अपनी जगह
अनिता कुर्सी पर बैठी अपने घुटनों को हल्के-हल्के दबा रही थी। दर्द आज कुछ ज्यादा ही था।
तभी फोन की घंटी बजी।
“हैलो भाभी!” उधर से चहकती आवाज आई।
“हाँ दीदी…” अनिता ने धीरे से जवाब दिया।
“हम लोग आज शाम तक आ रहे हैं। बस सोचा बता दूँ, अचानक आने में मज़ा ही कुछ और है!”
फोन कटते ही अनिता का दिल धक-धक करने लगा।
“हे भगवान…! अभी घर भी ठीक से साफ नहीं है… और खाने का क्या होगा?”
वह तुरंत उठी और रसोई की तरफ बढ़ी।
“आलू… दाल… सब्जी… मिठाई भी बनानी पड़ेगी… दीदी को तो हर चीज़ परफेक्ट चाहिए…”
इतने में उसकी बहू, रिया, कमरे से बाहर आई। वह वर्क फ्रॉम होम कर रही थी और अभी-अभी मीटिंग खत्म हुई थी।
“मम्मी जी, क्या हुआ? आप इतनी जल्दी-जल्दी क्यों कर रही हैं?” उसने चिंता से पूछा।
अनिता ने घबराते हुए कहा, “तेरी बुआ सास आ रही हैं पूरे परिवार के साथ। कम से कम दस लोग होंगे। सब कुछ बनाना पड़ेगा… और तू तो जानती है, उन्हें थोड़ा भी कम लगे तो…”
रिया ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी जी, पहले आप बैठिए।”
“अरे बैठने का समय नहीं है बेटा!” अनिता बोलीं।
रिया ने उन्हें मजबूती से कुर्सी पर बैठा दिया।
“समय है… और सबसे पहले आपकी सेहत का समय है।”
अनिता चौंक गईं।
“पर मेहमान…?”
रिया मुस्कुराई, “मेहमान हमारे लिए हैं, हम मेहमानों के लिए नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि हम सब मिलकर उनका स्वागत करेंगे, पर खुद को थकाकर नहीं।”
अनिता समझ नहीं पा रही थीं।
रिया ने आगे कहा, “मैंने पास वाले अच्छे रेस्टोरेंट से खाना ऑर्डर कर दिया है। और मिठाई भी आ जाएगी। आप बस आराम कीजिए।”
“नहीं बेटा! ऐसा कैसे? लोग क्या कहेंगे? मेरी इज्जत…”
रिया ने धीरे से कहा, “इज्जत खाना बनाने से नहीं, व्यवहार से मिलती है।”
अनिता चुप हो गईं।
उनकी आँखों के सामने पुरानी बातें घूमने लगीं…
जब वह नई-नई इस घर में आई थीं, तब एक बार तेज बुखार में भी उन्होंने पूरे परिवार के लिए खाना बनाया था। किसी ने नहीं पूछा था कि “तुम ठीक हो या नहीं?”
बस एक ही बात कही गई थी— “बहू का काम है करना।”
आज वही बातें उनके अंदर कहीं गहराई में बैठी हुई थीं।
शाम को दरवाज़े की घंटी बजी।
रिया ने दरवाज़ा खोला।
“आइए बुआ जी!”
सब अंदर आए। हँसी-मजाक शुरू हो गया।
बुआ जी ने बैठते ही कहा, “अरे भाभी, कुछ खाने को लाओ… बहुत भूख लगी है!”
अनिता घबरा गईं।
तभी रिया ट्रे लेकर आई।
“बुआ जी, ये लीजिए… गरमा-गरम खाना।”
टेबल पर सुंदर तरीके से सजा हुआ खाना देखकर सब खुश हो गए।
“वाह! क्या बात है!” किसी ने कहा।
रिया ने मुस्कुराकर कहा, “मम्मी जी बनाने ही वाली थीं, लेकिन मैंने उन्हें रोका। उनके घुटनों में दर्द है, और मैं नहीं चाहती थी कि वो किचन में लगी रहें और आप लोगों के साथ बैठ भी न पाएं।”
बुआ जी थोड़ी देर के लिए चुप हो गईं।
फिर बोलीं, “हाँ भाभी… अब आराम भी जरूरी है।”
अनिता ने हैरानी से रिया को देखा।
आज पहली बार किसी ने उनके दर्द को इतने खुले तौर पर सबके सामने रखा था—बिना शर्म के, बिना डर के।
पूरी शाम हँसी-मजाक में निकल गई।
न कोई भाग-दौड़… न कोई तनाव…
बस अपनापन।
रात को जब सब सो गए, अनिता धीरे से रिया के कमरे में गईं।
रिया मोबाइल रखकर बोली, “आइए मम्मी जी।”
अनिता की आँखों में आँसू थे।
“रिया… आज तूने मुझे बहुत बड़ी बात सिखा दी।”
“क्या मम्मी जी?”
“कि खुद का ख्याल रखना गलत नहीं होता।”
रिया मुस्कुराई।
अनिता आगे बोलीं, “मैं हमेशा सोचती थी कि अच्छी बहू वही है जो चुपचाप सब सह ले… लेकिन आज समझ आया कि अच्छी बहू वो है जो अपने और अपने परिवार का ध्यान रखे।”
रिया ने उनका हाथ थाम लिया।
“मम्मी जी, घर प्यार से चलता है… बलिदान से नहीं।”
अनिता की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं थे।
ये सुकून के थे।
उस रात अनिता को सालों बाद गहरी नींद आई।
उन्हें लगा जैसे उन्होंने पहली बार खुद को जगह दी है…
और शायद यही असली खुशी होती है—
जब इंसान दूसरों के साथ-साथ खुद को भी समझने लगे।

Post a Comment