रिश्तों में हक और सम्मान

 

Emotional Indian family scene where a young woman receives support from her parents during a family conflict at home


खिड़की से आती हल्की हवा पर्दों को धीरे-धीरे हिला रही थी। शाम का समय था और घर में एक अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।


नेहा सोफे के कोने पर चुपचाप बैठी थी। उसके हाथ में उसकी 2 साल की बेटी अन्वी का छोटा सा खिलौना था… जिसे वह बार-बार घुमा रही थी, जैसे मन को किसी तरह संभाल रही हो।


रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी—तेज, थोड़ी गुस्से भरी।


“नेहा!”

सास कमला जी की आवाज़ आई।


नेहा तुरंत उठी—

“जी मम्मी जी…”


“ये क्या सुना मैंने? तुमने बिना पूछे अन्वी का एडमिशन प्ले स्कूल में करा दिया?”


नेहा ने धीरे से कहा—

“मम्मी जी… बस पास में अच्छा स्कूल था… मैंने सोचा—”


“सोचा?!” कमला जी ने बात काट दी,

“अब तुम सोचोगी? इस घर में कोई भी फैसला लेने से पहले मुझसे पूछना पड़ता है!”


इतने में रोहन ऑफिस से आया। माहौल देखकर वह समझ गया कि फिर वही बात है।


“क्या हुआ?” उसने पूछा।


कमला जी ने गुस्से में कहा—

“अपनी बीवी से पूछो… अब ये खुद ही फैसले लेने लगी है!”


रोहन ने नेहा की तरफ देखा—

“नेहा, मम्मी से पूछ लेती… क्या जरूरत थी जल्दी करने की?”


नेहा की आंखें भर आईं—

“रोहन… ये हमारी बेटी है… उसके लिए एक छोटा सा फैसला भी हम नहीं ले सकते?”


“बात छोटी या बड़ी की नहीं है,” रोहन थोड़ा सख्त होते हुए बोला,

“घर के नियम होते हैं।”


नेहा चुप हो गई… लेकिन आज उसके अंदर कुछ टूट भी रहा था और कुछ बन भी रहा था।



अगले दिन सुबह…


नेहा ने अपने माता-पिता को फोन किया और शाम तक वे आ गए।


कमला जी ने आते ही कहना शुरू किया—

“देखिए जी, अपनी बेटी को समझाइए… घर में रहने के तरीके होते हैं…”


नेहा की माँ, सुशीला जी, पहले शांत रहीं… फिर धीरे से बोलीं—


“बहन जी, हम समझाने आए हैं… लेकिन पहले पूरी बात समझना भी जरूरी है।”


कमला जी ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा—

“और क्या समझना है? बहू मनमानी कर रही है!”


तभी नेहा के पापा बोले—


“बहन जी, अगर अपनी बच्ची के लिए स्कूल चुनना मनमानी है… तो फिर जिम्मेदारी क्या है?”


कमला जी चुप हो गईं, लेकिन चेहरा अब भी सख्त था।


सुशीला जी ने आगे कहा—


“आज तक हमने हमेशा अपनी बेटी को ही समझाया… हर बार यही कहा कि बड़ों से पूछकर काम करो… लेकिन क्या कभी आपने अपने बेटे को समझाया कि पत्नी की बात भी सुना करे?”


रोहन नीचे देखने लगा।


“हम जानते हैं,” सुशीला जी ने धीरे से कहा,

“घर चलाने के लिए अनुशासन जरूरी है… लेकिन हर चीज़ पर रोक-टोक… वो भी छोटी-छोटी बातों पर… ये प्यार नहीं, डर बन जाता है।”


कमला जी के चेहरे पर हल्का बदलाव आया।


“आप ही बताइए,” नेहा के पापा बोले,

“अगर आपकी बेटी होती… और उसे हर बात के लिए इजाज़त लेनी पड़ती… तो क्या आप खुश होतीं?”


कमला जी कुछ नहीं बोलीं।



थोड़ी देर की खामोशी के बाद…


कमला जी धीरे-धीरे नेहा के पास आईं।


“नेहा…” उनकी आवाज़ अब पहले जैसी सख्त नहीं थी,

“मुझे डर था… कि कहीं तुम भी उन बहुओं जैसी न बन जाओ जो सास को महत्व नहीं देतीं… इसलिए मैंने सब कुछ अपने हाथ में रखना चाहा…”


नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे—


“मम्मी जी… मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मुझे भी इस घर का हिस्सा समझा जाए… कोई बाहरी नहीं…”


कमला जी ने उसका हाथ पकड़ लिया—


“माफ कर दो बेटा… मैं समझ नहीं पाई…”


रोहन भी आगे आया—


“नेहा… सॉरी… मुझे तुम्हारा साथ देना चाहिए था…”



उस दिन कोई घर नहीं छोड़ा गया…


कोई रिश्ता नहीं टूटा…


बल्कि पहली बार उस घर में समझ आई।


कमला जी ने मुस्कुराकर कहा—


“अब से फैसले मिलकर होंगे… और हां, कल मुझे भी उस स्कूल में लेकर चलना… मैं भी देखना चाहती हूं अपनी पोती का स्कूल।”


नेहा हल्के से मुस्कुरा दी…


और उस मुस्कान में अब दर्द नहीं…

अपनापन था।



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