रिवाज से बड़ा रिश्ता
सुबह का समय था। घर के आँगन में हल्की धूप उतर रही थी, लेकिन उस धूप जैसी गर्माहट घर के माहौल में बिल्कुल नहीं थी। बैठक में अजीब-सी चुप्पी पसरी हुई थी। कोई ऊँची आवाज़ में झगड़ा नहीं कर रहा था, फिर भी हर कोने में तनाव महसूस हो रहा था।
कारण बहुत बड़ा नहीं था, पर बात दिल से जुड़ी थी। और जब बात दिल से जुड़ जाए, तब छोटी बात भी बड़ी बन जाती है।
हॉल में सोफे पर बैठे आदित्य का चेहरा उतरा हुआ था। सामने मेज पर रखा चाय का कप ठंडा हो चुका था। वह कई बार कुछ सोचता, फिर सिर पकड़कर बैठ जाता। उसकी पत्नी नेहा कमरे के अंदर थी और शायद अपना सामान समेट रही थी। आदित्य जानता था कि नेहा नाराज़ है, दुखी भी है, और इस बार उसकी नाराज़गी बेकार नहीं थी।
दो दिन बाद करवा चौथ था।
हर साल शादी के बाद से नेहा करवा चौथ अपने ससुराल में ही मनाती आई थी। आदित्य की मां, शारदा देवी, इस व्रत को बहुत मानती थीं। उनके लिए यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, घर की परंपरा थी। उनका मानना था कि घर की बहू का पहली पूजा से लेकर चांद देखने तक सब कुछ ससुराल में होना चाहिए। वही शुभ होता है, वही सही होता है।
लेकिन इस बार बात अलग थी।
नेहा की मां, सुधा जी, पिछले चार महीने से अकेली रह रही थीं। नेहा के पिता का अचानक बीमारी से निधन हो गया था। उसके बाद से घर का सारा सन्नाटा जैसे सुधा जी के हिस्से में आ गया था। दिन किसी तरह कट जाता, लेकिन शाम ढलते ही अकेलापन और गहरा जाता।
नेहा अपने मायके की इकलौती संतान थी। उधर आदित्य भी अपनी मां का इकलौता बेटा था। यही बात अब परेशानी बन रही थी। दोनों तरफ एक ही चाह थी—त्योहार अपने बच्चे के साथ मनाने की। और दोनों तरफ अपना-अपना दर्द भी था।
उसी समय नेहा कमरे से बाहर आई। उसके हाथ में कपड़ों का एक बैग था। आदित्य ने उसे देखते ही धीमे स्वर में कहा,
“नेहा, एक बार फिर सोच लो। बात बढ़ाने से क्या फायदा? मैंने कहा ना, मां की बात मैं कैसे टाल दूं? वह मेरी मां हैं। उनकी भावनाएं भी तो समझनी पड़ेंगी।”
नेहा ने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में आंसू तो नहीं थे, मगर पीड़ा साफ दिखाई दे रही थी।
“और मेरी मां की भावनाएं? उनकी कोई कीमत नहीं? पापा के जाने के बाद यह पहला करवा चौथ है। वह अकेली हैं। मैं वहां चली जाऊं, बस इतनी-सी बात कह रही हूं। इसमें ऐसा क्या गलत है?”
आदित्य चुप रहा।
नेहा की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई।
“तुम हमेशा कहते हो कि मैं इस घर की बहू हूं, जिम्मेदार हूं। ठीक है, हूं। लेकिन मैं किसी की बेटी भी हूं। क्या शादी के बाद बेटी होना खत्म हो जाता है?”
आदित्य ने तुरंत कहा, “ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम बात को समझो। मां को लगता है कि लोग क्या कहेंगे। रिश्तेदार क्या सोचेंगे। हर साल बहू यहां व्रत करती है, इस बार मायके चली गई तो...”
नेहा ने बीच में ही रोक दिया।
“तो लोग क्या सोचेंगे, यही सबसे बड़ा सच है? मेरी मां अकेली कैसी महसूस करेंगी, यह सच नहीं है?”
