सीख जो घर बचा ले
शाम का समय था। घर के आँगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था और हल्की ठंडी हवा चल रही थी। राधा अपने मायके आई हुई थी। उसकी शादी को अभी दो साल ही हुए थे, लेकिन चेहरे पर संतोष साफ दिखता था।
रसोई में उसकी माँ, कमला जी, खाना बना रही थीं। जैसे ही राधा अंदर आई, माँ ने बात शुरू कर दी—
“राधा, एक बात पूछूँ… तुम्हें पता है न कि तुम्हारा पति कितनी सैलरी कमाता है?”
राधा मुस्कुराई—
“नहीं माँ, और सच कहूँ तो मैंने कभी पूछा भी नहीं।”
कमला जी ने चौंक कर कहा—
“क्या? आजकल की लड़की होकर भी तुम्हें ये सब नहीं पता? अरे ये सब जानना जरूरी होता है।”
राधा ने शांति से जवाब दिया—
“माँ, वो मेरी हर जरूरत बिना कहे पूरी कर देते हैं। मुझे कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने देते। फिर मुझे हिसाब क्यों चाहिए?”
कमला जी ने थोड़ा नाराज़ होकर कहा—
“तुम समझ नहीं रही हो। अगर वो अपने घरवालों पर ज्यादा खर्च कर रहे हों तो? तुम्हें भी तो अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।”
राधा ने प्यार से कहा—
“माँ, उनके माता-पिता भी तो उनके ही हैं। उनका हक पहले है। और जहाँ प्यार और भरोसा होता है, वहाँ हिसाब नहीं होता।”
कमला जी सिर हिलाते हुए बोलीं—
“तुम्हें कुछ समझ नहीं आता। मैं तो तुम्हारे भले के लिए कह रही हूँ।”
राधा कुछ नहीं बोली और चुपचाप अपनी दादी, शारदा जी, के पास चली गई जो पूजा कर रही थीं।
दादी की सीख...
राधा दादी के पास आकर चुपचाप बैठ गई। कुछ पल बाद उसने धीरे से पूछा—
“दादी, माँ हमेशा पैसों और हिसाब की बातें क्यों करती रहती हैं?”
शारदा जी ने उसकी ओर स्नेह से देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“बेटा, जो इंसान अपनी ज़िंदगी में कमी और असुरक्षा महसूस करता है, वह हर चीज़ को कसकर पकड़ कर रखना चाहता है। उसे डर रहता है कि कहीं कुछ छूट न जाए।”
राधा ने फिर जिज्ञासा से पूछा—
“लेकिन दादी, क्या हर रिश्ते में हिसाब रखना ज़रूरी होता है?”
दादी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा—
“नहीं बेटा, रिश्ते हिसाब से नहीं, प्यार और भरोसे से चलते हैं।
जहाँ विश्वास होता है, वहाँ घर अपने आप बस जाता है…
और जहाँ हर बात में हिसाब-किताब होने लगे, वहाँ दिलों के बीच दूरियाँ बढ़ने लगती हैं।”
तभी कमला जी भी वहाँ आ गईं। उन्होंने थोड़ा तीखे स्वर में कहा—
“हाँ हाँ, आप तो हमेशा बड़ी-बड़ी बातें ही सिखाएँगी। इसी वजह से मेरी बेटी भी कुछ नहीं समझती।”
राधा को यह अच्छा नहीं लगा। उसने धीरे से कहा—
“माँ, दादी गलत नहीं कह रही हैं।”
कमला जी गुस्से में बोलीं—
“अब तुम भी मुझे ही गलत ठहराओगी?”
