जब माँ ने चुप्पी तोड़ दी
शाम का समय था।
आंगन में नीम के पेड़ की छाया धीरे-धीरे फैल रही थी।
रामनारायण जी चारपाई पर बैठे थे और उनकी पत्नी सावित्री देवी रसोई में चाय बना रही थीं।
दोनों की उम्र सत्तर के आसपास हो चुकी थी।
घर बड़ा था, पर अब बहुत खाली लगता था।
कभी यही घर बच्चों की हंसी-खुशी से भरा रहता था।
दो बेटे और एक बेटी।
बड़ा बेटा संजय, छोटा बेटा दीपक और बेटी कविता।
अब तीनों अपने-अपने घरों में व्यस्त थे।
फोन भी बहुत कम आता था।
रामनारायण जी अक्सर मज़ाक में कहते थे,
“लगता है हमारे बच्चे हमें भूल ही गए हैं।”
सावित्री देवी मुस्कुराकर कहतीं,
“अरे ऐसा मत कहिए, सब अपने-अपने काम में व्यस्त होंगे।”
लेकिन उनके दिल के अंदर भी वही दर्द था।
जरूरत पड़ते ही याद...
एक दिन अचानक संजय का फोन आया।
उसने थोड़ी हिचकिचाते हुए कहा,
“माँ, अगर आप और पिताजी कुछ दिन के लिए हमारे पास आ जाएँ तो अच्छा रहेगा।”
सावित्री देवी यह सुनकर खुश हो गईं।
उन्होंने प्यार से पूछा,
“क्यों बेटा, सब ठीक तो है न?”
संजय बोला,
“हाँ माँ, सब ठीक है। बस बच्चों की छुट्टियाँ चल रही हैं और हमें दोनों को ऑफिस जाना पड़ता है। अगर आप लोग यहाँ रहेंगे तो बच्चों का भी ध्यान हो जाएगा और हमें भी थोड़ा सहारा मिल जाएगा।”
माँ ने बिना ज़्यादा सोचे तुरंत हाँ कह दी।
उन्हें लगा कि बेटे को उनकी ज़रूरत है, इसलिए जाना ही चाहिए।
अगले ही दिन सावित्री देवी और रामनारायण जी अपना थोड़ा सा सामान लेकर बेटे के घर पहुँच गए।
शुरू में बहुत आदर...
पहले दो–तीन दिन तक घर का माहौल बहुत अच्छा रहा।
पोते-पोती दादा-दादी के साथ खेलते रहते थे।
बहू भी बड़े प्यार से बात करती थी और बार-बार उनका हाल पूछती थी।
लेकिन कुछ ही दिनों में माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।
एक दिन बहू ने घर की कामवाली को यह कहकर हटा दिया,
“माँ जी, जब आप घर पर हैं तो फिर अलग से कामवाली रखने की क्या ज़रूरत है? बेकार में पैसे खर्च होंगे।”
सावित्री देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्हें लगा कि चलो, अपने ही घर का काम है, कर लेंगी।
धीरे-धीरे घर के लगभग सारे काम उन्हीं के जिम्मे आ गए।
रसोई का काम, बच्चों की देखभाल, कपड़े धोना, सब कुछ सावित्री देवी ही संभालने लगीं।
उधर रामनारायण जी भी खाली नहीं रहते थे।
वे रोज़ सुबह पोते को स्कूल छोड़ने जाते और दोपहर में वापस लाते।
अब हालत यह हो गई थी कि दोनों बुज़ुर्ग पति-पत्नी पूरे दिन घर के कामों में ही लगे रहते थे,
जबकि बेटे-बहू अपने काम में निश्चिंत होकर लगे रहते थे।
सम्मान खत्म...
एक दिन बहू ने झुंझलाते हुए कहा,
“माँ जी, आपसे ढंग से काम भी नहीं होता। पता नहीं इतना राशन कैसे खत्म हो जाता है।”
सावित्री देवी यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप रह गईं। उनके चेहरे पर हल्की उदासी साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा।
रामनारायण जी पास ही बैठे सब देख और सुन रहे थे, पर वे भी शांत रहे। उन्हें लगा शायद आज बहू का मूड ठीक नहीं होगा, इसलिए वह गुस्से में ऐसा बोल रही है।
लेकिन धीरे-धीरे यह बात साफ होने लगी कि यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं थी। अब अक्सर छोटी-छोटी बातों पर बहू सावित्री देवी से इसी तरह उलझने लगी थी।
फिर से वही बात...
करीब एक महीने बाद संजय ने धीरे से कहा,
“माँ, अगर आप बुरा न मानें तो… अब आप लोग कुछ दिन दीपक के पास भी चले जाइए। उसे भी आपकी ज़रूरत होगी।”
संजय की बात सुनकर रामनारायण जी सब समझ गए। उन्हें महसूस हो गया कि अब बेटे को उनकी उतनी ज़रूरत नहीं रही।
लेकिन सावित्री देवी ने अपने मन की बात छुपा ली। हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं,
“ठीक है बेटा, कोई बात नहीं। चलो, इसी बहाने छोटे बेटे के पास भी कुछ दिन रह आएंगे।”
वही कहानी दोहराई...
दीपक के घर में भी शुरू में स्वागत हुआ।
पर कुछ दिनों बाद वही हाल।
बच्चों की देखभाल, घर का काम, सब उन्हीं के जिम्मे।
एक दिन दीपक बोला
“माँ, हमें अगले हफ्ते घूमने जाना है।
आप लोग तब तक यहाँ रहकर बच्चों को संभाल लेना।”
रामनारायण जी को बहुत बुरा लगा।
उन्होंने पहली बार कहा
“बेटा, क्या हम सिर्फ बच्चों को संभालने के लिए ही बुलाए जाते हैं?”
