जिस दिन माँ ने फिर से बिंदी लगाई
शाम ढल रही थी। आसमान में सूरज की आख़िरी किरणें जैसे धीरे-धीरे बुझ रही थीं—ठीक वैसे ही जैसे इस घर की खुशियाँ।
घर के आँगन में रखी कुर्सी पर आरती चुपचाप बैठी थी। सामने कपड़े सूख रहे थे, लेकिन उसकी आँखें कहीं और अटकी थीं—बीते हुए दिनों में।
छह महीने हो चुके थे आदित्य को गए हुए।
एक सड़क हादसा… और सब खत्म।
आरती की उम्र अभी सिर्फ़ 29 साल थी। दो बच्चे—नौ साल का नील और छह साल की तारा—अब उसकी पूरी दुनिया थे।
लेकिन उस दुनिया में अब रंग नहीं थे।
उसने रंगीन कपड़े पहनना छोड़ दिया था। चूड़ियाँ उतार दी थीं। बिंदी लगाना बंद कर दिया था।
आईने से भी जैसे रिश्ता खत्म हो गया था।
घर में सन्नाटा रहता था… और बच्चों की हँसी भी अब धीमी पड़ गई थी।
नील अक्सर अपनी माँ को चुपचाप देखा करता था।
उसकी छोटी-सी दुनिया में सबसे बड़ा सवाल अब यही था—मम्मा पहले जैसी क्यों नहीं रहीं।
एक दिन उसने धीरे से अपनी बहन तारा से पूछा,
“तारा… मम्मा अब हँसती क्यों नहीं हैं?”
तारा ने मासूम आँखों से उसकी तरफ देखा और भोलेपन से बोली,
“क्योंकि पापा भगवान के पास चले गए ना…”
नील कुछ पल चुप रहा। उसकी आँखें झुक गईं, जैसे वो कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो।
फिर उसने बहुत धीरे से पूछा—
“तो… क्या मम्मा अब हमेशा ऐसी ही रहेंगी?”
तारा के पास इस बार कोई जवाब नहीं था।
वो बस चुपचाप अपने भाई को देखने लगी।
और उस छोटे-से सवाल ने…
घर की हर दीवार को जैसे खामोश कर दिया।
कुछ दिनों बाद आरती की बड़ी ननद, कविता, घर आई।
वो परंपराओं में बहुत विश्वास रखती थी।
उसने देखा—आरती बिना बिंदी, बिना सिंगार, बिल्कुल सादे कपड़ों में।
पहले तो उसे संतोष हुआ… लेकिन फिर उसकी नजर टेबल पर रखी एक छोटी-सी बिंदी की डिब्बी पर गई।
वो चौंक गई।
रात के खाने के बाद उसने अपने पिताजी (रमेश जी) और माँ से कहा—
“पिताजी, ये क्या है?
अब भी भाभी के कमरे में बिंदी की डिब्बी रखी है?
आप लोग ध्यान नहीं दे रहे क्या?”
कमरे में एक पल को सन्नाटा छा गया।
रमेश जी ने धीरे से उसकी तरफ देखा—
“तो क्या हुआ अगर रखी है?”
कविता का स्वर तेज हो गया,
“क्या मतलब ‘तो क्या हुआ’?
अभी साल भी नहीं हुआ… और अगर वो फिर से सिंगार करने लगी तो लोग क्या कहेंगे?”
रमेश जी की आँखें भर आईं, लेकिन आवाज़ सख्त थी—
“लोग क्या कहेंगे…?
जब मेरा बेटा मर रहा था… तब ये लोग कहाँ थे?”
कमरा बिल्कुल शांत हो गया।
उन्होंने आगे कहा—
“किसी ने नहीं पूछा कि हम कैसे जी रहे हैं…
किसी ने नहीं देखा कि ये दो बच्चे हर रात अपने पिता को याद करके रोते हैं…”
उनकी आवाज़ टूटने लगी—
“और तू कहती है… लोग क्या कहेंगे…”
रमेश जी कुछ पल चुप रहे… फिर धीमे स्वर में बोले—
“तुझे पता है, एक रात क्या हुआ था?”
सबकी नज़रें उनकी तरफ उठ गईं।
“तारा को तेज बुखार था।
आरती पूरी रात उसके सिर पर पानी की पट्टियाँ रखती रही…”
“सुबह जब बुखार थोड़ा उतरा…
तो तारा ने आँखें खोलकर अपनी माँ को देखा…”
“और क्या बोली पता है?”
कविता अब चुप थी।
“उसने कहा—
‘मम्मा… आप डरावनी लग रही हो… आप पहले वाली मम्मा बन जाओ ना…’”
ये सुनते ही कमरे में बैठे सब लोगों की साँसें जैसे थम गईं।
रमेश जी की आँखों से आँसू बहने लगे—
“उस दिन… पहली बार मैंने अपनी बहू को टूटते हुए देखा…”
“अगले दिन,” रमेश जी बोले,
“नील स्कूल से आया… और चुपचाप अपने कमरे में चला गया।”
कुछ देर बाद वो एक छोटा-सा कागज़ लेकर आया।
उसने अपनी माँ को दिया।
आरती ने कांपते हाथों से वो कागज़ खोला।
उसमें एक तस्वीर बनी थी—
एक घर…
उसके बीच में एक औरत… माथे पर बड़ी-सी बिंदी… मुस्कुराती हुई…
और उसके पास लिखा था—
“मुझे मेरी पुरानी मम्मा वापस चाहिए…”
ये पढ़ते ही आरती ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ी।
उस दिन शाम को, रमेश जी और उनकी पत्नी ने फैसला किया—
“अगर एक छोटी-सी बिंदी…
इन बच्चों को उनकी माँ लौटा सकती है…
तो ये बिंदी जरूर लगेगी…”
आज का दिन…
कविता अभी भी चुप बैठी थी।
उसी समय आरती धीरे-धीरे कमरे में आई।
उसकी आँखें नम थीं… लेकिन आज कुछ अलग था।
उसके हाथ में वही बिंदी की डिब्बी थी।
वो सबके सामने आई… और कांपते हाथों से एक छोटी-सी लाल बिंदी अपने माथे पर लगा ली।
कमरे में सन्नाटा था।
तभी तारा दौड़कर आई—
“मम्मा… आप फिर से सुंदर लग रही हो!”
नील की आँखों में चमक थी—
कई महीनों बाद।
कविता की आँखों से आँसू बहने लगे।
वो धीरे से उठी… और आरती के पास आकर उसका हाथ पकड़ लिया—
“मुझे माफ कर दो…
मैं समझ नहीं पाई…”
आरती ने बस इतना कहा—
“मैं आज भी वही हूँ दीदी…
बस अब मुझे बच्चों के लिए जीना सीखना है…”
उस दिन घर में पहली बार…
दर्द के साथ-साथ उम्मीद भी वापस आई थी।
और शायद सच भी यही है—
“कुछ औरतें बिंदी इसलिए नहीं लगातीं कि उनका दुख कम हो गया…
वो इसलिए लगाती हैं… क्योंकि उनके बच्चों को उनकी मुस्कान चाहिए होती है।”

Post a Comment