आख़िरी सहारा
शांति देवी चुपचाप चाय बना रही थीं। उनके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे, लेकिन आदत ऐसी थी कि काम रुकता नहीं था।
उधर कमरे में रामकिशन जी खांसते हुए उठे और धीमी आवाज़ में बोले,
“शांति… चाय बनी क्या?”
“हाँ जी, बस ला रही हूँ…”
शांति देवी ने जवाब दिया, मगर आवाज़ में पहले जैसी ताकत नहीं थी।
कुछ देर बाद दोनों आँगन में बैठकर चाय पीने लगे।
रामकिशन जी बोले,
“याद है शांति, पहले तुम कितनी जल्दी सब कर लेती थीं… और अब…”
शांति देवी हल्का मुस्कुराईं,
“अब उम्र हो गई है जी… शरीर साथ नहीं देता, लेकिन मन तो आज भी वैसा ही है।”
दोनों हल्का सा हंस पड़े… मगर उस हंसी में एक खालीपन था।
उनका बेटा विकास और बहू रीना उसी घर में रहते थे, लेकिन जैसे अलग दुनिया में।
बदलता व्यवहार...
दोपहर का समय था। घर में हल्की खामोशी पसरी हुई थी।
शांति देवी ने रसोई से आवाज लगाई,
“रीना बहू, खाना तैयार है… आ जाओ बेटा।”
कमरे से मोबाइल पर व्यस्त रीना की आवाज आई,
“मम्मी जी, आप लोग खा लीजिए… हम बाद में खा लेंगे।”
उसी समय विकास भी ऑफिस से आया, लेकिन बिना कुछ कहे सीधे अपने कमरे में चला गया।
शांति देवी ने एक पल के लिए दरवाज़े की ओर देखा, फिर चुपचाप थाली लगाने लगीं।
रामकिशन जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
“शांति… अब लगता है हम इनके लिए बोझ बन गए हैं…”
शांति देवी ने तुरंत बात संभालते हुए कहा,
“ऐसा क्यों सोचते हैं आप? बच्चे हैं… अपने कामों में व्यस्त रहते हैं।”
उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उनकी आंखों की नमी और चेहरे की उदासी सच्चाई बयां कर रही थी।
घर में सब कुछ था… बस अपनापन कहीं खो गया था।
बीमारी और उपेक्षा...
एक रात अचानक रामकिशन जी की तबीयत बिगड़ गई।
उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।
शांति देवी घबराकर बोलीं,
“विकास! जल्दी आओ बेटा… तुम्हारे पापा की हालत ठीक नहीं है!”
विकास चिढ़ते हुए बाहर आया,
“मम्मी इतनी रात को क्यों परेशान कर रही हो? सुबह डॉक्टर के पास ले जाना…”
“बेटा, अभी हालत बहुत खराब है…”
शांति देवी की आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन विकास ने अनसुना कर दिया।
आखिर पड़ोसी की मदद से शांति देवी रामकिशन जी को अस्पताल ले गईं।
डॉक्टर ने कहा,
“अगर थोड़ा और देर हो जाती, तो हालत गंभीर हो सकती थी।”
यह सुनकर शांति देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
अगले दिन विकास अस्पताल आया… मगर चेहरे पर चिंता कम और झुंझलाहट ज्यादा थी।
“मम्मी, इतना बड़ा मामला बना दिया आपने? थोड़ा इंतजार कर लेतीं…”
इस बार शांति देवी चुप नहीं रहीं।
उन्होंने पहली बार कड़क आवाज में कहा,
“अगर कल रात कुछ हो जाता ना… तो तुम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते!”
विकास चुप हो गया… लेकिन दिल से नहीं।
निर्णय...
कुछ दिन बाद, रामकिशन जी ठीक होकर घर लौट आए।
उस रात दोनों पति-पत्नी चुपचाप बैठे थे।
रामकिशन जी बोले,
“शांति… अब हमें खुद का सहारा खुद बनना होगा।”
“क्या मतलब?”
“मतलब… हम इस घर में रहते हुए भी अकेले हैं… तो क्यों ना कहीं और जाकर सुकून से रहें?”
शांति देवी की आंखें भर आईं,
“अपने ही घर को छोड़ दें?”
“घर ईंटों से नहीं बनता शांति… अपनापन से बनता है…”
कुछ दिनों बाद दोनों ने पास के एक छोटे से वृद्धाश्रम में रहने का फैसला कर लिया।
विकास और रीना को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा।
वृद्धाश्रम में पहली बार दोनों ने सुकून महसूस किया।
वहाँ लोग थे… बातें थीं… अपनापन था…
शांति देवी बोलीं,
“जीवन के इस मोड़ पर आकर समझ आया… कि सुकून सबसे बड़ी दौलत है…”
पछतावा...
एक दिन ऑफिस में काम करते हुए विकास को पता चला कि उसके एक करीबी दोस्त के माता-पिता का निधन हो गया है।
यह खबर सुनते ही उसके हाथ रुक गए। दिल में एक अजीब-सा डर समा गया।
पहली बार उसे एहसास हुआ—अगर उसने भी अपने माता-पिता को यूँ ही नजरअंदाज किया, तो कहीं वह भी उन्हें हमेशा के लिए खो न दे।
बिना एक पल गंवाए वह तुरंत ऑफिस से निकला और सीधे वृद्धाश्रम की ओर दौड़ पड़ा।
वहाँ पहुँचकर जैसे ही उसने अपने माँ-बाप को सामने देखा, उसकी आंखें भर आईं। कदम अपने आप धीमे पड़ गए।
वह उनके पास गया, और कांपती आवाज़ में बोला—
“मम्मी… पापा… मुझे माफ कर दो… मैं बहुत गलत था…”
इतना कहते ही वह उनके पैरों में गिर पड़ा।
पीछे खड़ी रीना की आंखों से भी आँसू बह रहे थे। उसे भी अपनी गलती का एहसास हो चुका था।
रामकिशन जी ने गहरी सांस ली और बोले,
“गलती इंसान से ही होती है बेटा… मगर उसे मान लेना ही सबसे बड़ी बात है…”
शांति देवी ने विकास के सिर पर हाथ रखा,
“अब हमें छोड़कर मत जाना…”
विकास फूट-फूट कर रो पड़ा।
सीख:
माता-पिता कभी बोझ नहीं होते।
वे उस मजबूत नींव की तरह होते हैं, जिस पर हमारी पूरी जिंदगी टिकी होती है।
जब वही नींव उम्र के साथ कमजोर होने लगती है,
तो उसे संभालना और सहारा देना हमारा फर्ज बन जाता है—
न कि उन्हें बोझ समझना।

Post a Comment