दीपक हँसते हुए बोला
“अरे पिताजी, आप लोग तो हमारे अपने हैं।”
सच का एहसास...
उस रात सावित्री देवी की आँखों में नींद नहीं थी।
वह चुपचाप बिस्तर पर बैठी थीं और उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
कुछ देर बाद उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,
“लगता है अब हम बच्चों के लिए बस जरूरत के समय याद किए जाने वाले लोग बनकर रह गए हैं। जब उन्हें हमारी ज़रूरत होती है, तब हमें अपने पास बुला लेते हैं… और काम निकलते ही हमें कहीं और भेजने की बात करने लगते हैं।”
रामनारायण जी भी यह सब महसूस कर रहे थे।
उन्होंने सावित्री देवी के कंधे पर हाथ रखते हुए शांत स्वर में कहा,
“सावित्री, अब समय आ गया है कि हम दूसरों के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए जीना सीखें। बहुत कर लिया बच्चों के लिए। अब हमें अपने स्वाभिमान के साथ जीना चाहिए।”
रामनारायण जी की बात सुनकर सावित्री देवी ने अपने आँसू पोंछ लिए।
अगली सुबह दोनों ने बिना किसी से कुछ कहे अपना सामान समेटा और चुपचाप अपने पुराने घर लौट आए।
कम से कम वहाँ उन्हें अपने आत्मसम्मान के साथ जीने की आज़ादी तो थी।
डेढ़ साल बाद...
डेढ़ साल बीत चुके थे।
इस पूरे समय में बच्चों ने कभी-कभार ही फोन किया। हालचाल पूछने की भी जैसे उन्हें फुर्सत नहीं मिलती थी।
एक दिन अचानक तीनों बच्चे एक साथ घर आ पहुँचे।
संजय ने आते ही कहा,
“माँ, चलो कुछ दिन हमारे साथ चलो। घर में बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं है।”
इतने में दीपक बोल पड़ा,
“नहीं माँ, पहले हमारे घर चलो। हमें भी आपकी बहुत जरूरत है।”
बेटी कविता भी पीछे नहीं रही। वह बोली,
“माँ, मेरे बच्चे अभी छोटे हैं। मैं अकेले सब नहीं संभाल पा रही हूँ। आप मेरे साथ चलो न।”
तीनों अपनी-अपनी बात कह रहे थे, लेकिन किसी को भी यह एहसास नहीं था कि माँ-बाप कोई जरूरत पड़ने पर बुलाने वाली चीज़ नहीं होते, बल्कि भावनाओं वाले इंसान होते हैं।
माँ का जवाब...
सावित्री देवी ने पहली बार तेज आवाज में कहा,
“बस करो तुम लोग!”
उनकी आवाज़ इतनी कड़ी थी कि पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।
सभी बच्चे चुपचाप खड़े उन्हें देखने लगे।
सावित्री देवी की आँखों में दर्द भी था और गुस्सा भी।
उन्होंने ठहरकर कहा—
“क्या समझ रखा है तुम लोगों ने हमें?
जब जरूरत होती है तभी माँ-पापा याद आ जाते हैं।
और जब काम निकल जाता है तो हमें किनारे कर देते हो।”
कुछ पल रुककर उन्होंने फिर कहा—
“हम कोई फालतू सामान नहीं हैं,
कि जब मन किया उठा लिया और जब मन भर गया तो एक तरफ रख दिया।”
बच्चों के पास अब कोई जवाब नहीं था।
सभी सिर झुकाकर खड़े थे।
सावित्री देवी ने दृढ़ आवाज में आगे कहा—
“अब हम कहीं नहीं जाएंगे।
हम अपने घर में ठीक हैं और अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीना चाहते हैं।
अगर मिलने आना हो तो ज़रूर आओ, हमें खुशी होगी।
लेकिन हमें अपनी सहूलियत का ज़रिया समझकर इस्तेमाल करने की कोशिश मत करना।”
उनकी बात सुनकर कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
पिता की बात...
सभी बच्चे उम्मीद भरी नज़रों से रामनारायण जी की तरफ देखने लगे, जैसे उन्हें विश्वास था कि पिताजी उनकी तरफ से कुछ कहेंगे और माँ को मना लेंगे।
रामनारायण जी ने कुछ पल तक सबकी ओर देखा। उनके चेहरे पर शांति भी थी और भीतर छिपा हुआ दर्द भी।
फिर उन्होंने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा,
“इस बार तुम्हारी माँ बिल्कुल सही कह रही है।
माँ-बाप बच्चों की सेवा और प्यार के लिए होते हैं, इस्तेमाल करने के लिए नहीं।”
उनकी यह बात सुनकर कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
तीनों बच्चे चुपचाप सिर झुकाकर खड़े रह गए।
अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था।
सीख:
दोस्तों,
माता-पिता की ममता बहुत बड़ी होती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें सिर्फ जरूरत के समय याद किया जाए।
माँ-बाप कोई खिलौना नहीं होते।
वे भी इंसान हैं, जिनके दिल में सम्मान और प्यार की जरूरत होती है।
जो बच्चे समय रहते यह बात समझ जाते हैं,
वही सच में अच्छे संतान कहलाते हैं।

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