जब बहू ने चुप रहना छोड़ दिया

 

Tired Indian mother cooking while holding a sick baby as family members ignore her efforts at home


दरवाज़े के पास रखी पानी की बोतल अचानक गिरकर ज़मीन पर लुढ़क गई, लेकिन उसे उठाने वाला कोई नहीं था।


निशा किचन में खड़ी थी। एक हाथ से सब्ज़ी चला रही थी और दूसरे हाथ से अपने छह महीने के बेटे विहान को गोद में संभाले हुए थी। बच्चे का शरीर तप रहा था और वह बार-बार रोए जा रहा था। रात भर वह सो नहीं पाई थी, आँखें लाल थीं और चेहरा थकान से बुझा हुआ।


उधर हॉल में उसकी सास, सावित्री जी, आराम से सोफे पर बैठी टीवी देख रही थीं। साथ में उनकी बेटी रचना भी मोबाइल में लगी हुई थी।


सावित्री जी ने आवाज़ लगाई— “निशा… खाना तैयार हुआ कि नहीं? कब तक इंतज़ार कराएँगी?”


निशा ने धीरे से जवाब दिया— “मम्मी जी, बस पाँच मिनट… विहान को थोड़ा संभाल लूँ…”


रचना तुरंत बोल पड़ी— “भाभी, हर बार यही बहाना… कभी बच्चा, कभी थकान… घर के काम भी कोई चीज़ होती है।”


निशा ने कुछ नहीं कहा। उसने जल्दी-जल्दी रोटी सेंकी, सब्ज़ी उतारी और थाली लगाकर टेबल पर रख दी।


जैसे ही वह थाली लेकर हॉल में आई, सावित्री जी ने ताना मारा— “अब आई महारानी… हमें तो लगा आज भूखे ही सोना पड़ेगा।”


निशा का दिल भर आया, लेकिन उसने चुपचाप थाली रख दी।


तभी विहान ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। निशा उसे लेकर कमरे में जाने लगी तो रचना बोली— “पहले मुझे खाना परोस दो भाभी, फिर जाना।”


निशा ने पहली बार थोड़ा ठहरकर उसकी तरफ देखा— “रचना, खाना सामने रखा है… तुम खुद ले सकती हो।”


रचना नाराज़ होकर बोली— “मैं क्यों लूँ? ये तुम्हारा काम है।”


अब निशा के सब्र का बाँध टूट गया— “और बच्चा सिर्फ मेरा है? रात भर मैं जागूँ, दिन भर मैं काम करूँ… और तुम लोग सिर्फ ऑर्डर करो?”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


सावित्री जी गुस्से में बोलीं— “बहू होकर हमसे ऐसे बात करती हो? हमने भी बच्चे पाले हैं…”


निशा की आँखों में आँसू आ गए— “हाँ मम्मी जी, आपने बच्चे पाले होंगे… लेकिन क्या अकेले पाले थे?”


इतना कहकर वह कमरे में चली गई।


उसके जाने के बाद भी हॉल में खामोशी बनी रही।


कुछ देर बाद सावित्री जी ने बेटे राहुल को फोन लगाया— “तुम्हारी बीवी हाथ से निकल रही है… काम भी नहीं करती और जवाब भी देती है।”


राहुल ऑफिस में था। पहले से ही काम का दबाव था। उसने बस इतना कहा— “मैं घर आकर बात करता हूँ।”


पूरा दिन निकल गया।


शाम को जब राहुल घर पहुँचा, तो उसने देखा— निशा कमरे में बैठी है, बच्चे को गोद में लिए… और हॉल में माँ और बहन चुपचाप बैठी हैं।


राहुल ने पहले निशा से बात की।


इस बार निशा चुप नहीं रही। उसने सारी बातें साफ-साफ बता दीं— रात भर जागना, बच्चे की तबीयत, घर का सारा काम… और ऊपर से ताने।


राहुल कुछ देर चुप रहा।


फिर वह बाहर आया।


माँ और बहन को लगा कि अब राहुल निशा को डाँटेगा।


लेकिन राहुल ने बहुत शांत आवाज़ में कहा— “माँ, अगर निशा बीमार पड़ जाए तो क्या होगा?”


सावित्री जी चौंक गईं— “क्या मतलब?”


राहुल बोला— “मतलब ये कि जो काम वह अकेले कर रही है, क्या हम कर पाएँगे?”


रचना बोली— “भैया, हम भी कर लेंगे…”


राहुल हल्का सा मुस्कुराया— “अभी क्यों नहीं कर रहे?”


दोनों चुप हो गईं।


राहुल ने आगे कहा— “घर किसी एक का नहीं होता… और जिम्मेदारी भी किसी एक की नहीं होती।”


फिर उसने कहा— “आज से काम बँटेगा… माँ, आप विहान को संभालेंगी… रचना, तुम किचन में मदद करोगी… और निशा थोड़ा आराम करेगी।”


रचना ने तुरंत कहा— “मैं क्यों करूँ?”


राहुल ने सीधे कहा— “क्योंकि कल तुम्हें भी अपने घर जाना है… और वहाँ कोई तुम्हारे लिए सब कुछ नहीं करेगा।”


यह सुनकर रचना चुप हो गई।


उस रात पहली बार ऐसा हुआ— राहुल खुद किचन में गया… रचना ने चाय बनाई… और सावित्री जी ने बच्चे को गोद में लिया।


निशा दरवाज़े के पास खड़ी यह सब देख रही थी।


उसके चेहरे पर राहत थी… और आँखों में सुकून।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।


अगले दिन असली बदलाव शुरू हुआ।


सुबह रचना खुद किचन में गई और बोली— “भाभी, आज नाश्ता मैं बनाऊँगी… आप विहान को संभालो।”


निशा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा— “सच?”


रचना मुस्कुरा दी— “हाँ… थोड़ा सीखना भी है।”


उधर सावित्री जी भी धीरे-धीरे बदलने लगीं।


अब वह पड़ोसन से शिकायत करने के बजाय कहतीं— “मेरी बहू बहुत मेहनती है… बस हम ही समझ नहीं पाए थे।”


एक दिन उन्होंने खुद निशा से कहा— “बहू, हमें माफ कर दो… हमने तुम्हारी परेशानी समझी ही नहीं।”


निशा की आँखें भर आईं— “मम्मी जी, बस आप साथ दे दीजिए… मुझे और कुछ नहीं चाहिए।”


धीरे-धीरे घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।


अब कोई किसी पर हुक्म नहीं चलाता था… सब मिलकर काम करते थे…


और सबसे बड़ी बात— अब किसी को अकेलापन महसूस नहीं होता था।


विहान भी अब कम रोता था— क्योंकि अब उसे सिर्फ माँ नहीं… पूरा परिवार संभाल रहा था।


और सच यही है—


घर तब तक अधूरा रहता है… जब तक उसमें सिर्फ रिश्ते हों…


लेकिन जब रिश्तों में समझ, सहयोग और अपनापन जुड़ जाए— तभी वह सच में एक “घर” बनता है।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.