डर के उस पार

 

Emotional Indian bride hugging her loving mother-in-law in a traditional kitchen during first cooking ritual, warm family bonding moment


अचानक जोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई और प्रिया की आँख खुल गई।


उसने घबराकर उठते हुए घड़ी देखी—आठ बजकर दस मिनट।


उसका दिल जैसे धक से रह गया।


“हे भगवान! आज तो… आज तो मुझे सबसे पहले उठना था… मम्मी जी ने खुद कहा था कि आज ‘पहली रसोई’ की रस्म है… और मैं… मैं तो अभी तक सो रही हूँ…!”


उसके हाथ काँपने लगे।


“अब क्या होगा…? सब क्या सोचेंगे…? कहीं मम्मी जी नाराज़ न हो जाएँ…? लोग कहते हैं ना… सास अगर पहली बार में ही नाराज़ हो जाए तो जिंदगी भर ताने सुनने पड़ते हैं…”


उसकी आँखों में आँसू भरने लगे।


दादी की आवाज़ जैसे कानों में गूंजने लगी—


“बिटिया… ससुराल बहुत संभलकर रहना… वहाँ अपनी कोई गलती मत होने देना… छोटी-सी बात भी बड़ी बना दी जाती है…”


माँ की भी बातें याद आईं—


“हर किसी को खुश रखना… किसी को शिकायत का मौका मत देना…”


प्रिया का दिल और घबराने लगा।


वह जल्दी-जल्दी उठी। हाथ-मुँह धोते हुए भी उसका ध्यान बार-बार उसी बात पर जा रहा था—“मैं लेट हो गई…”


जल्दी में उसने साड़ी पहनी, लेकिन पल्लू बार-बार फिसल रहा था। जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला।


तभी अचानक आईने पर नजर पड़ी—


“अरे! ये क्या… न बिंदी… न सिंदूर…!”


उसने जल्दी से ड्रॉअर खोला, बिंदी लगाई… फिर सिंदूर ढूंढने लगी… लेकिन नहीं मिला।


घबराहट में उसने लिपस्टिक से ही हल्की-सी मांग भर ली।


“बस… अब ठीक लग रही हूँ… शायद…” उसने खुद को दिलासा दिया।


लेकिन दिल अभी भी काँप रहा था।


धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए वह कमरे से बाहर निकली। हर कदम जैसे भारी हो गया था।


जैसे ही वह रसोई के पास पहुँची, अंदर से बर्तनों की आवाज़ और हल्की-सी हँसी सुनाई दी।


उसका दिल और बैठ गया।


“सब लोग पहले से काम कर रहे हैं… और मैं…!”


उसने हिम्मत जुटाई और अंदर कदम रखा।


अंदर का नज़ारा देखकर वह रुक गई।


सासू माँ और बड़ी ननद दोनों मिलकर काम कर रही थीं। गैस पर हलवा बन रहा था, और पूरियाँ तल रही थीं।


सासू माँ ने उसे देखा।


प्रिया का गला सूख गया।


“वो… मम्मी जी… मैं… सॉरी… मेरी आँख… देर से खुली…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।


कुछ पल के लिए सन्नाटा सा छा गया।


प्रिया ने सोचा—अब डाँट पड़ेगी…


लेकिन अगले ही पल—


सासू माँ मुस्कुराईं।


“अरे! आ गई तुम? आओ बेटा…”


प्रिया ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।


“ये… गुस्सा नहीं हैं…?” उसका मन बोला।


“नींद ठीक से आई?” सासू माँ ने पूछा।


प्रिया ने धीरे से सिर हिलाया—“जी…”


“बस फिर ठीक है,” उन्होंने सहजता से कहा।


प्रिया की आँखें फैल गईं।


“लेकिन… मम्मी जी… वो… पहली रसोई… मुझे बनानी थी ना…” उसने डरते हुए कहा।


सासू माँ ने हलवे की कड़ाही उसकी तरफ बढ़ाई—


“हाँ, तो ये लो… इसे छू लो…”


“छू लूँ…?” प्रिया समझ नहीं पाई।


“हाँ… रस्म पूरी हो जाएगी,” सासू माँ ने प्यार से कहा।


प्रिया की आँखों में आँसू आ गए।


“लेकिन… मैंने तो कुछ किया ही नहीं…”


सासू माँ उसके पास आईं। उसके कंधे पर हाथ रखा और बोलीं—


“बेटा… रस्में निभाने के लिए होती हैं, डराने के लिए नहीं।”


प्रिया चुप हो गई।


“और काम… वो तो जिंदगी भर करना है… अभी तो तुम इस घर में आई हो… तुम्हें अपनापन महसूस होना चाहिए, डर नहीं…”


इतना सुनते ही प्रिया का दिल भर आया।


उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वही ‘सास’… जिनसे वह इतना डर रही थी… इतनी प्यारी हो सकती हैं।


तभी ननद हँसते हुए बोली—


“भाभी, अगर आप ही सब काम कर लेंगी तो हमें क्या मिलेगा?”


थोड़ा माहौल हल्का हुआ।


प्रिया हल्का सा मुस्कुराई।


लेकिन अंदर का डर अभी पूरी तरह गया नहीं था।


दिन बीतता गया।


प्रिया हर काम बहुत सावधानी से करती… हर बात सोच-समझकर बोलती… कहीं कुछ गलत न हो जाए।


एक दिन…


घर में मेहमान आने वाले थे।


सासू माँ ने कहा—“प्रिया, आज चाय-नाश्ते की जिम्मेदारी तुम्हारी है।”


प्रिया घबरा गई।


“अगर कुछ गलत हो गया तो…?”


लेकिन उसने हिम्मत की।


उसने पूरी मेहनत से सब तैयार किया।


जब मेहमान आए… सबने उसकी बनाई चीज़ों की तारीफ की।


“बहू बहुत अच्छा बनाती है,” किसी ने कहा।


प्रिया ने धीरे से सासू माँ की तरफ देखा।


सासू माँ मुस्कुरा रही थीं… आँखों में गर्व था।


उस पल… प्रिया का आत्मविश्वास बढ़ गया।


धीरे-धीरे दिन गुजरते गए।


अब प्रिया पहले जैसी डरी हुई लड़की नहीं रही।


वह खुलकर हँसने लगी… बातें करने लगी… घर को अपना मानने लगी।


एक रात…


वह छत पर खड़ी थी।


सासू माँ उसके पास आईं।


“क्या सोच रही हो?” उन्होंने पूछा।


प्रिया मुस्कुराई—


“बस… ये कि मैं कितनी गलत थी…”


“किस बारे में?” सासू माँ ने पूछा।


प्रिया ने उनकी तरफ देखा—


“मैं आपसे डरती थी… बहुत…”


सासू माँ हल्का सा हँसीं—


“और अब?”


प्रिया की आँखें भर आईं।


वह धीरे से बोली—


“अब… मैं आपको माँ मानती हूँ…”


इतना सुनते ही सासू माँ ने उसे गले लगा लिया।


“बस… यही रिश्ता चाहिए था मुझे…” उन्होंने कहा।


उस रात…


प्रिया को पहली बार सच में लगा—


ये उसका ससुराल नहीं… उसका अपना घर है ❤️





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