मां का सहारा
उस दिन न जाने क्यों मन बहुत बेचैन था…
रात के करीब साढ़े दस बजे होंगे। सारे काम निपटाकर जैसे ही मैं बिस्तर पर लेटी, शरीर तो थक कर चूर हो चुका था, लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी। सिर में हल्का दर्द था और पूरे दिन की भागदौड़ जैसे अब महसूस हो रही थी।
तभी मेरे माथे पर किसी के छोटे-छोटे हाथों का स्पर्श हुआ।
“मम्मा… दर्द हो रहा है क्या?”
मैंने आंखें खोलीं—मेरा आठ साल का बेटा, चिंटू, मेरे सिर के पास बैठा था।
“नहीं बेटा, बस थोड़ी थकान है… तुम सो जाओ,” मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
लेकिन वो मानने वाला कहां था…
धीरे-धीरे उसने अपने नन्हे हाथों से मेरा सिर दबाना शुरू कर दिया।
“आप हमेशा कहती हो ना… सिर दबाने से आराम मिलता है,” उसने मासूमियत से कहा।
उसकी ये बात सुनकर मेरी आंखें नम हो गईं। एक छोटा-सा बच्चा… जो खुद ठीक से अपने जूते तक नहीं पहन पाता, आज मेरी तकलीफ समझ रहा था।
ऐसा पहली बार नहीं था…
कुछ दिन पहले की बात है।
मैं किचन में खड़ी लगातार काम कर रही थी। सुबह से लेकर दोपहर और फिर शाम… जैसे काम खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
तभी चिंटू आया और बोला— “मम्मा, आप बैठ जाओ ना… मैं पानी ले आता हूं।”
मैं हंस पड़ी—“तुम क्या करोगे?”
लेकिन वो सच में भागकर गया और मेरे लिए पानी लेकर आया।
“आप भी ना… खुद का ध्यान ही नहीं रखती,” उसने बिल्कुल अपने पापा की तरह कहा।
उसकी ये बात सुनकर मुझे हंसी भी आई और दिल में एक सुकून भी मिला।
रविवार का दिन था…
सोचा था थोड़ा आराम करूंगी, लेकिन आदत से मजबूर… मैं फिर से काम में लग गई।
तभी चिंटू थोड़ा नाराज़ होकर बोला,
“मम्मा, ये आपका छुट्टी का दिन है या फिर काम करने का?”
मैंने कहा—“बस थोड़ा-सा काम है बेटा…”
वो मुंह फुलाकर बोला— “आपको आराम करना चाहिए… मैं नहीं खेलूंगा आपसे अगर आप ऐसे ही काम करती रही तो!”
उसकी ये बात सुनकर मैं सच में रुक गई।
उस दिन पहली बार मैंने महसूस किया कि कोई है… जो चाहता है कि मैं भी अपने लिए जीऊं।
कुछ दिनों बाद…
मुझे हल्का बुखार हो गया था। शरीर टूट रहा था, उठने की भी हिम्मत नहीं थी।
मैं चुपचाप लेटी हुई थी कि तभी दरवाजा धीरे से खुला।
चिंटू अंदर आया… हाथ में एक ट्रे थी।
ट्रे में क्या था?
एक कप चाय… जो शायद ठीक से बनी भी नहीं थी, और दो बिस्किट।
“मैंने खुद बनाई है…” उसने गर्व से कहा।
मैंने जैसे ही वो चाय पी… उसका स्वाद कैसा था, ये मायने ही नहीं रखता था।
उसमें जो प्यार था… वो किसी भी स्वाद से ज्यादा मीठा था।
मेरी आंखों से आंसू निकल आए।
मैंने उसे गले लगा लिया।
उस दिन दिल में एक ही बात आई—
लोग क्यों कहते हैं कि बेटियां ही मां-बाप का ज्यादा ख्याल रखती हैं?
क्या एक बेटा अपनी मां को समझ नहीं सकता?
क्या एक बेटा प्यार नहीं कर सकता?
ये सब बस समाज की बनाई हुई बातें हैं…
असल में तो हर बच्चा—चाहे बेटा हो या बेटी—अपने मां-बाप का ही अंश होता है।
फर्क सिर्फ परवरिश का होता है…
अगर हम बेटों को बचपन से सिखाएं कि रोना कमजोरी नहीं है… दूसरों का दर्द समझना जरूरी है… औरतों का सम्मान करना जरूरी है…
तो वो भी उतने ही संवेदनशील बनेंगे, जितनी बेटियां होती हैं।
बच्चे वैसे ही बनते हैं, जैसा हम उन्हें बनाते हैं।
उस रात…
जब चिंटू मेरे पास लेटकर बोला— “मम्मा, जब आप बीमार होती हो ना… मुझे अच्छा नहीं लगता…”
मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।
उस पल मुझे एहसास हुआ—
मां का सबसे बड़ा सहारा… उसका बच्चा ही होता है।
चाहे वो बेटा हो… या बेटी।
और सच कहूं…
प्यार का कोई लिंग नहीं होता।

Post a Comment