रिश्तों की असली गर्माहट
सुबह के करीब साढ़े छह बजे होंगे। बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन रसोई के अंदर चूल्हे की गर्मी से माहौल अलग ही था।
नीलम चुपचाप रसोई में खड़ी पराठे बेल रही थी। गैस पर चाय चढ़ी थी और दाल का कुकर भी सीटी देने ही वाला था।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
“इतनी सुबह कौन आ गया?” नीलम ने हाथ पोंछते हुए दरवाज़ा खोला।
बाहर सामने पड़ोस वाली कविता खड़ी थी।
“अरे नीलम, जरा चीनी खत्म हो गई थी… सोचा तुमसे ले लूं,” उसने मुस्कराते हुए कहा।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं,” नीलम तुरंत रसोई में गई और डिब्बा भरकर ले आई।
कविता ने अंदर झांक कर देखा—“अरे, तुम इतनी सुबह से काम में लगी हो? तुम्हारी बहू रिया कहाँ है?”
नीलम ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “सो रही है… देर से ऑफिस से आई थी कल।”
कविता ने भौंहें चढ़ाईं—
“वाह नीलम, बहू सो रही है और तुम यहाँ नौकरानी की तरह काम कर रही हो… सच में, तुमने खुद को बहुत हल्का कर लिया है।”
इतना कहकर वह चली गई।
दरवाज़ा बंद करते ही नीलम कुछ देर वहीं खड़ी रह गई।
उसके कानों में कविता की बात गूंजती रही—
“नौकरानी बना लिया…”
वह वापस रसोई में आई, लेकिन अब उसके हाथ वैसे नहीं चल रहे थे।
वह सोचने लगी—
“क्या सच में मैं गलत कर रही हूँ?”
पिछले 28 सालों से यही तो कर रही थी—
घर संभालना, बच्चों का ध्यान रखना, सबकी पसंद का खाना बनाना…
पहले पति और बच्चों के लिए,
और अब बेटे और बहू के लिए।
तभी पीछे से आवाज आई—
“नीलम, चाय बनी क्या?”
यह उसके पति राजेश थे।
“हाँ, अभी लाई,” उसने खुद को संभालते हुए कहा।
चाय देकर वह फिर काम में लग गई।
करीब 9 बजे बेटा अर्जुन उठा।
“माँ, एक कप चाय देना… और रिया के लिए भी बना देना,” उसने मोबाइल देखते हुए कहा।
नीलम ने एक पल के लिए सोचा—
“रिया खुद क्यों नहीं आई?”
लेकिन बिना कुछ कहे चाय बना दी।
थोड़ी देर बाद रिया भी बाहर आई—बाल खुले, चेहरा थका हुआ।
“मम्मी, सॉरी… आज फिर देर हो गई उठने में,” उसने धीरे से कहा।
नीलम कुछ कहती, उससे पहले अर्जुन बोल पड़ा—
“अरे माँ को क्या सॉरी बोल रही हो… वो तो वैसे ही सब संभाल लेती हैं।”
यह सुनकर नीलम के दिल में हल्की सी चुभन हुई।
“क्या मैं सच में सिर्फ संभालने के लिए ही रह गई हूँ?”
उस दिन रविवार था।
अर्जुन ने अचानक कहा—
“माँ, आज हम सब बाहर लंच पर चलते हैं!”
रिया खुश हो गई—“येस! मुझे बहुत दिनों से बाहर जाने का मन था।”
नीलम ने धीमे से कहा—
“मैंने तो घर पर खाना बना लिया है…”
“अरे माँ, वो बाद में खा लेंगे,” अर्जुन ने बात काट दी।
नीलम चुप हो गई।
पूरा दिन बाहर घूमने में निकल गया।
शाम को जब वे लौटे, तो किसी का मन खाना खाने का नहीं था।
नीलम ने चुपचाप सारा बना हुआ खाना फ्रिज में रख दिया।
उस रात उसे नींद नहीं आई।
“मेहनत की कोई कदर ही नहीं…”
कुछ दिनों बाद—
एक दिन नीलम मंदिर गई हुई थी।
वापस आई तो देखा—रिया सोफे पर लेटी हुई थी, चेहरा पीला पड़ा हुआ।
“रिया! क्या हुआ?” नीलम घबरा गई।
“मम्मी… थोड़ा चक्कर आ रहा था… इसलिए जल्दी आ गई ऑफिस से,” रिया ने कमजोर आवाज में कहा।
नीलम ने तुरंत पानी दिया, माथा छुआ—बुखार था।
वह बिना कुछ सोचे उसके पास बैठ गई।
दवा दी, सिर पर पट्टी रखी, और उसके बाल सहलाने लगी।
रिया की आंखें भर आईं—
“मम्मी… आप बैठिए ना मेरे पास…”
उस एक पल में नीलम का दिल पिघल गया।
उसे अपनी बेटी याद आ गई, जो शादी के बाद दूसरे शहर में रहती थी।
वह सोचने लगी—
“अगर मेरी बेटी बीमार होती… तो क्या मैं उसे अकेला छोड़ देती?”
नहीं।
कभी नहीं।
उस दिन नीलम ने रिया के लिए हल्की खिचड़ी बनाई।
अर्जुन ने कहा—
“माँ, आप इतना क्यों कर रही हो? वो ठीक है…”
नीलम ने शांत स्वर में कहा—
“बीमार इंसान को देखभाल की जरूरत होती है… चाहे वो कोई भी हो।”
रात को रिया ने थोड़ा सा खाया और बोली—
“मम्मी… आज मुझे अपने घर जैसा महसूस हो रहा है…”
नीलम चौंक गई—
“अपने घर जैसा?”
रिया मुस्कराई—
“हाँ… क्योंकि यहाँ कोई मुझे समझता है…”
उस रात नीलम बहुत देर तक सोचती रही।
उसे एहसास हुआ—
रिश्ते काम से नहीं,
अपनापन देने से बनते हैं।
अगले दिन सुबह—
नीलम हमेशा की तरह रसोई में थी।
रिया भी जल्दी उठकर आ गई।
“मम्मी, आज मैं आपकी मदद करूंगी,” उसने कहा।
नीलम मुस्कराई—
“क्यों? ऑफिस नहीं जाना?”
“जाऊंगी… लेकिन पहले आपका साथ देना है,” रिया ने प्यार से कहा।
नीलम ने उसे देखा—
अब उसमें बहू नहीं,
एक बेटी नजर आ रही थी।
उसी समय बाहर से कविता फिर आई।
“अरे नीलम, आज तो तुम्हारी बहू भी रसोई में हाथ बंटा रही है… क्या बात है!”
नीलम ने मुस्कराकर जवाब दिया—
“हाँ, क्योंकि मैंने उसे काम करने को मजबूर नहीं किया…
बल्कि घर जैसा महसूस कराया है।”
कविता चुप हो गई।
और नीलम के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
सीख:
रिश्ते अधिकार से नहीं, अपनापन और समझ से मजबूत होते हैं।
जहाँ प्यार होता है, वहाँ जिम्मेदारियाँ खुद-ब-खुद निभाई जाती हैं।

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