अपनों की खुशी में ही असली खुशी होती है
घर में आज एक अजीब-सी मिठास घुली हुई थी…
नया-नया विवाह हुआ था और हर कोने में जैसे खुशियों की हल्की गूंज बाकी थी। दीवारों पर सजी झालरें अभी भी चमक रही थीं और आँगन में रखी कुर्सियाँ मानो बीते दिनों की रौनक को संभाले बैठी थीं।
राजीव बाबू चुपचाप बरामदे में बैठे थे।
हाथ में पुरानी डायरी थी, लेकिन नज़रें कहीं दूर खोई हुई थीं।
पत्नी कमला देवी रसोई से उन्हें देख रही थीं।
“क्या सोच रहे हैं आप?” उन्होंने पास आकर पूछा।
राजीव बाबू हल्का मुस्कुराए—
“बस… सोच रहा हूँ, कब बच्चे इतने बड़े हो गए कि अब घर में बहू आ गई…”
कमला देवी ने धीमे से कहा—
“समय सच में उड़ जाता है…”
उनका बेटा अंशुल, जो अब एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर था, कुछ ही दिन पहले ही विवाह करके अपनी पत्नी नेहा को घर लाया था।
नेहा एक साधारण परिवार की लड़की थी—संस्कारों से भरी, लेकिन सोच में बहुत गहरी।
विवाह के बाद के कुछ दिन हंसी-खुशी में बीते।
घर में मेहमानों का आना-जाना लगा रहा, और फिर धीरे-धीरे सब अपने-अपने घर लौट गए।
अब घर में सिर्फ परिवार रह गया था—
राजीव बाबू, कमला देवी, अंशुल और नेहा।
एक दिन सभी साथ बैठकर खाना खा रहे थे।
नेहा चुपचाप सबको परोस रही थी।
उसकी हर हरकत में अपनापन था—जैसे वह इस घर का हिस्सा पहले से ही हो।
खाना खत्म हुआ तो अंशुल ने कहा—
“पापा, मैंने और नेहा ने सोचा है कि हम कुछ दिन बाहर घूमने जाएं…”
कमला देवी मुस्कुराईं—
“हाँ बेटा, बिल्कुल जाओ… नई-नई शादी है, थोड़ा समय साथ बिताओ…”
राजीव बाबू भी सहमति में सिर हिलाने लगे।
लेकिन तभी नेहा ने धीरे से कहा—
“अगर आप दोनों की अनुमति हो तो मैं कुछ कहना चाहती हूँ…”
सबकी नज़रें उसकी तरफ उठ गईं।
“अरे बेटा, इसमें पूछने की क्या बात है… खुलकर बोलो…” कमला देवी ने प्यार से कहा।
नेहा ने गहरी सांस ली—
“मैंने सुना है कि पापा और मम्मी ने अपनी पूरी जिंदगी बस अंशुल और उसके सपनों के लिए लगा दी…
अपने लिए कभी कुछ नहीं किया…”
राजीव बाबू और कमला देवी एक-दूसरे को देखने लगे।
नेहा आगे बोली—
“क्या आप दोनों कभी साथ कहीं घूमने गए?”
दोनों चुप रहे।
उस चुप्पी में ही जवाब था।
नेहा की आवाज़ थोड़ी भर आई—
“तो फिर… अब वक्त आ गया है कि आप दोनों अपने लिए जिएं…”
अंशुल मुस्कुराने लगा।
नेहा ने उसकी तरफ देखा और फिर बोली—
“हम दोनों ने मिलकर आपके लिए केरल की एक खूबसूरत यात्रा प्लान की है…
हरी-भरी वादियाँ, बैकवॉटर, शांति… सब कुछ…”
कमला देवी हैरान रह गईं—
“हमारे लिए?”
“जी मम्मी… आपके लिए,” नेहा ने हाथ पकड़ते हुए कहा।
राजीव बाबू की आँखें नम हो गईं—
“लेकिन बेटा… ये सब क्यों?”
नेहा ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“क्योंकि आपने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के लिए जी…
अब थोड़ा समय खुद के लिए भी होना चाहिए…”
अंशुल ने मज़ाक में कहा—
“और हाँ पापा… वहाँ से मेरे लिए नारियल की मिठाई जरूर लाना!”
इतना सुनते ही सब हंस पड़े।
कमला देवी ने नेहा को गले लगा लिया—
“तू बहू नहीं… बेटी बनकर आई है…”
राजीव बाबू ने धीमे से कहा—
“हमने तो सोचा था कि अब बच्चों की जिम्मेदारी खत्म हुई…
लेकिन आज समझ आया कि असली खुशी तो अब शुरू हुई है…”
कुछ दिन बाद…
राजीव बाबू और कमला देवी पहली बार हवाई जहाज में बैठे थे।
हाथों में हाथ था… और चेहरे पर एक नई चमक।
वो सिर्फ यात्रा नहीं थी…
वो उनके अधूरे सपनों की शुरुआत थी।
इधर घर में—
नेहा और अंशुल बालकनी में बैठे थे।
नेहा ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा—
“कभी-कभी… सबसे बड़ी खुशी खुद खुश होने में नहीं…
दूसरों को खुश करने में होती है…”
अंशुल ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“और तुमने ये बात सच करके दिखा दी…”
घर में अब एक नई कहानी शुरू हो चुकी थी—
जहाँ रिश्ते सिर्फ निभाए नहीं जाते थे…
बल्कि दिल से जिए जाते थे… ❤️

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