हीरे की पहचान
कमला जी ने जैसे ही दवाई का डिब्बा खोला, दरवाज़े की घंटी तेज़ी से बज उठी। रात काफी हो चुकी थी, इसलिए उनका दिल हल्का-सा घबरा गया।
“इतनी रात को कौन हो सकता है…?” उन्होंने धीरे से खुद से कहा और दरवाज़े की तरफ बढ़ गईं।
दरवाज़ा खोला तो सामने दीपा और उनके पति खड़े थे।
“अरे दीपा… तुम लोग? सब ठीक है ना?” कमला जी ने चिंता से पूछा।
दीपा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“भाभी, क्या हम बिना बताए नहीं आ सकते? या अब आने से पहले इजाज़त लेनी पड़ेगी?”
कमला जी ने तुरंत संभलते हुए कहा,
“अरे नहीं-नहीं, ऐसा क्यों कह रही हो… ये भी तुम्हारा ही घर है। आओ अंदर आओ।”
दोनों अंदर आकर सोफे पर बैठ गए।
कमला जी ने पूछा,
“खाना खा लिया तुम लोगों ने या कुछ बनाऊँ?”
दीपा ने थोड़ा ताना मारते हुए कहा,
“भाभी, मायके में कोई खाना खाकर आता है क्या? माँ होती तो बिना पूछे थाली लगा देती…”
कमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“माँ और भाभी में फर्क तो होता है दीपा… लेकिन समय भी देखो, रात काफी हो गई है। फिर भी तुम बैठो, मैं कुछ बना देती हूँ।”
दीपा ने तुरंत कहा,
“तो अपनी बहू को बुला लो ना… वही बना देगी।”
कमला जी ने शांत स्वर में कहा,
“वो अभी सो गई है, बच्चों की वजह से सुबह जल्दी उठती है। मैं बना देती हूँ।”
दीपा ने हंसते हुए ताना मारा,
“वाह भाभी, कैसी बहू है आपकी… घर में मेहमान आए हैं और वो सो रही है!”
कमला जी ने बिना नाराज़ हुए कहा,
“हर चीज़ देखने का नजरिया अलग होता है दीपा…”
इतने में दीपा ने बात बदलते हुए कहा,
“वैसे भाभी, हम एक जरूरी बात करने आए हैं… मेरी बहू की बहन नंदिता है ना, लंदन से पढ़कर आई है… बहुत पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की है। सोच रही थी उसे अपनी छोटी बहू बना लो।”
कमला जी कुछ पल चुप रहीं, फिर धीरे से बोलीं,
“दीपा, पढ़ाई-लिखाई अपनी जगह है… लेकिन घर बसाने के लिए सिर्फ डिग्री नहीं, दिल और समझदारी चाहिए।”
दीपा ने थोड़ा जोर देकर कहा,
“भाभी, आजकल पढ़ी-लिखी लड़की ही घर संभाल सकती है।”
कमला जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा,
“अगर सिर्फ पढ़ाई से ही घर चलता, तो हर पढ़ा-लिखा घर खुश होता… लेकिन ऐसा नहीं है।”
दीपा थोड़ी चिढ़कर बोली,
“आप तो बस अपनी बहू की ही तारीफ करती रहती हो…”
कमला जी की आवाज़ अब थोड़ी गंभीर हो गई,
“क्यों ना करूँ? उसने इस घर के लिए बहुत कुछ किया है। जब मैं बीमार पड़ी थी, उसने अपनी नौकरी छोड़ दी… अपने बच्चों के साथ-साथ मुझे भी संभाला… और मेरे बेटे की हर कमी को सहकर भी घर को जोड़े रखा।”
इतने में अंदर से धीमी आवाज़ आई,
“बुआ जी, फूफा जी… नमस्ते…”
सबने मुड़कर देखा—सुनीता खड़ी थी।
“मम्मी जी, आपने मुझे उठाया क्यों नहीं?” उसने प्यार से पूछा।
कमला जी ने कहा,
“तुम सो रही थी बेटा, इसलिए नहीं उठाया।”
सुनीता ने तुरंत कहा,
“कोई बात नहीं, मैं अभी खाना बनाकर लाती हूँ।”
वो किचन की तरफ बढ़ी ही थी कि कमला जी ने कहा,
“रुको, मैं भी आती हूँ मदद करने।”
सुनीता मुस्कुराई,
“आप बैठिए मम्मी जी… आपने दवाई भी नहीं ली अभी तक। मैं सब कर लूंगी।”
कुछ ही देर में रसोई से खाने की खुशबू आने लगी।
दीपा चुपचाप ये सब देख रही थी। उसके चेहरे पर अब पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था।
कमला जी ने धीरे से कहा,
“देखा दीपा… बहू सिर्फ पढ़ी-लिखी होने से अच्छी नहीं होती… वो अच्छी होती है अपने व्यवहार से, अपने त्याग से।”
दीपा ने धीमे स्वर में कहा,
“भाभी… शायद आप सही कह रही हो…”
कमला जी मुस्कुराईं,
“हीरा चमकता जरूर है… लेकिन उसकी पहचान सिर्फ चमक से नहीं होती… उसकी कीमत उसके गुणों से होती है।”
थोड़ी देर बाद सुनीता खाना लेकर आई और सबके सामने प्यार से परोसने लगी।
दीपा ने पहली बार बिना ताना मारे कहा,
“भाभी… आपकी बहू सच में बहुत अच्छी है…”
कमला जी ने गर्व से कहा,
“हाँ दीपा… मेरी सुनीता हीरा है… और मैं अपनी छोटी बहू भी हीरा ही लाऊंगी।”
उस रात घर में सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि रिश्तों की सच्ची समझ भी परोसी गई थी।

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