जब रमा ने खुद को चुन लिया

 

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रमा खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। हल्की हवा चल रही थी, लेकिन उसके मन में अजीब सा बोझ था। आज उसे अपने मायके से वापस ससुराल जाना था।


घर में हलचल थी। उसकी माँ रसोई में लगी हुई थीं—कभी पकौड़े तलतीं, कभी मिठाई सजातीं। पिता बार-बार घड़ी देख रहे थे, जैसे हर मिनट उन्हें भारी लग रहा हो। उनके चेहरे पर खुशी भी थी और चिंता भी।


“रमा, ये दुपट्टा ठीक से ले ले… ससुराल में सबकी नजर रहती है,” माँ ने कहा।


रमा हल्का सा मुस्कुरा दी। अब ये बातें उसे नई नहीं लगती थीं।


कुछ देर बाद रवि आ गया।


दरवाज़े पर आते ही उसने औपचारिक सा व्यवहार किया—हल्का सा झुकना, जैसे पैर छू रहा हो, लेकिन मन में कोई अपनापन नहीं। रमा के पिता ने बड़े प्यार से उसे अंदर बैठाया।


“आओ बेटा, सफर में थक गए होंगे… पहले कुछ खा लो,” उन्होंने कहा।


रवि ने सिर हिलाया और मोबाइल में लग गया।


माँ ने एक के बाद एक पकवान सामने रख दिए। “ये भी चखो बेटा… ये तुम्हें पसंद है ना?”


“हां… ठीक है,” रवि ने बिना देखे जवाब दिया।


रमा ये सब देख रही थी। उसे पता था कि ये सारा प्यार सिर्फ दिखाने के लिए नहीं था—ये सच था, दिल से था। फर्क बस इतना था कि ये प्यार उसके हिस्से में कभी नहीं आया था, उसके अपने घर में।


खाना खत्म होते ही रवि ने कहा,

“जल्दी चलो, घर से दो बार फोन आ चुका है।”


रमा ने जल्दी-जल्दी खाना खत्म किया। माँ ने जाते वक्त तिलक लगाया और शगुन के पैसे दिए।


“अरे नहीं मम्मी जी, इसकी क्या जरूरत है…”

कहते हुए रवि ने पैसे जेब में रख लिए।


रमा ने एक पल के लिए माँ की आँखों में देखा। वहाँ बस दुआ थी—कोई शिकायत नहीं।


ससुराल पहुँचते ही वही पुराना दृश्य दोहराया गया।


“आ गया बेटा… आओ पानी पी लो,” सास ने प्यार से कहा।


रमा दरवाज़े पर खड़ी रही। उसने चुपचाप आगे बढ़कर सास के पैर छुए।


“हूँ…” बस इतना ही जवाब मिला।


रसोई में गई तो देखा बर्तन भरे पड़े थे। किसी ने उसे पानी तक नहीं पूछा। उसने खुद ही गिलास उठाया, पानी पिया और काम में लग गई।


उसके मन में सवाल उठे—

“क्या मैं इस घर की सदस्य नहीं हूँ?”

“क्या मेरी कोई जगह नहीं है?”


लेकिन अब वो सवाल ज़्यादा देर टिकते नहीं थे।


पहले रमा बहुत रोती थी। हर छोटी बात उसे अंदर तक तोड़ देती थी। वो उम्मीद करती थी कि उसका पति उसका साथ देगा।


एक दिन उसने हिम्मत करके रवि से कहा था,

“क्या मैं इतनी गलत हूँ कि मुझे कभी समझा ही नहीं जाता?”


रवि ने गुस्से में कहा,

“मेरी माँ कभी गलत नहीं हो सकती। तुम ही एडजस्ट करना सीखो।”


उस दिन के बाद रमा ने कुछ बदल दिया।


उसने रोना छोड़ दिया।


धीरे-धीरे उसने खुद को समझाया—

“अगर मुझे ही अपनी परवाह नहीं होगी, तो कोई और क्यों करेगा?”


अब वो समय पर खाना खाती थी।

थकती तो थोड़ी देर आराम भी कर लेती थी।

सास कुछ कहतीं तो वो चुप रहती, लेकिन अंदर से टूटती नहीं थी।


एक दिन सास ने ताना मारा,

“बहू के तो नखरे ही खत्म नहीं होते…”


रमा ने पहली बार शांत आवाज़ में जवाब दिया,

“नखरे नहीं हैं मम्मी जी… बस अब मैं अपनी सेहत का ध्यान रखती हूँ।”


सास चुप हो गईं। शायद उन्हें ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी।


रवि भी अब नोटिस करने लगा था कि रमा बदल गई है। वो अब पहले जैसी कमजोर नहीं रही।


एक रात उसने पूछा,

“तुम अब पहले जैसी क्यों नहीं हो?”


रमा ने सीधा जवाब दिया,

“क्योंकि अब मैंने खुद को खोना बंद कर दिया है।”


उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा। पूरी तरह नहीं, लेकिन थोड़ा-थोड़ा।


सास अब भी वही थीं, रवि भी पूरी तरह नहीं बदला था—लेकिन रमा बदल चुकी थी।


और कभी-कभी, एक इंसान का बदलना ही काफी होता है पूरी कहानी बदलने के लिए।


रमा अब समझ चुकी थी—

हर जगह प्यार नहीं मिलता,

लेकिन खुद से प्यार करना हमेशा अपने हाथ में होता है।


और जब इंसान खुद के लिए खड़ा होना सीख जाता है,

तो दुनिया उसे नजरअंदाज करना धीरे-धीरे छोड़ देती है।



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