जब चुप्पी ने जवाब देना सीख लिया

 



दरवाज़ा खोलते ही अंदर से हंसी की आवाजें आ रही थीं।


मैंने एक पल को सोचा—शायद आज घर का माहौल हल्का होगा… लेकिन जैसे ही अंदर कदम रखा, वो हल्कापन सिर्फ बाहर तक ही सीमित रह गया।


बैग कंधे से उतारते-उतारते ही नजर ड्रॉइंग रूम पर गई। मम्मी जी सोफे पर बैठी थीं, उनके चेहरे पर वही सख्ती वाली शांति थी। पापा जी अख़बार में नजर गड़ाए हुए थे, और आशीष मोबाइल में व्यस्त था।


किसी ने ये तक नहीं पूछा कि मैं इतनी देर से क्यों आई।


मन ने कहा—“चलो, आज डांट नहीं पड़ेगी…”

पर दिल ने धीरे से जवाब दिया—“इतनी आसानी से कुछ अच्छा नहीं होता यहाँ।”


मैं चुपचाप कमरे में गई। कपड़े बदले, चेहरा धोया… आईने में खुद को देखा तो लगा जैसे चेहरा नहीं, थकान का एक नक्शा खड़ा हो।


बाहर निकली तो सोचा—सीधे किचन में जाकर काम शुरू कर देती हूं, इससे पहले कि कोई कुछ बोले।


पर जैसे ही रसोई में कदम रखा, पैर वहीं रुक गए।


सिंक में बर्तनों का पहाड़ खड़ा था।


गिलास, प्लेटें, कटोरियाँ… और ऊपर से वो भारी-भरकम कुकर—सब ऐसे पड़े थे जैसे मेरा इंतजार कर रहे हों।


और आज तो हालत कुछ ज्यादा ही खराब थी। कुछ बर्तनों में तो खाना सूखकर चिपक गया था, जैसे जानबूझकर छोड़ा गया हो।


मैंने गहरी सांस ली।


“कम से कम आज तो कोई धो देता…”

मन ने उम्मीद की थी।


तभी पीछे से आवाज आई—

“खड़ी-खड़ी क्या देख रही हो? काम खुद नहीं होगा।”


मैंने पलटकर देखा—मम्मी जी दरवाजे पर खड़ी थीं।


“मम्मी जी… आज ऑफिस में बहुत काम था, इसलिए…”


मेरी बात पूरी होने से पहले ही उन्होंने काट दिया—

“हमें सफाई नहीं चाहिए। घर की जिम्मेदारी पहले आती है, बाकी सब बाद में।”


उनकी बात सुनकर गला भर आया… पर आँसू वहीं रोक लिए।


मैं चुपचाप सिंक के सामने खड़ी हो गई।


जैसे ही पहला बर्तन हाथ में लिया, मन में एक अजीब सी खीझ उठी।


आज बर्तन कुछ ज्यादा ही बोलते हुए लग रहे थे—


“लो, आ ही गई तुम… हमें पहले से पता था, आखिर आना तो तुम्हें ही था।”


मैंने हल्का सा तंज कसते हुए कहा—

“हाँ, क्योंकि यहाँ कोई और है ही नहीं, जो तुम्हें हाथ लगाए।”


जवाब जैसे खुद-ब-खुद उभर आया—

“और लगाए भी क्यों कोई? ये जिम्मेदारी तो सिर्फ तुम्हारी ही है ना…”


मैं बर्तन रगड़ते हुए मुस्कुरा दी—एक कड़वी मुस्कान।


हाथ तेज़ चल रहे थे, पर दिमाग उससे भी तेज़।


हर प्लेट के साथ एक सवाल उठ रहा था—

क्या सच में ये सब सिर्फ मेरी जिम्मेदारी है?


तभी आशीष अंदर आया।

“खाना खा लिया तुमने?” उसने पूछा।


मैंने बिना उसकी तरफ देखे कहा—

“पहले ये सब खत्म कर लूं, फिर खा लूंगी।”


वो कुछ सेकंड खड़ा रहा… फिर बोला—

“तुम चाहो तो थोड़ा आराम कर लो, मैं…”


उसकी बात अधूरी रह गई। शायद उसे खुद ही यकीन नहीं था कि वो क्या कह रहा है।


मैंने पहली बार सिर उठाकर उसकी तरफ देखा—

“क्या तुम सच में करोगे?”


उसने नजरें चुरा लीं—

“मम्मी को अच्छा नहीं लगेगा…”


बस… वही जवाब जिसकी उम्मीद थी।


मैंने फिर सिर झुका लिया और बर्तन धोने लगी।


लेकिन आज कुछ अलग था।


आज सिर्फ हाथ काम नहीं कर रहे थे… अंदर कुछ टूट भी रहा था और कुछ बन भी रहा था।


सारे बर्तन धोने के बाद मैंने हाथ पोंछे… और बिना कुछ सोचे सीधे ड्रॉइंग रूम में चली गई।


सबकी नजरें मेरी तरफ उठीं।


दिल जोर से धड़क रहा था… पर इस बार मैंने उसे चुप नहीं कराया।


मैंने साफ आवाज में कहा—

“मम्मी जी, मुझे आपसे एक बात करनी है।”


कमरे में हल्की खामोशी फैल गई।


“मैं नौकरी भी करती हूं और घर का काम भी… लेकिन अकेले सब कुछ संभालना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। मैं ये नहीं कह रही कि मैं काम नहीं करूंगी… पर थोड़ा सहयोग चाहिए।”


मम्मी जी ने भौंहें चढ़ाईं—

“तो क्या कहना चाहती हो?”


मैंने पहली बार बिना डर के जवाब दिया—

“या तो हम सब मिलकर काम बांट लें… या फिर एक कामवाली रख लेते हैं।”


कमरे में जैसे सन्नाटा छा गया।


पापा जी ने अख़बार नीचे रखा।

आशीष ने मेरी तरफ देखा—इस बार थोड़ी हैरानी के साथ।


मम्मी जी कुछ सेकंड तक चुप रहीं… फिर बोलीं—

“बहुत बोलने लगी हो तुम…”


मैंने शांत स्वर में कहा—

“नहीं मम्मी जी, बस आज पहली बार बोल रही हूं।”


मेरी आवाज में न गुस्सा था, न डर… सिर्फ सच्चाई थी।


कुछ पल की खामोशी के बाद पापा जी बोले—

“बात तो सही कह रही है… इतना सब अकेले करना आसान नहीं होता।”


मम्मी जी ने उनकी तरफ देखा… फिर मेरी तरफ।


उनके चेहरे पर गुस्सा कम था, सोच ज्यादा।


आशीष ने धीरे से कहा—

“हम काम बांट सकते हैं…”


मुझे यकीन नहीं हुआ—पर ये वही घर था, वही लोग थे… बस आज मेरी चुप्पी नहीं थी।


उस दिन कोई बड़ा फैसला नहीं हुआ…

पर एक छोटी सी शुरुआत जरूर हो गई।


उस रात पहली बार बर्तन चुप थे…

और मैं भी।


लेकिन फर्क सिर्फ इतना था—

आज मेरी चुप्पी कमजोरी नहीं, सुकून थी।




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