हॉल में फिर चुप्पी छा गई।
नेहा ने बैग उठाया और बोली, “तुम्हें जो सही लगता है करो। लेकिन मैं इस बार मां को अकेला छोड़कर त्योहार नहीं मना सकती।”
इतना कहकर वह अंदर चली गई।
आदित्य कुर्सी पर बैठा रह गया। वह जानता था कि नेहा गलत नहीं है। लेकिन बचपन से उसने मां की हर बात को नियम की तरह माना था। उसे लगता था कि मां को दुख देकर वह अच्छा बेटा नहीं रह पाएगा।
तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—मां।
उसने गहरी सांस लेकर फोन उठाया।
“हां मां।”
उधर से शारदा देवी की तेज आवाज़ आई, “क्या हुआ? बहू मान गई या अभी भी अपनी ही जिद पर अड़ी हुई है?”
आदित्य ने थके स्वर में कहा, “मां, वह सामान रख रही है। कह रही है कि मायके जाएगी।”
“देखा! मैंने पहले ही कहा था, आजकल की लड़कियां अपनी मनमानी करना चाहती हैं। अरे त्योहार कोई मजाक है क्या? घर की बहू घर में ही अच्छी लगती है। करवा चौथ का व्रत ससुराल में ही शुभ होता है।”
आदित्य ने धीरे से कहा, “मां, उसकी मां अकेली हैं...”
शारदा देवी ने तुरंत बात काट दी।
“अरे अकेली हैं तो क्या हुआ? हम भी तो अकेले रहते हैं। क्या हर बात पर मायके भागना ठीक है? शादी के बाद लड़की का घर उसका ससुराल होता है। यह बात बहू को समझनी पड़ेगी।”
आदित्य ने माथा पकड़ लिया। उसने कहा, “मां, मेरा सिर पहले ही बहुत दुख रहा है, आप अभी शांत रहिए।”
“तू उसके कारण परेशान मत हो। जरूरत पड़े तो तू अकेला ही आ जा। बहू को जाना है तो जाए। लेकिन मैं यह बात उसकी मां को भी समझाऊंगी।”
आदित्य चौक पड़ा। “नहीं मां, आप रहने दीजिए—”
लेकिन तब तक फोन कट चुका था।
आदित्य का दिल बैठ गया। उसे पूरा विश्वास था कि मां अब नेहा की मां को फोन जरूर करेंगी। उसने कई बार दोबारा फोन मिलाया, पर उधर से फोन नहीं उठा।
उधर कमरे में नेहा का भी फोन बजा। उसने देखा—मां।
उसका मन घबरा गया। उसने जल्दी से फोन उठाया।
“हां मां?”
सुधा जी की आवाज़ हमेशा की तरह नरम थी, लेकिन उसमें एक छिपी हुई थकान थी।
“बेटा, यह मैं क्या सुन रही हूं? तू करवा चौथ के लिए यहां आने की बात कर रही है? क्यों इतना मन खराब कर रही है?”
नेहा की आंखें भर आईं।
“मां, आप अकेली हैं। पापा के बिना यह पहला त्योहार है। मैं आपके पास नहीं आऊंगी तो कैसे रहूंगी?”
सुधा जी ने अपने स्वर को संभालते हुए कहा, “बेटा, मैं अकेली हूं, यह सच है। लेकिन तू वहां की बहू है। बड़े त्योहार पर बहू अपने घर में ही अच्छी लगती है। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तेरे ससुराल में कोई परेशानी हो।”
“पर मां...”
