जब आईना सामने आया
सुबह की हल्की ठंडक अभी पूरी तरह गई नहीं थी। आंगन में तुलसी के पास धूप धीरे-धीरे फैल रही थी, लेकिन घर के अंदर माहौल कुछ अलग ही था—जैसे कोई अनकही खींचतान हर कोने में बसी हो।
नीता किचन में खड़ी चाय बना रही थी। उसकी नजर बार-बार टेबल पर रखे एक लिफाफे पर जा रही थी। वह लिफाफा उसके लिए सिर्फ कागज़ नहीं था, बल्कि उसकी मेहनत, उसकी पहचान और उसके सपनों की शुरुआत था।
तभी सास, कमला देवी की आवाज आई—
“नीता, ये क्या है टेबल पर?”
नीता ने हल्के से जवाब दिया—
“मां जी, ये मेरा जॉइनिंग लेटर है… मुझे स्कूल में टीचर की नौकरी मिली है।”
इतना सुनते ही पास बैठी ननद प्रिया हंस पड़ी—
“भाभी, आप भी ना… घर संभालना नहीं होता और नौकरी करने चली हैं!”
कमला देवी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा—
“हमारे घर की बहुएं बाहर काम नहीं करतीं। तुम्हें किसी चीज की कमी है क्या?”
नीता ने हिम्मत जुटाकर कहा—
“कमी की बात नहीं है मां जी… मैं पढ़ी-लिखी हूं, मैं कुछ करना चाहती हूं। अपने दम पर खड़ा होना चाहती हूं।”
“और घर?” प्रिया ने तुरंत सवाल दागा,
“घर का क्या होगा? या फिर हमें ही सब करना पड़ेगा?”
नीता चुप हो गई। उसे पता था, यह लड़ाई आसान नहीं है।
उसने उम्मीद से अपने पति, अमित की तरफ देखा।
अमित थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला—
“मां, अगर नीता सब संभालकर काम करना चाहती है, तो उसे मौका देना चाहिए…”
“अमित!” कमला देवी की आवाज सख्त हो गई,
“आज नौकरी करेगी, कल बराबरी की बात करेगी। घर की शांति ऐसे ही खत्म होती है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
नीता ने धीरे से वह लिफाफा उठाया… और बिना कुछ कहे अपने कमरे में जाकर अलमारी में रख दिया।
उस दिन उसके सपनों पर ताला लग गया।
समय बीतता गया।
करीब आठ महीने बाद प्रिया की शादी बड़े धूमधाम से हो गई। घर में खूब खुशी का माहौल था। सबको लगता था कि प्रिया बहुत खुश रहेगी।
लेकिन शादी के एक साल बाद, जब प्रिया पहली बार मायके आई, तो उसका चेहरा बदला हुआ था। वह पहले जैसी चंचल और खुशमिजाज नहीं थी।
शाम को जब सब साथ बैठे, तो प्रिया अचानक रो पड़ी।
“मां… मैं अब वहां नहीं रह सकती…”
कमला देवी घबरा गईं—
“क्या हुआ बेटा?”
प्रिया ने रुंधे गले से कहा—
“मेरी सास मुझे नौकरी नहीं करने देतीं। कहती हैं कि बहू घर के बाहर काम करेगी तो लोग क्या कहेंगे… मैंने इतनी पढ़ाई की किसलिए मां?”
नीता चुपचाप पास में बैठी थी। उसके हाथ अपने आप कस गए।
प्रिया आगे बोली—
“मैंने जॉब के लिए अप्लाई किया था… इंटरव्यू भी क्लियर कर लिया था… लेकिन उन्होंने मुझसे जबरदस्ती मना करवा दिया…”
कमला देवी गुस्से में बोलीं—
“ये तो बिल्कुल गलत है! आज के जमाने में कोई ऐसे रोकता है क्या? मैं अभी बात करती हूं!”
तभी अमित ने धीरे से कहा—
“मां, एक बात पूछूं?”
“क्या?” कमला देवी ने कहा।
अमित ने शांत स्वर में कहा—
“जब नीता नौकरी करना चाहती थी, तब आपने भी तो यही कहा था कि बहू का काम घर संभालना है… तब वो सही था और आज गलत?”
कमला देवी चुप हो गईं।
प्रिया ने भी सिर झुका लिया।
अमित ने आगे कहा—
“फर्क सिर्फ इतना है कि तब बात किसी और की थी… और आज अपनी है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
नीता उठकर धीरे से प्रिया के पास आई। उसने उसका हाथ थामा और कहा—
“दीदी, आप चिंता मत कीजिए। इस बार हम चुप नहीं रहेंगे। आपका हक आपको जरूर मिलेगा।”
प्रिया ने पहली बार नीता की तरफ देखा—उस नजर में शर्म भी थी और अपनापन भी।
कमला देवी की आंखें भर आईं।
“नीता… बेटा, मैंने तुम्हारे साथ गलत किया,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
“अगर तुम अभी भी चाहो, तो तुम अपनी नौकरी शुरू कर सकती हो…”
नीता के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“मां जी, अब बात सिर्फ मेरी नहीं है… अब इस घर में कोई भी लड़की अपने सपनों से समझौता नहीं करेगी।”
उस दिन उस घर में एक नया नियम बना—
सपने रिश्तों से छोटे नहीं होते, और सम्मान सिर्फ बेटी का नहीं, बहू का भी बराबर होता है।
आंगन में वही धूप थी, वही घर था…
लेकिन सोच बदल चुकी थी।

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