समझ का साथ

 

Husband and wife relationship illustration showing emotional contrast between struggle and support in marriage



शाम ढल रही थी। घर के आँगन में हल्की हवा चल रही थी, लेकिन घर के अंदर का माहौल कुछ भारी सा था।


रीमा रसोई में खड़ी थी। गैस पर दाल चढ़ी हुई थी और वह जल्दी-जल्दी सब्ज़ी काट रही थी। तभी उसका हाथ हल्का सा कट गया।


“आह…!” रीमा दर्द से कराह उठी।


वह तुरंत नल के पास गई और पानी से हाथ धोने लगी। तभी पीछे से आवाज़ आई—


“क्या हुआ अब?”


यह अमित था—रीमा का पति।


“कुछ नहीं… बस हल्का सा कट गया है,” रीमा ने धीरे से कहा।


अमित ने एक नज़र देखा और बोला—


“इतना सा ही तो है, इसमें इतना ड्रामा करने की क्या ज़रूरत है? जल्दी काम खत्म करो, मुझे भूख लगी है।”


रीमा चुप हो गई। उसने कपड़ा बांधा और फिर से काम में लग गई।



रीमा और अमित की शादी को अभी केवल दो महीने ही हुए थे। यह एक अरेंज मैरेज थी। रीमा को उम्मीद थी कि समय के साथ सब कुछ बेहतर हो जाएगा, लेकिन अमित का व्यवहार उसे धीरे-धीरे अंदर से तोड़ रहा था।


घर की हर जिम्मेदारी वह अकेले निभा रही थी—खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े संभालना… सब कुछ। इसके बावजूद अमित की शिकायतें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं, जो उसके मन को और भी भारी कर देती थीं।



अगले दिन…


घर में उस दिन एक अलग ही रौनक थी। अमित के छोटे भाई रोहन और उसकी पत्नी सिया आए हुए थे।


रोहन और सिया की लव मैरिज थी, और यह बात उनके व्यवहार में साफ झलकती थी। दोनों एक-दूसरे का ख्याल इतनी सहजता से रखते थे, जैसे यही उनका स्वभाव हो।


सिया मुस्कुराते हुए रसोई में आई और रीमा के पास खड़ी होकर बोली—

“दीदी, मैं आपकी मदद कर देती हूँ ना।”


रीमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“अरे नहीं सिया, तुम जाओ… मैं कर लूँगी।”


इतने में रोहन भी रसोई में आ गया और हँसते हुए बोला—

“भाभी, काम जल्दी खत्म करना है तो ‘टीमवर्क’ जरूरी है।”


बिना किसी औपचारिकता के वह सब्ज़ी उठाकर काटने लगा, और सिया आटा गूंथने लगी। दोनों के बीच हल्की-फुल्की हँसी-मजाक चल रही थी।


कुछ ही देर में रसोई का आधा काम खत्म हो गया।


रीमा चुपचाप उन्हें देख रही थी। उसके चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन दिल के अंदर एक हल्की सी चुभन उठ रही थी—


“काश… अमित भी ऐसा होता…”



रात को…


रीमा चुपचाप बालकनी में बैठी थी। हवा हल्की-हल्की चल रही थी, लेकिन उसके मन के भीतर अजीब सी बेचैनी थी।


तभी पीछे से कदमों की आहट हुई। अमित उसके पास आकर खड़ा हो गया।


“यहाँ अकेली बैठकर क्या कर रही हो?” उसने सामान्य लहजे में पूछा।


रीमा ने कुछ पल चुप रहकर हिम्मत जुटाई, फिर धीमी आवाज़ में बोली—


“अमित… क्या हम थोड़ा सा समय साथ में बिता सकते हैं? बस… ऐसे ही, जैसे रोहन और सिया साथ बैठते हैं, बातें करते हैं…”


अमित ने हल्की सी भौंहें चढ़ाईं और तुरंत जवाब दिया—


“रीमा, हर बात में दूसरों से तुलना करना बंद करो। हर किसी की ज़िंदगी अलग होती है, और हमें अपनी तरह जीना चाहिए।”


उसके शब्द भले ही सामान्य थे, लेकिन लहजा थोड़ा कठोर था।


रीमा ने कुछ कहना चाहा… पर शब्द गले में ही अटक गए।


वह चुपचाप सामने देखने लगी। आँखों में हल्की नमी उतर आई थी।


उस पल उसे महसूस हुआ—वह अमित के साथ होते हुए भी… कहीं न कहीं अकेली है।


कुछ दिन बाद…


रीमा की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी।


उसे तेज़ बुखार था, शरीर बिल्कुल टूटा हुआ महसूस हो रहा था, लेकिन फिर भी वह रसोई में खड़ी खाना बना रही थी। उसके माथे पर पसीना था और हाथों में कमजोरी साफ झलक रही थी।