“नहीं बेटा, मेरी बात सुन। मां-बाप बच्चों को इसलिए पालते हैं कि एक दिन वे अपना घर बसा लें। तेरा घर अब वही है। मैं यहां ठीक हूं। तू अपनी सास की बात मान ले।”
नेहा कुछ पल चुप रही। उसे पता था, मां अपने मन की बात नहीं कह रहीं। वह उसे बोझ नहीं बनना चाहतीं। वह खुद अकेली रह लेंगी, लेकिन बेटी की जिंदगी में दरार नहीं आने देंगी।
“मां, आप सच में ठीक हैं?” नेहा ने कांपती आवाज़ में पूछा।
सुधा जी हल्का-सा हंसने की कोशिश करती हुई बोलीं, “मैं बिल्कुल ठीक हूं। तू बस खुश रह।”
फोन कट गया, मगर नेहा का मन और भारी हो गया।
दो दिन बाद आखिरकार वह आदित्य के साथ ससुराल पहुंच गई। बाहर से सब सामान्य दिख रहा था। घर में सफाई हो चुकी थी। आंगन में रंगोली की तैयारी थी। रसोई में पकवानों की खुशबू थी। शारदा देवी ने दरवाजे पर आरती की थाली लेकर उनका स्वागत किया।
“आओ बहू, अब घर में रौनक आ गई,” उन्होंने मुस्कराकर कहा।
नेहा ने भी मुस्कराने की कोशिश की, पर उसका मन साथ नहीं दे रहा था।
दिन भर वह चुपचाप काम में लगी रही। कभी सूखे मेवे निकालती, कभी पूजा का सामान सजाती, कभी रसोई में मदद करती। शारदा देवी खुश थीं कि बहू आ गई। आदित्य यह सब देख रहा था। एक तरफ मां के चेहरे की चमक थी, दूसरी तरफ नेहा की आंखों की बुझी हुई रोशनी।
शाम को आंगन में उनकी पांच साल की बेटी पाखी खेल रही थी। पाखी इस घर की जान थी। वह कभी दादी के पास भागती, कभी मां की गोद में आ जाती, कभी पापा का हाथ पकड़कर कुछ पूछने लगती।
शारदा देवी पाखी के साथ गुड़िया-गुड़िया खेल रही थीं। पाखी की हंसी सुनकर आदित्य का मन कुछ पल के लिए हल्का हुआ। लेकिन तभी उसके भीतर एक अजीब-सा विचार आया।
उसने पाखी को देखा और सोचा—यह भी तो हमारी इकलौती बेटी है। एक दिन इसकी भी शादी होगी। फिर यह किसी और घर जाएगी। अगर कभी इसके सामने भी ऐसा समय आया तो? अगर यह अपने मायके आना चाहे और उसका पति सिर्फ रिवाज का हवाला देकर मना कर दे तो?
यह सोचते ही आदित्य के भीतर कुछ कांप गया।
रात को खाना खाने के बाद सब लोग बैठे थे। पाखी दादी की गोद में थी। उसी समय आदित्य ने धीरे से कहा,
“मां, एक बात पूछूं?”
“हां पूछ,” शारदा देवी ने कहा।
“हमारी पाखी भी तो हमारी इकलौती बेटी है ना?”
शारदा देवी मुस्कराईं, “हां, तो?”
“कल को इसकी शादी हो जाएगी। यह अपने घर चली जाएगी। फिर अगर कभी इसे हमारी जरूरत पड़ी, तो क्या हम भी यह कहेंगे कि अब तेरा घर वहां है, यहां मत आ?”
शारदा देवी कुछ पल उसे देखती रह गईं।
“तू अचानक ऐसी बातें क्यों कर रहा है?” उन्होंने पूछा।
आदित्य ने गंभीर स्वर में कहा, “इसलिए मां, क्योंकि आज जो बात हम किसी और की बेटी के लिए कह रहे हैं, वही बात कल हमारी बेटी के सामने भी आ सकती है।”
हवा जैसे एक पल के लिए थम गई।
नेहा भी वहीं बैठी थी। उसने पहली बार आदित्य की तरफ उम्मीद से देखा।
आदित्य आगे बोला, “मां, आपने गलत सोचकर नहीं कहा। आप अकेली रहती हैं। त्योहार पर हमें अपने पास देखना चाहती हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन नेहा की मां भी तो अब अकेली हैं। उनका दुख छोटा कैसे हो गया?”
