबी सुमन के पास भी होनी चाहिए। घर की जिम्मेदारी और अधिकार दोनों उसे मिलने चाहिए।”
सावित्री देवी कुछ क्षण चुप रहीं। उनके चेहरे पर सोच की हल्की-सी रेखा उभर आई।
फिर उन्होंने मेज़ पर रखी अलमारी की चाबी उठाई और धीरे से सुमन की ओर बढ़ा दी।
“लो बहू… अब यह तुम संभालो।”
सुमन एक पल के लिए चौंक गई। उसकी आँखें नम हो गईं।
उसने संकोच से चाबी लेते हुए धीमे स्वर में कहा,
“मांजी, मुझे चाबी नहीं चाहिए… बस इतना चाहिए कि आप मुझे अपना समझें।”
सावित्री देवी का चेहरा नरम पड़ गया। शायद उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था।
उन्होंने स्नेह से सुमन के सिर पर हाथ रखा और कहा,
“बहू, गलती मेरी ही थी। घर चलाने के लिए जिम्मेदारियाँ ही नहीं, अधिकार भी बांटने पड़ते हैं।”
उस क्षण घर का माहौल बदल गया।
सुमन के दिल में जो दूरी थी, वह जैसे पिघल गई।
और उस दिन पहली बार सुमन को सच में महसूस हुआ —
यह घर अब सिर्फ उसका ससुराल नहीं, बल्कि उसका अपना घर भी है।

Post a Comment