अपनी हद जानना जरूरी है
आँगन में रखे पुराने सोफे पर बैठी मीना अपने हाथों में खर्चों की कॉपी पकड़े कुछ जोड़-घटाव कर रही थी। पेंसिल बार-बार रुक जाती, जैसे हर हिसाब उसे किसी नई चिंता में डाल देता हो।
गैस सिलेंडर का बिल, बच्चों की ट्यूशन फीस, बिजली का बकाया… सब कुछ सामने साफ लिखा था, लेकिन फिर भी कुछ न कुछ कम पड़ ही रहा था।
तभी अंदर से सास, शकुंतला जी की आवाज आई—
“मीना, ज़रा इधर आओ, बात करनी है।”
मीना ने कॉपी बंद की और धीरे से उनके पास जाकर बैठ गई—
“जी मम्मी जी?”
शकुंतला जी ने पहले इधर-उधर की दो-चार बातें कीं, फिर असली मुद्दे पर आईं—
“वो… रेखा का फोन आया था। उसे कुछ पैसे चाहिए… बस तीस हजार ही तो हैं।”
मीना के हाथ वहीं रुक गए—
“तीस हजार…?”
“हाँ, ज्यादा थोड़ी है आजकल के हिसाब से। और वो भी अपनी ही बेटी के लिए,” शकुंतला जी ने सहजता से कहा।
मीना ने धीरे लेकिन साफ आवाज में जवाब दिया—
“मम्मी जी, हमारे पास अभी इतने पैसे नहीं हैं।”
बस, यही सुनते ही शकुंतला जी का चेहरा बदल गया—
“कैसे नहीं हैं? तुम भी कमाती हो, राजेश भी कमाता है… फिर भी तीस हजार नहीं निकाल सकते?”
मीना ने खुद को समझाते हुए कहा—
“कमाते हैं, लेकिन खर्च भी उतना ही है। अभी पिछले महीने ही बच्चों की स्कूल फीस गई है, फिर घर की EMI…”
“अरे बहू, खर्च तो हर घर में होते हैं। इसका मतलब ये नहीं कि अपने ही लोगों से मुंह मोड़ लिया जाए,” शकुंतला जी ने ताना मारा।
तभी राजेश भी ऑफिस से आ गया और दोनों को ऐसे बात करते देख थोड़ा रुक गया।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
शकुंतला जी तुरंत बोलीं—
“तेरी बहन को थोड़े पैसे चाहिए, और तेरी पत्नी मना कर रही है।”
राजेश ने मीना की तरफ देखा—
“क्यों? क्या बात है?”
मीना ने शांत स्वर में कहा—
“पैसे चाहिए… लेकिन वजह सुन लो पहले।”
“क्या वजह है?” राजेश ने पूछा।
शकुंतला जी ने खुद ही जवाब दे दिया—
“रेखा अपनी ससुराल वालों के साथ मनाली घूमने जा रही है। थोड़ा खर्च कम पड़ गया है।”
राजेश कुछ पल चुप रहा।
मीना ने धीरे से कहा—
“घूमने के लिए उधार लेना… और वो भी हमसे? ये सही है क्या?”
“तो क्या हुआ?” शकुंतला जी फिर बोलीं—
“सबके साथ जा रही है, अगर पैसे नहीं होंगे तो उसकी बेइज्जती हो जाएगी।”
अब मीना ने पहली बार थोड़ा सख्त स्वर अपनाया—
“मम्मी जी, इज्जत अपने हालात समझने में होती है, दूसरों की बराबरी करने में नहीं।”
शकुंतला जी को ये बात चुभ गई—
“हाँ, तेरे मायके वाले तो बहुत समझदार हैं ना! उनके लिए तो तू सब कुछ कर देती है!”
मीना ने गहरी सांस ली—
“मम्मी जी, मेरे मायके में जब भी मदद दी है, वो मजबूरी में दी है… शौक के लिए नहीं।
और उन्होंने हमेशा पैसे लौटाए हैं।”
राजेश अब तक सब सुन रहा था। उसे पुरानी बातें याद आने लगीं।
तीन साल पहले…
रेखा ने इलाज के नाम पर पचास हजार रुपये लिए थे।
उसके बाद कभी वापस नहीं किए।
फिर एक बार घर की मरम्मत के नाम पर पैसे लिए… वो भी नहीं लौटे।
हर बार वही बात—
“अभी नहीं हैं, बाद में दे देंगे…”
लेकिन वो “बाद में” कभी नहीं आया।
राजेश ने धीरे से कहा—
“मम्मी, सच तो ये है कि रेखा ने पहले भी कई बार पैसे लिए हैं… लेकिन लौटाए नहीं।”
शकुंतला जी थोड़ा असहज हुईं—
“तो क्या हुआ? बहन है वो तेरी…”
“बहन है, इसलिए तो बार-बार मदद की,” राजेश ने जवाब दिया,
“लेकिन क्या जिम्मेदारी सिर्फ हमारी ही है?”
इतने में फोन बजा—
रेखा का ही कॉल था।
शकुंतला जी ने तुरंत उठा लिया—
“हाँ बेटी, बात कर रही थी तेरे भैया से…”
रेखा ने बिना रुके बोलना शुरू कर दिया—
“भाभी, आपको क्या दिक्कत है मेरी मदद करने में?
इतना भी नहीं कर सकती मेरे लिए? सबके सामने मेरी इज्जत का सवाल है!”
मीना ने फोन अपने हाथ में लिया—
“रेखा, अगर सच में जरूरत होती, तो मैं खुद तुम्हारे पास आती।
लेकिन सिर्फ घूमने के लिए हम अपनी बचत नहीं तोड़ सकते।”
रेखा ने तुनककर कहा—
“अच्छा! तो अब मैं तुम्हारे लिए बोझ बन गई?”
“बोझ नहीं,” मीना ने शांत लेकिन मजबूत आवाज में कहा,
“लेकिन आदत गलत बन गई है। बिना लौटाए पैसे लेना… और फिर बार-बार मांगना… ये सही नहीं है।”
फोन पर कुछ पल की खामोशी छा गई।
राजेश ने आगे कहा—
“जब सच में जरूरत होगी, हम सबसे पहले साथ खड़े होंगे।
लेकिन हर बार बिना वजह… ये अब नहीं होगा।”
रेखा ने गुस्से में फोन काट दिया।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
शकुंतला जी चुपचाप बैठी रहीं।
शायद पहली बार उन्हें भी समझ आया कि बात सिर्फ पैसे की नहीं… आदत और जिम्मेदारी की है।
कुछ देर बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
“शायद… मैं ही ज्यादा ज़िद कर रही थी।”
मीना ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“मम्मी जी, अपने लोगों के लिए खड़े होना गलत नहीं है…
लेकिन गलत आदत को बढ़ावा देना भी सही नहीं है।”
उस दिन के बाद घर में एक नया नियम बन गया—
मदद होगी… लेकिन सिर्फ जरूरत के लिए।
और जितनी हो सके… उतनी ही।
रेखा ने कुछ दिन नाराजगी दिखाई…
लेकिन धीरे-धीरे उसने भी समझ लिया—
हर बार मायका सहारा नहीं होता…
कभी-कभी खुद भी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
और मीना…
अब “ना” कहने से डरती नहीं थी।
क्योंकि उसे समझ आ गया था—
रिश्ते निभाने के लिए दिल चाहिए…
लेकिन उन्हें बचाने के लिए सीमाएं भी जरूरी होती हैं।

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