अपनों का स्थान

 

Daughter-in-law serving breakfast to elderly mother-in-law with love and respect at home


नेहा सोफे पर बैठी मोबाइल चला रही थी, पर उसकी नज़र बार-बार घड़ी पर जा रही थी।


“ओह! अभी तक खाना तैयार नहीं हुआ…” उसने झुंझलाकर कहा।


रसोई में उसकी सास, विमला जी, धीरे-धीरे काम कर रही थीं। उम्र का असर अब उनके हाथों की गति पर साफ दिखता था।


“नेहा बेटा, बस हो गया… थोड़ी देर और,” उन्होंने अंदर से आवाज़ दी।


नेहा ने हल्की-सी नाराज़गी में जवाब दिया, “मम्मी जी, अगर आपसे नहीं होता तो मुझे बता दिया कीजिए। मुझे ऑफिस भी देखना होता है और घर भी।”


विमला जी कुछ पल चुप रहीं।


उनकी आँखों में हल्की नमी आ गई, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।


शाम को राहुल ऑफिस से लौटा।


जैसे ही वह अंदर आया, नेहा शुरू हो गई—


“देखो राहुल, अब ये रोज़-रोज़ नहीं चलेगा। मम्मी जी से काम होता नहीं, और पूरा घर मुझ पर आ जाता है।”


राहुल ने शांत स्वर में कहा, “नेहा, मम्मी अब पहले जैसी नहीं रहीं। थोड़ा समझना होगा।”


“समझना तो मुझे ही पड़ता है हमेशा!” नेहा ने तीखे स्वर में कहा।


राहुल चुप हो गया।


उसने माँ की ओर देखा—वो चुपचाप एक कोने में बैठी थीं, जैसे घर में होते हुए भी कहीं दूर हों।



अगले दिन नेहा की सहेली पूजा घर आई।


दोनों बातें कर रही थीं कि तभी विमला जी पानी लेकर आईं।


पूजा ने मुस्कुराकर कहा, “नमस्ते आंटी।”


विमला जी ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया और वापस चली गईं।


जैसे ही वो गईं, नेहा ने धीमे से कहा, “बस यार, अब तो लगता है घर में एक जिम्मेदारी और बढ़ गई है।”


पूजा चौंक गई।


“जिम्मेदारी? ये क्या बोल रही हो नेहा?”


“अरे, मतलब… समझ ना। हर चीज़ में ध्यान रखना पड़ता है।”


पूजा कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली—


“नेहा, एक बात पूछूँ? अगर यही हाल तुम्हारे मम्मी-पापा के साथ हो, तो?”


नेहा रुक गई।


“मतलब?”


“एक पल के लिए खुद को उनकी जगह रखकर देखो… अगर कल तुम्हारे अपने माँ-बाप तुम्हारे साथ हों, और कोई उन्हें ‘जिम्मेदारी’ कहे… क्या तुम उसे सह पाओगी?”


नेहा ने नजरें फेर लीं।


“तुम बात को बढ़ा रही हो…”


पूजा ने गंभीर होकर कहा, “नहीं नेहा, मैं बस सच कह रही हूँ। हम सब अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमें अपने ही लोग बोझ लगने लगे हैं।”


नेहा के पास कोई जवाब नहीं था।



कुछ दिन बाद नेहा को ऑफिस के काम से बाहर जाना पड़ा।


तीन दिन के लिए।


घर में राहुल और विमला जी थे।


पहले दिन ही राहुल ने महसूस किया कि माँ बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही हैं।


“क्या हुआ मम्मी?” उसने पूछा।


“कुछ नहीं… बस आदत है ना, नेहा के इधर-उधर घूमने की…”


राहुल मुस्कुरा दिया।


दूसरे दिन उसने देखा कि माँ ने खुद से ज्यादा काम करने की कोशिश की, लेकिन थक गईं।


राहुल ने उनके पास बैठकर कहा, “मम्मी, आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है। आप बस आराम किया कीजिए।”


विमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “जब तक हाथ-पैर चलते हैं, अच्छा लगता है बेटा… पर अब लगता है मैं सच में धीमी हो गई हूँ।”


उनकी आवाज़ में हल्का दर्द था।



तीसरे दिन नेहा वापस आई।


घर में कदम रखते ही उसने देखा—सब कुछ सलीके से रखा हुआ था।


राहुल किचन में था और विमला जी बच्चों के साथ हँस रही थीं।


नेहा थोड़ी हैरान हुई।


“सब ठीक है?” उसने पूछा।


राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, बिल्कुल।”


उस रात खाने के बाद राहुल ने धीरे से कहा—


“नेहा, इन तीन दिनों में मैंने एक चीज़ महसूस की।”


“क्या?”


“मम्मी को काम नहीं चाहिए… उन्हें बस साथ चाहिए।”


नेहा चुप रही।


राहुल आगे बोला, “हम सोचते हैं कि हम उनके लिए बहुत कुछ कर रहे हैं, लेकिन असल में उन्हें सिर्फ अपनापन चाहिए होता है।”


नेहा की आँखें झुक गईं।


उसे अपने शब्द याद आए— ‘एक जिम्मेदारी और बढ़ गई है…’


अगली सुबह कुछ बदला हुआ था।


नेहा जल्दी उठी।


उसने खुद रसोई संभाली।


फिर वह विमला जी के पास गई और बोली—


“मम्मी जी, आज आप मेरे साथ बैठकर नाश्ता कीजिए।”


विमला जी ने आश्चर्य से पूछा, “आज क्या खास है?”


नेहा हल्के से मुस्कुराई, “बस… अब समझ आ रहा है कि घर में सबसे खास कौन है।”


विमला जी की आँखें भर आईं।



कुछ दिनों बाद पूजा फिर आई।


इस बार उसने देखा—नेहा और विमला जी साथ बैठकर हँस रही थीं।


पूजा मुस्कुराई और धीरे से बोली, “लगता है घर का माहौल बदल गया है।”


नेहा ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं… बस नजरिया बदल गया है।”



समय बीतता गया।


घर वही था, लोग वही थे—


पर अब वहाँ एक फर्क था।


अब वहाँ “जिम्मेदारी” नहीं,


“अपनापन” रहता था।



संदेश:


रिश्ते बोझ नहीं होते,

हमारी सोच उन्हें बोझ बना देती है।


माँ-बाप घर में हों तो जगह कम नहीं होती,

बल्कि घर बड़ा हो जाता है।


क्योंकि जहाँ अपने होते हैं,

वहीं असली “घर” होता है।



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