एक थाली की कीमत
रेलवे स्टेशन के बाहर हलचल अपने पूरे शोर पर थी। गाड़ियों का आना-जाना, चाय वालों की आवाजें, और भीड़ में खोए हुए चेहरे—सब कुछ सामान्य था, लेकिन उस दिन कुछ अलग होने वाला था।
राहुल अपनी कम्पनी के काम से लुधियाना आया हुआ था। साथ में उसका एक जूनियर कर्मचारी, अमित, भी था। मीटिंग खत्म होने के बाद दोनों ने सोचा कि पास के एक अच्छे रेस्टोरेंट में बैठकर खाना खाया जाए।
दोनों एक मशहूर ढाबा-स्टाइल रेस्टोरेंट में पहुंचे। माहौल अच्छा था, लोग हँसते-बोलते खाना खा रहे थे। उन्होंने खाना ऑर्डर किया और काम से जुड़ी बातें करने लगे।
लेकिन राहुल का ध्यान बार-बार दरवाजे की तरफ जा रहा था।
अमित ने पूछा,
“सर, सब ठीक है? आप कुछ परेशान लग रहे हैं।”
राहुल ने हल्की आवाज में कहा,
“वहाँ देखो… दरवाजे के पास…”
अमित ने देखा—एक कमजोर सा बुजुर्ग आदमी खड़ा था। उम्र लगभग 75-80 साल होगी। फटे कपड़े, झुका हुआ शरीर, और आँखों में उम्मीद… वह हर आने-जाने वाले को देखता और हाथ से खाने का इशारा करता।
कुछ लोग उसे नजरअंदाज कर रहे थे, कुछ ने उसे ऐसे देखा जैसे वह वहाँ है ही नहीं।
राहुल की आँखें गहरी हो गईं।
“तुम्हें पता है अमित…”
वह धीरे से बोला,
“जब मैं छोटा था, एक बार मैं अपने पापा के साथ बाहर खाना खाने गया था…”
अमित चुपचाप सुनने लगा।
“वहाँ भी ऐसा ही एक बुजुर्ग मिला था। मैंने उसे डाँट दिया था… लेकिन मेरे पापा अंदर गए, खाना पैक करवाया और उसे खिलाया। फिर मुझसे बोले—
‘बेटा, पैसे देना आसान है, लेकिन किसी को इज्जत से खाना खिलाना सबसे बड़ा काम होता है।’”
राहुल की आवाज भर्रा गई।
“आज वही बात याद आ रही है…”
यह कहकर वह अचानक उठ गया।
अमित थोड़ा चौंका, लेकिन वह भी पीछे-पीछे चला।
राहुल बाहर गया और उस बुजुर्ग के पास जाकर बोला,
“बाबा, खाना खाओगे?”
बुजुर्ग ने बिना कुछ बोले सिर हिला दिया।
राहुल ने गार्ड से बात की और उन्हें एक किनारे बैठा दिया। फिर अंदर आकर मैनेजर से बोला,
“क्या हम इन्हें अंदर बैठाकर खाना खिला सकते हैं?”
मैनेजर ने पहले बुजुर्ग को देखा, फिर राहुल को।
कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—
“सर, आमतौर पर हम ऐसे लोगों को अंदर नहीं आने देते… लेकिन…”
वह हल्का सा मुस्कुराया और बोला,
“आमतौर पर ऐसा नहीं होता… लेकिन आज आपके लिए एक खास व्यवस्था कर देते हैं।”
कुछ ही देर में बुजुर्ग को अंदर एक कोने में बैठाया गया। राहुल और अमित भी वहीं बैठ गए।
अमित के चेहरे पर थोड़ी झिझक थी, लेकिन राहुल बहुत सहज था।
तीनों के सामने खाना परोसा गया।
बुजुर्ग पहले थोड़ा संकोच में थे, लेकिन फिर धीरे-धीरे खाने लगे। हर कौर में जैसे उन्हें सुकून मिल रहा था।
खाना खत्म होने के बाद राहुल ने पूछा,
“बाबा, और कुछ चाहिए?”
बुजुर्ग ने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बेटा, आज बहुत दिनों बाद पेट भर गया…”
उनकी आँखों में हल्की चमक थी।
इतने में वेटर बिल लेकर आया।
राहुल ने बिल देखा—
उसमें तीन थालियाँ लिखी थीं… लेकिन कीमत की जगह “₹0” लिखा था।
राहुल ने आश्चर्य से मैनेजर की तरफ देखा।
मैनेजर पास आया और बोला—
“सर, आज का खाना हमारी तरफ से।”
राहुल ने कहा,
“नहीं नहीं, ऐसा क्यों?”
मैनेजर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
“क्योंकि हर दिन लोग यहाँ पैसा खर्च करते हैं… लेकिन इंसानियत बहुत कम लोग दिखाते हैं।”
राहुल कुछ बोल नहीं पाया।
बाहर निकलते समय उसने बुजुर्ग को कुछ खाने का सामान दिलवाया—ब्रेड, बिस्कुट, दूध।
बुजुर्ग ने जाते-जाते राहुल का हाथ पकड़ लिया और कहा—
“भगवान तुम्हें खुश रखे बेटा… आज मुझे मेरे बेटे की याद आ गई…”
राहुल की आँखें फिर भर आईं।
बाहर आते ही अमित ने धीमी आवाज में कहा,
“सर… आज आपने मुझे बहुत बड़ा सबक सिखा दिया।”
राहुल मुस्कुराया,
“नहीं अमित… ये सबक मैंने भी अपने पापा से ही सीखा था।”
दोनों आगे बढ़ गए।
भीड़ वही थी… शोर वही था…
लेकिन राहुल के अंदर कुछ बदल चुका था।
और शायद अमित के अंदर भी।

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