बदलाव की शुरुआत
शाम का समय था…
हल्की ठंडी हवा चल रही थी और मोहल्ले के बच्चे गली में क्रिकेट खेल रहे थे।
उसी गली के एक घर की बालकनी में खड़ी थी संध्या, जो नीचे अपने 15 साल के बेटे अंकित को खेलते देख मुस्कुरा रही थी।
“मम्मी पानी!” नीचे से अंकित ने आवाज लगाई।
संध्या ने कहा, “खुद आकर ले लो बेटा, मैं अभी सब्ज़ी काट रही हूँ।”
अंकित थोड़ा मुंह बनाते हुए ऊपर आया, पानी लिया और फिर बिना कुछ बोले चला गया।
ये रोज़ का ही था…
घर के कामों से उसका कोई लेना-देना नहीं था।
अगले दिन संध्या की पुरानी दोस्त मेघा उसके घर आई।
दरवाज़ा खुला तो सामने 14 साल का विवान ट्रे में जूस लेकर खड़ा था।
“नमस्ते आंटी!” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मेघा अंदर आई तो देखा—घर बहुत सलीके से सजा हुआ था।
“वाह! बहुत सुंदर घर है तुम्हारा,” संध्या बोली।
तभी विवान बोला, “मम्मी, मैंने कपड़े भी सुखा दिए हैं और डस्टिंग भी कर दी।”
संध्या चौंक गई,
“ये सब… तुमने किया?”
“हाँ आंटी,” विवान बोला, “मम्मी ऑफिस से आती हैं तो थक जाती हैं, इसलिए मैं थोड़ा-थोड़ा काम कर देता हूँ।”
संध्या के चेहरे पर हैरानी साफ थी।
थोड़ी देर बाद दोनों सहेलियाँ बातें करने बैठीं।
संध्या बोली,
“मेघा, तुमने बेटे को इतना सब कैसे सिखा दिया? मेरा अंकित तो पानी तक खुद नहीं लेता।”
मेघा मुस्कुराई,
“मैंने कुछ खास नहीं किया… बस ये समझाया कि ये ‘मदद’ नहीं, उसकी जिम्मेदारी है।”
“पर लड़के कहाँ ये सब करते हैं…” संध्या ने धीरे से कहा।
मेघा ने गंभीर होकर कहा,
“यही तो गलती है हमारी सोच की…
हम बेटियों को सिखाते हैं कि सब संभालो,
और बेटों को सिखाते हैं कि बस संभाले जाओ।”
संध्या चुप हो गई।
उसी समय अंकित अंदर आया और बोला,
“मम्मी कुछ खाने को है?”
संध्या ने कहा,
“फ्रिज में रखा है, खुद ले लो।”
अंकित ने कहा,
“आप दे दो ना…”
तभी विवान बोला,
“चल मैं देता हूँ… और साथ में प्लेट भी लगा देते हैं।”
अंकित ने हैरानी से उसे देखा।
रात को जब मेघा चली गई, संध्या काफी देर तक सोचती रही।
फिर उसने अंकित को बुलाया।
“बेटा, आज से हम दोनों मिलकर घर का काम करेंगे।”
अंकित ने तुरंत कहा,
“मैं? क्यों?”
संध्या ने प्यार से कहा,
“क्योंकि ये घर सिर्फ मेरा नहीं, तुम्हारा भी है।”
अगले दिन…
अंकित पहली बार किचन में खड़ा था।
“ये चाय कैसे बनती है?” उसने पूछा।
संध्या मुस्कुरा दी,
“आओ, सिखाती हूँ।”
शुरुआत में अंकित को सब अजीब लगा…
कभी चाय ज़्यादा उबल जाती,
कभी नमक ज़्यादा हो जाता।
पर धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा।
कुछ हफ्तों बाद…
एक दिन संध्या की रिश्तेदार घर आईं।
अंकित ट्रे में चाय और नाश्ता लेकर आया।
“अरे वाह! ये सब तुमने बनाया?” उन्होंने पूछा।
अंकित गर्व से बोला,
“जी, मम्मी के साथ मिलकर।”
संध्या की आँखों में खुशी झलक रही थी।
बाद में अंकित ने हंसते हुए कहा,
“मम्मी, अब समझ आया… ये काम आसान नहीं है।”
संध्या बोली,
“इसलिए तो कहती हूँ, सबको सीखना चाहिए।”
अंकित मुस्कुराया,
“अब मैं भी अपने दोस्तों को सिखाऊंगा…
ताकि कोई ये ना कहे कि लड़के ये काम नहीं कर सकते।”
संध्या ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“मेरा बेटा किसी से कम नहीं…
घर के काम में भी नहीं।”
अंकित ने मज़ाक में कॉलर उठाई,
“बिल्कुल! मैं ऑलराउंडर हूँ!”
दोनों हँस पड़े।
सीख:
बदलाव बड़े भाषणों से नहीं…
छोटी-छोटी आदतों से शुरू होता है।
जब हम बेटों को भी जिम्मेदारी सिखाएंगे,
तभी असली बराबरी आएगी।

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