जब घर बसाने के लिए दिल बदलना पड़ता है

 

Happy Indian family moment with bride, husband, and mother-in-law showing love and acceptance in a traditional home setting


घर के बड़े आँगन में रंगोली बनी हुई थी। दरवाजे पर आम के पत्तों की तोरण लटक रही थी और भीतर ढोलक की थाप पर औरतों की हंसी गूंज रही थी।


आज इस घर में नई बहू का स्वागत होना था।


आरती, लाल जोड़े में सजी, झुकी नजरों के साथ दहलीज पर खड़ी थी। उसके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे—नए घर, नए रिश्ते और नई जिम्मेदारियों का डर उसके चेहरे पर साफ दिख रहा था।


सास कमला देवी ने आरती की आरती उतारी, चावल से भरी थाली को हल्का सा गिराया और कहा— “दाहिना पैर आगे रखो बहू, लक्ष्मी बनकर घर में प्रवेश करो।”


आरती ने धीरे से अंदर कदम रखा।


पहले दिन सब कुछ बहुत अच्छा लगा।


ननद पायल बार-बार आकर उससे बातें करती, ससुर जी प्यार से हाल पूछते, और पति अर्जुन हर वक्त उसके साथ रहने की कोशिश करता।


लेकिन यह सब ज्यादा दिन नहीं चला।


कुछ ही दिनों में घर का असली रूप सामने आने लगा।


कमला देवी बहुत अनुशासनप्रिय और सख्त स्वभाव की थीं।


उन्होंने आरती को एक दिन अपने पास बैठाकर कहा— “बहू, हमारे घर के कुछ नियम हैं… जिन्हें हर बहू को मानना पड़ता है।”


आरती चुपचाप सुनने लगी।


“पहला—घर के बड़े जब सामने हों, तो ज्यादा बोलना नहीं चाहिए।”


“दूसरा—पति के साथ ज्यादा हंसी-मजाक ठीक नहीं लगता।”


“तीसरा—फोन और मायके में ज्यादा लगाव ठीक नहीं होता।”


आरती को यह सब सुनकर अजीब लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


उसे लगा—शायद हर घर के अपने तरीके होते हैं।


लेकिन धीरे-धीरे ये “तरीके” उसके लिए बंधन बन गए।


अब हालत यह हो गई थी कि अर्जुन घर आता तो आरती उससे खुलकर बात भी नहीं कर पाती।


एक बार तो उसने चुपके से अर्जुन से कहा— “क्या हम पति-पत्नी हैं या अजनबी?”


अर्जुन ने गहरी सांस ली, “मैं समझता हूँ… पर माँ को बदलना आसान नहीं है।”


“तो क्या हम ऐसे ही रहेंगे?” आरती की आँखें भर आईं।


अर्जुन कुछ कह नहीं पाया।


दिन बीतते गए।


आरती अब पहले जैसी नहीं रही। उसकी हंसी कम हो गई थी, आंखों की चमक भी फीकी पड़ने लगी थी।


ससुर जी, रामप्रसाद जी, यह सब चुपचाप देख रहे थे।


एक दिन उन्होंने देखा—आरती रसोई में अकेले काम कर रही थी और उसकी आँखों से आंसू गिर रहे थे।


उन्होंने पास जाकर पूछा— “क्या हुआ बहू?”


आरती ने तुरंत आँसू पोंछे, “कुछ नहीं बाबूजी…”


“मुझसे मत छुपाओ,” उन्होंने नरमी से कहा।


उस दिन पहली बार आरती ने अपना दिल खोला।


सब कुछ बता दिया—कैसे वह अपने ही पति से बात नहीं कर पाती, कैसे हर बात में टोकाटाकी होती है, और कैसे वह धीरे-धीरे टूट रही है।


रामप्रसाद जी सब सुनते रहे।


फिर उन्होंने सिर्फ इतना कहा— “अब तुम चिंता मत करो… घर मैं संभाल लूंगा।”


आरती समझ नहीं पाई कि बाबूजी क्या करने वाले हैं।


लेकिन अगले ही दिन घर में एक अजीब सा माहौल बनने लगा।


रामप्रसाद जी ने जानबूझकर अर्जुन को कहा— “आज से तुम बाहर ज्यादा समय बिताया करो… घर में कम रहा करो।”


कमला देवी चौंक गईं, “ये क्या कह रहे हो आप?”


“अरे, जब घर में उसकी पत्नी से बात करने की इजाजत नहीं है, तो घर में रहकर क्या करेगा?” उन्होंने सीधा जवाब दिया।


कमला देवी चुप हो गईं।


धीरे-धीरे अर्जुन सच में घर से दूरी बनाने लगा।


वह देर से आता, कम बात करता और कई बार बाहर ही खाना खा लेता।


अब कमला देवी को फर्क पड़ने लगा।


एक दिन उन्होंने खुद अर्जुन से पूछा— “क्या बात है बेटा? पहले जैसे नहीं रहे तुम…”


अर्जुन ने शांत स्वर में कहा— “जब अपने ही घर में सुकून नहीं मिलता… तो बाहर ढूंढना पड़ता है।”


ये सुनकर कमला देवी अंदर तक हिल गईं।


उसी रात रामप्रसाद जी ने कमला देवी से कहा— “तुम्हें बहू चाहिए थी या नौकरानी?”


“आप ये क्या कह रहे हैं?” कमला देवी ने नाराज होकर कहा।


“सच कह रहा हूँ,” उन्होंने सख्ती से कहा, “तुमने बेटे-बहू के बीच दीवार खड़ी कर दी है। अगर यही चलता रहा, तो घर टूटते देर नहीं लगेगी।”


कमला देवी पहली बार चुप हो गईं।


अगले दिन उन्होंने आरती को बुलाया।


आरती डरते हुए उनके सामने खड़ी हो गई।


कमला देवी ने धीरे से कहा— “बहू… अगर मुझसे कोई गलती हुई हो… तो माफ कर देना।”


आरती ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।


“मैंने शायद तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की…” उनकी आवाज भर्रा गई।


आरती की आँखों में आँसू आ गए।


उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।


अब आरती खुलकर हंसती थी, अर्जुन के साथ बैठती थी, और कमला देवी भी अब उसे रोकती नहीं थीं।


कुछ समय बाद, उसी घर में फिर ढोलक बजी।


इस बार आरती की गोद भराई थी।


लेकिन इस बार सबसे ज्यादा खुश कमला देवी थीं।


वो खुद अपनी बहू पर नोट वार रही थीं।


आरती ने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ देखा।


कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा— “बहू नहीं… मेरी बेटी है तू।”


पास खड़े रामप्रसाद जी मुस्कुरा रहे थे।


उन्हें पता था—


कभी-कभी घर बसाने के लिए नियम नहीं, दिल बदलना पड़ता है।




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