नई शुरुआत: उम्र नहीं, हौसला मायने रखता है
घर के ड्राइंग रूम में सूटकेस खुले पड़े थे…
कपड़े करीने से तह किए जा रहे थे, लेकिन मन बिखरा हुआ था।
“माँ, ये दवाइयाँ भी रख लो… और ये फाइल… और ये वाला शॉल भी,”
अंजलि ने जल्दी-जल्दी सामान रखते हुए कहा।
माँ मुस्कुराईं,
“इतना सब ले जाऊँगी तो लगेज ओवरवेट हो जाएगा बेटा।”
“माँ… मज़ाक मत करो… मैं सच में कह रही हूँ… इस बार आपको अकेले नहीं छोड़ूँगी।”
माँ ने हल्के से उसकी तरफ देखा,
“और मेरा ये घर? ये आँगन? ये पौधे? इन्हें कौन देखेगा?”
अंजलि ने थोड़ी झुंझलाहट से कहा,
“घर बाद में भी देखा जा सकता है… आप पहले अपने आप को तो देखिए… पापा के जाने के बाद आप बिल्कुल बदल गई हैं।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
माँ ने खिड़की से बाहर झाँका… वही नीम का पेड़… वही गली… वही पड़ोस की आवाज़ें…
“बदल गई हूँ… या समझदार हो गई हूँ?”
उन्होंने धीमे से कहा।
अंजलि उनकी तरफ आई,
“माँ… समझदारी अकेले रहने का नाम नहीं होती… आपको भी किसी की ज़रूरत है।”
माँ ने मुस्कुराकर बात टाल दी,
“अरे, मैं ठीक हूँ… तुम फिक्र मत करो।”
लेकिन अंजलि इस बार मानने वाली नहीं थी।
“नहीं माँ… इस बार आप मेरे साथ चल रही हैं… बस।”
काफी देर तक समझाने, मनाने और थोड़ा-बहुत भावनात्मक दबाव डालने के बाद… माँ मान गईं।
घर का एक हिस्सा बंद किया गया… बाकी किराए पर दे दिया गया…
और माँ… अपने छोटे शहर की यादों को दिल में समेटे… दिल्ली आ गईं।
दिल्ली…
ऊँची-ऊँची इमारतें… तेज़ भागती ज़िंदगी… और फ्लैट के अंदर सिमटी दुनिया…
पहले ही दिन माँ ने बालकनी से नीचे झाँककर कहा,
“इतनी ऊँचाई पर तो पंछी भी सोच-समझ कर बैठते होंगे…”
अंजलि हँस पड़ी,
“माँ… आदत हो जाएगी।”
लेकिन आदत इतनी जल्दी कहाँ बनती है…
सुबह अंजलि और उसका पति ऑफिस निकल जाते…
और माँ… पूरे दिन घर में अकेली।
टीवी चलता… लेकिन मन नहीं लगता।
फोन उठातीं… फिर रख देतीं।
रसोई में कुछ बनातीं… फिर खुद ही थोड़ा सा खाकर छोड़ देतीं।
“ये कैसी ज़िंदगी है…”
एक दिन उन्होंने खुद से कहा।
एक शाम, बालकनी में बैठी थीं कि सामने वाली बालकनी से आवाज़ आई—
“नमस्ते! नई आई हैं क्या?”
माँ ने सिर उठाया… सामने एक हँसमुख महिला खड़ी थीं।
“जी… अभी कुछ दिन पहले ही आई हूँ।”
“अच्छा! मैं रीना… आप?”
“सविता…”
“तो सविता जी… कल से नीचे पार्क में आइए… हमारी ‘सीनियर मंडली’ बैठती है… बहुत मज़ा आता है।”
माँ ने हल्की हिचकिचाहट से कहा,
“अरे नहीं… मैं ऐसे कहीं जाती-वाती नहीं…”
रीना हँस दी,
“यही तो दिक्कत है… हम लोग खुद को रोक लेते हैं… चलिए, कल मैं लेने आ जाऊँगी।”
अगले दिन…
माँ थोड़ा तैयार हुईं… मन में हल्की झिझक थी… लेकिन रीना आ ही गई।
पार्क में पहुँचीं तो देखा… उनकी उम्र के कई लोग हँस-बोल रहे थे…
कोई योग कर रहा था…
कोई गाना गा रहा था…
तो कोई बच्चों के साथ खेल रहा था।
“आइए… आइए…”
सबने बड़े अपनापन से स्वागत किया।
धीरे-धीरे माँ भी बैठ गईं…
पहले दिन बस देखती रहीं…
दूसरे दिन थोड़ी बात की…
तीसरे दिन हँसी भी…
और फिर… वही पार्क उनका अपना लगने लगा।
कुछ दिनों बाद…
“सविता जी! इस रविवार हम लोग अनाथ आश्रम जा रहे हैं… बच्चों के साथ समय बिताने… आप भी चलिए ना।”
माँ ने पहली बार बिना सोचे कहा,
“हाँ… चलूँगी।”
उस दिन…
उन्होंने बच्चों के साथ खेला… उन्हें कहानियाँ सुनाईं… खाना खिलाया…
और जब एक छोटी बच्ची ने आकर उनका हाथ पकड़कर कहा—
“दादी… आप फिर आओगी ना?”
माँ की आँखें भर आईं।
“हाँ… ज़रूर आऊँगी।”
अब उनकी दिनचर्या बदल चुकी थी…
सुबह पार्क…
दोपहर में कुछ पढ़ना…
शाम को बच्चों के साथ समय…
और सबसे बड़ी बात—
अब वो अकेली नहीं थीं।
एक दिन अंजलि ऑफिस से लौटी तो देखा…
माँ बड़े खुश होकर फोन पर किसी से बात कर रही थीं।
“हाँ-हाँ… मैं भी आ रही हूँ ट्रिप पर… बिल्कुल!”
अंजलि ने मुस्कुराते हुए पूछा,
“माँ… क्या प्लान बन रहा है?”
माँ ने चमकती आँखों से कहा—
“हमारी सीनियर मंडली शिमला जा रही है… और मैं भी जा रही हूँ!”
अंजलि थोड़ी हैरान हुई… फिर खुश होकर बोली—
“वाह माँ! ये तो कमाल है!”
माँ ने हल्की-सी मुस्कान और आँखों में आत्मविश्वास लिए कहा—
“हाँ… अब मैं सिर्फ तुम्हारी माँ ही नहीं,
मैं अपनी भी हूँ… अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीने वाली।”
रात को…
अंजलि बालकनी में खड़ी थी…
अंदर से माँ की स्नेह भरी आवाज़ आई—
“सो जाओ बेटा… कल ऑफिस है ना तुम्हें…”
अंजलि हल्के से मुस्कुराई…
धीरे से बोली—
“धन्यवाद माँ… आपने खुद को फिर से पा लिया…”
अंदर से माँ ने जवाब दिया—
“नहीं बेटा…
मैंने खुद को नहीं…
ज़िंदगी को फिर से जीना सीख लिया है…”
कभी-कभी…
हमें किसी नए शहर की नहीं…
बस एक नए नज़रिये की ज़रूरत होती है।

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