शारदा देवी चुप थीं।
आदित्य ने पहली बार बिना झिझक अपनी बात साफ कही—
“हर रिवाज की नींव रिश्तों को जोड़ने के लिए होती है, तोड़ने के लिए नहीं। अगर कोई परंपरा किसी अकेले इंसान का दुख बढ़ाने लगे, तो उसमें थोड़ा बदलाव करने में बुराई नहीं होनी चाहिए।”
शारदा देवी ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने तो वही कहा जो हमेशा से होता आया है।”
“तो फिर इस बार कुछ नया कर लेते हैं,” आदित्य बोला, “क्यों ना हम सुधा मां को यहीं बुला लें? त्योहार भी साथ मन जाएगा, आप भी अकेली नहीं रहेंगी, नेहा भी खुश रहेगी। और सबसे बड़ी बात—किसी को यह महसूस नहीं होगा कि उसे छोड़ दिया गया है।”
नेहा की सांस जैसे थम गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि आदित्य यह सब कह रहा है।
शारदा देवी ने सहजता से जवाब नहीं दिया। वह सोच में डूब गईं। बरसों से जो देखा, जो माना, उसी को सही समझा। लेकिन बेटे की बात में भी सच्चाई थी। उन्होंने पाखी को देखा, जो उनकी साड़ी का पल्लू पकड़कर खेल रही थी।
शायद पहली बार उन्होंने खुद को नेहा की मां की जगह रखकर सोचा।
कुछ देर बाद उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “अगर वह आने को तैयार हों... तो बुला लो।”
नेहा की आंखों में आंसू आ गए। उसने जल्दी से चेहरा नीचे कर लिया।
आदित्य ने बिना देर किए फोन उठाया और सुधा जी को कॉल मिलाया।
“मां, मैं आदित्य बोल रहा हूं।”
उधर से थोड़ा संकोची स्वर आया, “हां बेटा?”
“आप कल सुबह तैयार रहिए। मैं आपको लेने आ रहा हूं।”
“न-नहीं बेटा, इसकी क्या जरूरत है? मैं ठीक हूं।”
“जरूरत है मां,” आदित्य ने बहुत अपनापन से कहा, “यह घर सिर्फ हमारा नहीं, आपका भी है। त्योहार साथ मनाएंगे।”
उधर कुछ पल चुप्पी रही। फिर धीमी-सी आवाज़ आई, “बेटा, लोग क्या कहेंगे?”
आदित्य मुस्कराया, “लोगों का काम कहना है। हमारा काम अपने लोगों का साथ देना है।”
अगली सुबह आदित्य खुद गाड़ी लेकर गया और सुधा जी को सम्मान से अपने घर ले आया। दरवाजे पर शारदा देवी खड़ी थीं। नेहा का दिल धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दोनों आमने-सामने कैसे मिलेंगी।
सुधा जी ने झिझकते हुए कहा, “नमस्ते समधन जी।”
शारदा देवी कुछ पल उन्हें देखती रहीं, फिर आगे बढ़ीं और बोलीं, “अरे अंदर आइए। त्योहार के दिन मेहमान बनकर नहीं, अपने घर की तरह आइए।”
बस यही एक वाक्य था, जिसने नेहा के मन का बोझ आधा कर दिया।
धीरे-धीरे माहौल सहज होने लगा। रसोई में दोनों समधनें साथ बैठकर मिठाई बनाने लगीं। एक बताती, “हमारे यहां गुजिया ऐसे बनती है।” दूसरी कहती, “अच्छा, हमारे यहां तो इसमें थोड़ा नारियल भी डालते हैं।” पाखी दोनों के बीच घूम-घूमकर कभी आटा मांगती, कभी मेवे।
नेहा ने कई महीनों बाद अपनी मां के चेहरे पर हल्की मुस्कान देखी। आदित्य ने भी पहली बार महसूस किया कि सही निर्णय हमेशा सबसे आसान नहीं होता, लेकिन जब वह लिया जाता है तो घर का भार हल्का हो जाता है।