राधा ने हिम्मत करके कहा—
“माँ, बचपन से मैंने घर में झगड़े ही देखे हैं। आप हर बात पर शक करती थीं। पापा और दादी ने कभी जवाब नहीं दिया, लेकिन घर का माहौल हमेशा खराब रहा।”
कमला जी चुप हो गईं।
राधा आगे बोली—
“माँ, मैं वैसा घर नहीं बनाना चाहती। मैं अपने रिश्ते को भरोसे पर चलाना चाहती हूँ, डर पर नहीं।”
इतने में राधा के पिता, रमेश जी, भी वहाँ आ गए। उन्होंने पूरे माहौल को समझते हुए शांत स्वर में कहा—
“कमला, आज हमारी बेटी जो कह रही है… वह बिल्कुल सही है।”
कमला जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने धीमे स्वर में पूछा—
“तो क्या… मैं गलत थी?”
रमेश जी ने प्यार से उनकी तरफ देखा और नरमी से बोले—
“नहीं कमला, तुम गलत नहीं थीं… तुम्हारी चिंता भी सही थी।
लेकिन तुम्हारा तरीका गलत था। तुमने हर रिश्ते में डर और शक को जगह दे दी, और वही धीरे-धीरे हमारे घर की शांति छीनता चला गया।”
यह सुनकर कमला जी के पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा।
वह चुपचाप सिर झुकाकर बैठ गईं, जैसे पहली बार अपने ही व्यवहार के बारे में सोच रही हों।
बेटी की समझदारी...
राधा ने धीरे से माँ का हाथ थाम लिया और प्यार से बोली—
“माँ, मैं यहाँ आपसे लड़ने नहीं आई हूँ… मैं तो बस चाहती हूँ कि हमारा घर फिर से पहले जैसा हँसता-खिलखिलाता हो जाए।”
वह कुछ पल रुकी, फिर नरमी से पूछी—
“क्या आपने कभी सोचा है कि मैं और भैया यहाँ कम क्यों आते हैं?”
कमला जी चुप हो गईं। उनकी नज़रें अपने आप नीचे झुक गईं।
राधा ने बहुत ही शांत स्वर में कहा—
“माँ… ये सब आपके गुस्से और हर बात में शक करने की आदत की वजह से है… हम डरते नहीं हैं, लेकिन मन भारी हो जाता है।”
कुछ देर तक कमरे में गहरी खामोशी छाई रही। फिर कमला जी ने धीमे स्वर में कहा—
“शायद… गलती मेरी ही थी।”
इतना कहते ही उनकी आँखें भर आईं, और आँसू धीरे-धीरे गालों पर उतरने लगे।
उन्होंने काँपते हाथों से आँचल सँभालते हुए शारदा जी की ओर देखा और बोलीं—
“माँ जी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको कभी समझने की कोशिश ही नहीं की… हमेशा अपनी ही सोच को सही मानती रही।”
शारदा जी ने स्नेह भरी मुस्कान के साथ उनका हाथ थाम लिया और शांत आवाज़ में बोलीं—
“बहु, इंसान से गलती हो जाना बुरी बात नहीं है…
लेकिन अपनी गलती को समझ लेना, वही सबसे बड़ी समझदारी होती है।”
रमेश जी हल्की मुस्कान के साथ बोले—
“मैं हर माँ से बस एक ही बात कहना चाहता हूँ—
अगर आप अपनी बेटी को अच्छी सीख नहीं दे सकतीं,
तो कम से कम उसे गलत राह पर भी मत ले जाइए।”
यह सुनकर राधा की आँखें नम हो गईं।
वह धीरे से आगे बढ़ी और माँ को गले लगा लिया।
कमला जी ने भी उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया,
जैसे बरसों की दूरी एक पल में खत्म हो गई हो।
उस दिन पहली बार घर में सच में सुकून था—
न कोई तकरार, न कोई शिकायत…
बस अपनापन और शांति की मीठी-सी हवा बह रही थी।
सीख:
रिश्ते भरोसे से बनते हैं, शक से नहीं।
और एक माँ की सोच ही बेटी का घर बना भी सकती है… और बिगाड़ भी सकती है।

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