बिखरे रिश्तों का फिर से जुड़ना

 

Uncle and father reuniting in hospital during child illness emotional moment


घर के आंगन में हल्की-हल्की चहल-पहल थी, लेकिन उस चहल-पहल के बीच एक अनकही दूरी भी साफ महसूस हो रही थी।


आदित्य दरवाजे पर खड़ा बाहर झांक रहा था। सामने गली में उसके ताऊजी खड़े थे—वही ताऊजी जो कभी उसे कंधे पर बैठाकर मेले दिखाने ले जाते थे।


आदित्य दौड़ता हुआ उनके पास गया।


आदित्य: ताऊजी, आज मुझे स्कूल छोड़ने चलेंगे?


लेकिन ताऊजी ने उसकी तरफ देखा, फिर नजरें फेर लीं और बिना कुछ बोले आगे बढ़ गए।


आदित्य का दिल जैसे टूट गया। वह धीरे-धीरे घर के अंदर लौट आया।


आदित्य: मम्मी, ताऊजी मुझसे बात क्यों नहीं करते?


रीना कुछ पल चुप रही, फिर बोली—


रीना: बेटा, अब उनसे ज्यादा बात मत किया कर… घर में कुछ बातें ठीक नहीं चल रहीं।


आदित्य: लेकिन उन्होंने तो मुझे साइकिल चलाना सिखाया था… अब क्या हो गया?


रीना के पास कोई जवाब नहीं था, बस उसने बेटे को चुप करा दिया।



आदित्य के पापा, मोहन और उनके बड़े भाई सुरेश, दोनों साथ में एक किराने की दुकान चलाते थे। बचपन से ही दोनों में बहुत प्यार था। मोहन हमेशा अपने बड़े भाई की इज्जत करते थे, और सुरेश भी मोहन को बेटे जैसा मानते थे।


लेकिन वक्त के साथ सब बदल गया।


सुरेश की शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ गईं। घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई—सब कुछ संभालना मुश्किल होने लगा। उन्होंने दुकान से ज्यादा पैसे निकालने शुरू कर दिए।


मोहन ने कभी हिसाब नहीं रखा, लेकिन धीरे-धीरे दुकान में घाटा होने लगा।


एक दिन मोहन ने हिम्मत करके पूछा—


मोहन: भैया, अगर ज्यादा जरूरत थी तो मुझसे कहते… ऐसे पैसे निकालने से दुकान पर असर पड़ रहा है।


सुरेश (थोड़े गुस्से में): क्या अब हर खर्च का हिसाब देना पड़ेगा? मैं भी इस दुकान का हिस्सा हूं।


मोहन चुप हो गए, लेकिन उनके दिल में दर्द रह गया।



कुछ ही दिनों बाद खबर मिली कि सुरेश ने पास ही एक नई दुकान खोल ली है।


मोहन को बहुत दुख हुआ।


मोहन: भैया, आप बताते तो मैं खुद आपकी मदद करता… आपने छुपाकर क्यों किया?


सुरेश: मुझे अपना रास्ता खुद बनाना है। बस आप मेरा हिस्सा दे दीजिए।


यह सुनकर मोहन का दिल बैठ गया।


फिर भी उन्होंने अपने भाई को उसका हिस्सा दे दिया।


उस दिन के बाद दोनों परिवार अलग हो गए।



आदित्य इन सब बातों को समझ नहीं पा रहा था। उसे बस इतना पता था कि उसका ताऊ अब उससे दूर हो गया है।


एक दिन स्कूल में खेलते समय आदित्य अचानक गिर पड़ा। उसे तेज बुखार हो गया।


घर लाकर डॉक्टर को दिखाया गया। डॉक्टर ने तुरंत अस्पताल ले जाने को कहा।


जांच में पता चला कि आदित्य को गंभीर इन्फेक्शन है।


इलाज शुरू हुआ, लेकिन हालत ठीक नहीं हो रही थी।


आखिर डॉक्टर ने कहा—


डॉक्टर: ऑपरेशन करना पड़ेगा… देर की तो मुश्किल हो सकती है।


मोहन और रीना के पैरों तले जमीन खिसक गई।


पैसों की जरूरत बहुत ज्यादा थी।


मोहन ने दुकान गिरवी रखने की सोच ली।



एक दिन मोहन दवा लेने गए थे। उसी समय सुरेश वहां से गुजरे।


दुकानदार से उन्हें सब पता चला।


सुरेश के कदम जैसे रुक गए।


वह सीधे अस्पताल पहुंचे।


दरवाजे के बाहर खड़े होकर उन्होंने सब सुन लिया।


डॉक्टर: जल्दी फैसला कीजिए… वक्त बहुत कम है।


मोहन की आवाज कांप रही थी—


मोहन: मैं कोशिश कर रहा हूं डॉक्टर साहब…



तभी सुरेश अंदर आए।


सुरेश: मोहन… इतना सब हो गया और तुमने मुझे बताया भी नहीं?


मोहन ने नजरें झुका लीं—


मोहन: सोचा… अब तुम्हें परेशान न करूं…


सुरेश कुछ नहीं बोले। बस सीधे आदित्य के कमरे में चले गए।


सुरेश (मुस्कुराते हुए): अरे मेरे शेर… ताऊ को भूल गया क्या?


आदित्य की आंखों में चमक आ गई—


आदित्य: ताऊजी… आप आ गए!


उसने ताऊ का हाथ कसकर पकड़ लिया।



अगले दिन डॉक्टर ने कहा—


डॉक्टर: आज ही ऑपरेशन होगा… पैसे जमा हो गए हैं।


मोहन चौंक गए—


मोहन: लेकिन मैंने तो अभी…


तभी पीछे से आवाज आई—


सुरेश: मैंने जमा कर दिए।


मोहन ने मुड़कर देखा—सुरेश और उनकी पत्नी खड़े थे।


मोहन: भैया… आपने?


सुरेश: मैंने अपनी दुकान बेच दी… पैसे की चिंता मत करो।


मोहन की आंखों से आंसू बहने लगे—


मोहन: ये क्या कर दिया आपने?


सुरेश: दुकान फिर बन जाएगी… लेकिन अगर कुछ हो जाता तो… मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता।


दोनों भाई गले लग गए।


सालों की दूरी एक पल में खत्म हो गई।



आदित्य का ऑपरेशन सफल रहा।


कुछ दिनों में वह ठीक होकर घर लौट आया।


घर में फिर से हंसी लौट आई।



एक दिन मोहन ने कहा—


मोहन: भैया, अब अलग रहने की जरूरत नहीं है… हम सब फिर से साथ रहेंगे।


सुरेश: लेकिन मेरा हिस्सा तो…


मोहन (मुस्कुराते हुए): आप हिस्सा नहीं… मेरा सहारा हो।



कुछ ही दिनों में सुरेश वापस उसी घर में आ गए।


दुकान भी दोनों ने मिलकर फिर से शुरू कर दी।



अब हर दिन आदित्य अपने ताऊजी के साथ स्कूल जाता।


और लौटते समय—


ताऊजी: चलो आज कौन सी आईस्क्रीम खाओगे?


आदित्य (हंसते हुए): वही… जो पहले खिलाते थे!


दोनों हंसते हुए आगे बढ़ जाते।


सीख:

रिश्ते पैसों से नहीं, प्यार और भरोसे से चलते हैं।

जब दिल साफ हो, तो टूटा रिश्ता भी फिर से जुड़ सकता है।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.