जिसे बोझ समझा, वही सहारा बन गया

Emotional moment in hospital where elderly woman comforts sick younger woman with care and love


सर्दियों की हल्की धूप आँगन में बिखरी हुई थी। हवा में ठंडक तो थी, लेकिन धूप में बैठने का अपना ही मज़ा था। सीमा ने जल्दी-जल्दी घर का काम निपटाया और सोचा—“थोड़ी देर बैठकर आराम कर लूं, फिर बच्चों के आने का समय हो जाएगा।”


वह कुर्सी लेकर आँगन में बैठ ही रही थी कि तभी फोन बज उठा।


“हैलो… सीमा सुनो,” पति अमित की आवाज़ आई, “मौसी जी आ रही हैं गाँव से… बस एक घंटे में पहुंच जाएंगी।”


सीमा का चेहरा तुरंत उतर गया—

“क्या? अभी? पहले क्यों नहीं बताया? मैं क्या करूं अब? घर भी ठीक से सेट नहीं है, खाना भी नहीं बना!”


अमित ने थोड़ा समझाते हुए कहा—

“अरे यार, उनका अचानक प्रोग्राम बन गया… और तुम तो जानती हो, वो मुझे अपने बेटे जैसा मानती हैं।”


सीमा ने अनमने मन से कहा—

“ठीक है… देखती हूं।”


फोन रखते ही उसका सारा मूड खराब हो गया।

“जब देखो तब चले आते हैं… कोई टाइम होता है क्या आने का?” वह बड़बड़ाने लगी।


थोड़ी देर बाद दरवाज़े की घंटी बजी। सामने मौसी जी खड़ी थीं—सादा सा सूट, चेहरे पर अपनापन और हाथों में गाँव से लाया हुआ सामान।


“कैसी हो बहू?” उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।


सीमा ने भी मुस्कान का दिखावा किया—

“आइए मौसी जी…”


पानी देकर वह सीधे किचन में चली गई। अंदर जाकर वह फिर बड़बड़ाने लगी—

“अब अचानक आकर बैठ जाएँगे… सारा काम मेरे ऊपर… जैसे मैं फ्री बैठी हूं!”


मौसी जी पानी पीकर चुपचाप बैठी रहीं। उन्होंने शायद सीमा की आवाज़ सुन ली थी, लेकिन कुछ कहा नहीं।


कुछ देर बाद अमित भी घर आ गया। माहौल थोड़ा अजीब सा था।


मौसी जी ने धीरे से कहा—

“बेटा, हमें अभी निकलना होगा… एक जरूरी काम याद आ गया।”


अमित ने चौंककर पूछा—

“अरे! अभी? खाना तो खाकर जाइए…”


“नहीं बेटा… फिर कभी,” इतना कहकर वे उठ गईं।


सीमा को अंदर ही अंदर कुछ अजीब सा लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।



समय बीतता गया…


करीब एक साल बाद…


एक दिन अचानक सीमा की तबीयत बहुत खराब हो गई। तेज़ बुखार और कमजोरी के कारण उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। अमित ऑफिस में था, बच्चों को भी स्कूल से आना था—घर में कोई मदद करने वाला नहीं था।


सीमा अस्पताल के बेड पर लेटी हुई थी और अमित इधर-उधर भागदौड़ कर रहा था।


तभी पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—

“अमित बेटा…”


दोनों ने मुड़कर देखा—मौसी जी खड़ी थीं।


अमित ने हैरानी से पूछा—

“अरे मौसी जी! आप यहां?”


उन्होंने शांत स्वर में कहा—

“पास के गाँव में आई थी… पता चला सीमा की तबीयत खराब है, तो देखने चली आई।”


सीमा की आँखें भर आईं। उसे तुरंत अपनी पुरानी बात याद आ गई।


मौसी जी बिना कुछ कहे उसके पास बैठ गईं, उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं—

“घबराओ मत… सब ठीक हो जाएगा।”


उस दिन से मौसी जी वहीं रुक गईं।

उन्होंने बच्चों का ध्यान रखा, घर संभाला, समय पर खाना बनाया और सीमा की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।


सीमा सब कुछ देख रही थी… और हर पल उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था।



एक रात…


सीमा ने धीरे से मौसी जी का हाथ पकड़ा और बोली—

“मौसी जी… मुझे माफ कर दीजिए…”


मौसी जी ने हैरानी से पूछा—

“अरे, किस बात के लिए?”


सीमा रोते हुए बोली—

“उस दिन… जब आप हमारे घर आई थीं… मैंने आपका दिल दुखाया था… मैं आपको बोझ समझ रही थी…”


कुछ पल के लिए चुप्पी छा गई।


फिर मौसी जी ने मुस्कुराते हुए कहा—

“बेटी… रिश्ते बोझ नहीं होते… बस कभी-कभी समझने में देर हो जाती है।”


सीमा ने सिर झुका लिया—

“मैंने आपको अपनापन नहीं दिया… और आज आप मेरे लिए इतना सब कर रही हैं…”


मौसी जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—

“अगर अपने ही अपने काम न आएं, तो फिर रिश्तों का मतलब क्या रह जाता है?”



कुछ दिन बाद…


सीमा पूरी तरह ठीक हो गई। इस बार उसने खुद मौसी जी से कहा—

“अब आप कहीं नहीं जाएंगी… ये घर आपका भी है।”


मौसी जी की आँखों में चमक आ गई।



सीख:


कभी-कभी हम अपने ही लोगों को बोझ समझ लेते हैं,

लेकिन वही लोग मुश्किल समय में सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।


रिश्ते निभाने से मजबूत होते हैं…

और समझने से खूबसूरत।




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