करवा चौथ वाले दिन घर सच में घर जैसा लग रहा था। आंगन में सुंदर रंगोली बनी। शाम को पूजा की थाली सजी। नेहा ने व्रत रखा, लेकिन इस बार उसके मन में कसक नहीं थी। उसके पास उसकी सास भी थीं और उसकी मां भी।
चांद निकलने पर जब छलनी से उसने आदित्य को देखा, तो आदित्य ने भी उसी क्षण मन ही मन एक और व्रत लिया—अब से वह हर बार सही बात के साथ खड़ा होगा, चाहे उसे बोलने में देर क्यों न लगी हो।
रात को खाना खाते समय शारदा देवी ने खुद कहा,
“सुधा जी, अगले साल भी ऐसे ही साथ त्योहार मनाएंगे। कभी यहां, कभी आपके वहां। रिवाज वही अच्छे जो अपनापन बढ़ाएं।”
सुधा जी की आंखें भर आईं। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “आज लगता है मेरी बेटी सच में अच्छे घर गई है।”
नेहा ने चुपचाप आदित्य की तरफ देखा। उस नजर में शिकायत नहीं थी अब। उसमें राहत थी, सम्मान था, और वह भरोसा था जो टूटते-टूटते बच गया था।
बेशक, अगले दिन पड़ोस में बातें भी हुईं।
किसी ने कहा, “अरे, समधन को त्योहार पर घर बुला लिया?”
किसी ने फुसफुसाकर कहा, “आजकल लोग कितनी नई बातें करने लगे हैं।”
लेकिन इस बार शारदा देवी ने किसी की परवाह नहीं की। उन्होंने मुस्कराकर जवाब दिया,
“नई बात नहीं है, बस सही बात है। त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, किसी को अकेला छोड़ने के लिए नहीं।”
उस दिन घर में दो मांएं थीं, एक बहू थी, एक बेटा था और एक छोटी बच्ची थी, जिसकी हंसी सबके बीच पुल का काम कर रही थी।
और सच तो यह था कि उस साल करवा चौथ का सबसे बड़ा चांद आसमान में नहीं, उस घर के भीतर निकला था—समझ का, अपनापन का और रिश्तों को रिवाज से ऊपर रखने का।
समय बीतता गया, लेकिन उस साल की बात घर में अक्सर याद की जाती रही।
जब भी कोई कहता कि “लोग क्या कहेंगे”, आदित्य मुस्कराकर कह देता, “लोग हर हाल में कुछ कहेंगे। जरूरी यह है कि हमारे अपने क्या महसूस करेंगे।”
और सच में, उस एक फैसले ने बहुत कुछ बदल दिया।
नेहा अब पहले से ज्यादा खुलकर अपनी बात कहने लगी, लेकिन बिना कटुता के। शारदा देवी भी धीरे-धीरे समझने लगीं कि बहू सिर्फ घर की जिम्मेदारी नहीं, किसी मां-बाप की उम्मीद भी होती है। सुधा जी ने भी पहली बार यह महसूस किया कि बेटी का ससुराल उससे दूर नहीं, उसके साथ खड़ा है।
सबसे सुंदर बात यह थी कि छोटी पाखी यह सब देख रही थी। वह बड़ी हो रही थी ऐसे घर में, जहां परंपरा का सम्मान था, लेकिन इंसानियत उससे बड़ी थी। जहां रिश्ते निभाने का मतलब सिर्फ नियम मानना नहीं, बल्कि दूसरे के दर्द को समझना भी था।
और शायद यही किसी भी घर की सबसे बड़ी सीख होती है।
सीख:
रिवाज और परंपराएं तब तक सुंदर हैं, जब तक वे रिश्तों को संभालें। जिस दिन किसी अपने के दर्द से बड़ा रिवाज लगने लगे, उस दिन ठहरकर सोचना चाहिए। क्योंकि घर दीवारों से नहीं, समझ और साथ से बनता है।

Post a Comment