तभी सिया की नज़र उस पर पड़ी।


“दीदी! आप इस हालत में काम क्यों कर रही हैं?” — सिया घबराकर बोली।


रीमा ने हल्की मुस्कान के साथ धीमे स्वर में कहा—


“क्या करें सिया… काम तो करना ही पड़ता है…”


तभी रोहन भी वहाँ आ गया। उसने रीमा की हालत देखी और तुरंत अमित की तरफ मुड़कर कहा—


“भाई, भाभी की तबीयत ठीक नहीं है। उन्हें आराम करने दो, मैं खाना बना देता हूँ।”


अमित ने हल्की झुंझलाहट के साथ जवाब दिया—


“तुम लोगों को आदत है ये सब करने की… मुझे नहीं है।”



उस रात…


रीमा बेड पर लेटी थी, लेकिन उसकी आँखों में आँसू थे।


उसे लगा जैसे उसकी कोई अहमियत ही नहीं है।


अगली सुबह…


रीमा अपने मायके चली गई—बिना कुछ कहे।



अब घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।


अमित ने पहले तो मन ही मन सोचा—“चलो, अच्छा है… थोड़ी शांति तो मिलेगी।”


लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, वही शांति उसे खलने लगी।


धीरे-धीरे उसे हर छोटी-बड़ी चीज़ की कमी महसूस होने लगी।


कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे… खाना समय पर नहीं बन रहा था… घर का हर कोना अस्त-व्यस्त दिख रहा था…


और सबसे बढ़कर—घर में वो अपनापन, वो रौनक कहीं खो गई थी।


अब उसे समझ आने लगा था कि घर सिर्फ दीवारों से नहीं, बल्कि रिश्तों से बसता है।


एक दिन…


अमित ऑफिस से थका-हारा घर लौटा। शरीर में इतनी थकान थी कि सीधे सो जाने का मन कर रहा था, लेकिन पेट की भूख ने उसे रसोई तक जाने पर मजबूर कर दिया।


उसने खुद से खाना बनाने की कोशिश की—कभी दाल ज्यादा उबल गई, तो कभी सब्ज़ी जलने लगी। कुछ ही देर में पूरी रसोई बिखर गई और अमित परेशान होकर वहीं खड़ा रह गया।


तभी दरवाज़े की हल्की सी आवाज़ हुई।


अमित ने पलटकर देखा… दरवाज़े पर रीमा खड़ी थी।


उसे सामने देखकर अमित एक पल के लिए रुक गया।


“तुम… वापस आ गई?” उसने हैरानी से पूछा।


रीमा ने शांत आवाज़ में जवाब दिया—

“घर मेरा भी है…”


उसके इस छोटे से जवाब में बहुत कुछ छिपा था—अपनापन भी और हल्की सी शिकायत भी।


अमित कुछ देर तक चुप रहा। जैसे शब्द ही नहीं मिल रहे हों। फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर पछतावा साफ दिखने लगा।


वह रीमा के पास आया और धीमे स्वर में बोला—

“रीमा… मुझे माफ़ कर दो। मैंने कभी तुम्हारी मेहनत को समझा ही नहीं… और न ही तुम्हारी भावनाओं की कद्र की।”


आज उसकी आवाज़ में पहली बार सच्चाई और पछतावा साफ झलक रहा था।



रीमा ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में हल्की नमी थी लेकिन आवाज़ अब पहले से ज्यादा साफ और मजबूत थी—


“मुझे बस आपका साथ चाहिए… ऐसा साथ जहाँ हम दोनों बराबरी से खड़े हों, एक-दूसरे का सहारा बनकर।”


अमित ने उसकी बात ध्यान से सुनी। इस बार उसने जल्दबाज़ी में जवाब नहीं दिया, बल्कि समझते हुए धीरे से सिर हिलाया—


“अब तक जो भी कमी रह गई… उसे मैं सुधारना चाहता हूँ। अब से हम दोनों मिलकर हर जिम्मेदारी निभाएँगे… साथ में।”



अगले दिन…


रसोई का माहौल आज बिल्कुल अलग था।


रीमा आराम से सब्ज़ी काट रही थी, और पास ही अमित आटा गूंथते हुए बीच-बीच में उससे बातें कर रहा था। दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, जैसे काम नहीं बल्कि साथ बिताया हुआ एक खूबसूरत पल हो।


तभी रोहन और सिया रसोई के दरवाज़े पर आकर रुक गए। कुछ पल तक वे दोनों उन्हें देखते रहे, फिर मुस्कुराते हुए बोले—


“वाह… अब तो सच में इस घर में घर जैसी बात आ गई है।”



रीमा मुस्कुरा दी।


अब उसे समझ आ गया था—


शादी सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं… बल्कि साथ निभाने का नाम है।





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