कीमत जो समझ में आई
दरवाज़े के बाहर खड़ी नीरा ने घंटी दबाने से पहले एक गहरी सांस ली। हाथ में मिठाई का डिब्बा था, लेकिन दिल में हल्की-सी घबराहट। आज उसके पति, अर्जुन, की प्रमोशन पार्टी थी—और वह चाहती थी कि सब कुछ परफेक्ट हो।
घर के अंदर रौशनी जगमगा रही थी। महंगे पर्दे, चमचमाता फर्श, और दीवारों पर लगी बड़ी-बड़ी पेंटिंग्स—सब कुछ अर्जुन की कामयाबी की कहानी कह रहे थे।
अर्जुन फोन पर किसी से बात कर रहा था—
“हाँ, सब सेट है। क्लाइंट्स इम्प्रेस होने चाहिए बस, बाकी मैं संभाल लूंगा।”
नीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुनो, मैंने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। सोचा पार्टी से पहले थोड़ा खा लो।”
अर्जुन ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “अभी टाइम नहीं है नीरा। और वैसे भी, इतनी मेहनत से पार्टी अरेंज की है, वहीं खा लेंगे।”
नीरा चुप हो गई। उसने धीरे से मिठाई का डिब्बा टेबल पर रख दिया।
थोड़ी देर में मेहमान आने लगे। बड़े-बड़े लोग, महंगे गिफ्ट्स, ऊंची-ऊंची बातें। अर्जुन हर किसी के साथ हंस-हंस कर बात कर रहा था, जैसे वही इस दुनिया का सबसे खुश इंसान हो।
नीरा एक कोने में खड़ी सब देख रही थी।
तभी उनकी 10 साल की बेटी, पिहू, दौड़ती हुई आई—
“मम्मा, पापा को बुलाओ ना! मैंने उनके लिए एक कार्ड बनाया है।”
नीरा ने प्यार से कहा, “तुम खुद दे दो बेटा।”
पिहू खुशी-खुशी अर्जुन के पास गई—
“पापा! ये आपके लिए…”
अर्जुन ने जल्दी से कार्ड लिया, एक नजर डाली और कहा—
“बहुत अच्छा है बेटा… अभी पापा बिजी हैं, बाद में बात करते हैं।”
पिहू का चेहरा उतर गया। वह चुपचाप वापस आ गई।
नीरा ने यह सब देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
पार्टी खत्म हुई। सब मेहमान चले गए। घर फिर से शांत हो गया।
अर्जुन ने राहत की सांस ली—
“उफ्फ! आखिर खत्म हुई। लेकिन बहुत बढ़िया रही, सब इम्प्रेस हो गए।”
नीरा ने धीमे स्वर में कहा—
“हाँ, सब खुश थे… बस हम नहीं।”
अर्जुन चौंका—
“क्या मतलब?”
नीरा कुछ कह पाती, उससे पहले दरवाज़े पर फिर से घंटी बजी।
दरवाज़ा खोला तो सामने अर्जुन के पिता, रामकिशोर जी खड़े थे। साधारण कपड़े, हाथ में एक छोटा सा बैग।
“पापा? आप अचानक?” अर्जुन ने हैरानी से पूछा।
रामकिशोर जी मुस्कुराए—
“सोचा बेटे की खुशी में शामिल हो लूं।”
नीरा ने तुरंत उनका स्वागत किया।
अंदर आकर उन्होंने चारों तरफ देखा—
“बहुत खूबसूरत घर है बेटा… सब कुछ है।”
अर्जुन गर्व से बोला—
“हाँ पापा, मेहनत का फल है।”
रामकिशोर जी ने सिर हिलाया—
“अच्छा है… पर एक चीज़ कम लग रही है।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्या?”
रामकिशोर जी ने पास रखी टेबल से पिहू का कार्ड उठाया—
“यह।”
अर्जुन चुप हो गया।
रामकिशोर जी बोले—
“जब मैं आया, तो बाहर खड़ा सब देख रहा था। लोग हंस रहे थे, तुम हंस रहे थे… पर तुम्हारे अपने चुप थे।”
नीरा की आँखें भर आईं।
रामकिशोर जी आगे बोले—
“बेटा, तूने घर बहुत बड़ा बना लिया… पर उसमें रहने वालों के दिल छोटे हो गए।”
अर्जुन को यह बात चुभ गई—
“पापा, मैं यह सब आप लोगों के लिए ही तो कर रहा हूँ।”
“सच?” रामकिशोर जी ने शांत स्वर में पूछा।
“अगर हमारे लिए कर रहा होता, तो हमें ‘समय’ देता, ‘पैसा’ नहीं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उन्होंने धीरे से बैग खोला और एक पुराना डिब्बा निकाला।
“याद है यह?”
अर्जुन ने खोला—उसमें पुरानी तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर में छोटा सा घर, हंसता हुआ परिवार, और बीच में छोटा अर्जुन।
रामकिशोर जी बोले—
“तब हमारे पास कुछ नहीं था… पर हम साथ थे। अब तेरे पास सब कुछ है… पर तू अकेला हो गया है।”
अर्जुन की आँखें नम हो गईं।
तभी पिहू धीरे से पास आई—
“पापा… अब फ्री हो?”
यह छोटा सा सवाल अर्जुन के दिल में गूंज गया।
उसने तुरंत पिहू को गले लगा लिया—
“हाँ बेटा… अब पापा फ्री हैं।”
नीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा—
“मुझे माफ कर दो नीरा… मैं सब कुछ कमाने में, तुम्हें खोता जा रहा था।”
नीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“अभी भी देर नहीं हुई है।”
अर्जुन ने उसी समय अपना फोन उठाया, कुछ कॉल्स कैंसिल किए, और फिर फोन बंद कर दिया।
“अब?” नीरा ने पूछा।
अर्जुन मुस्कुराया—
“अब… हम जीएंगे। साथ में।”
उस रात पहली बार उस घर में सन्नाटा नहीं, बल्कि हंसी गूंज रही थी।
अगले दिन अर्जुन ने ऑफिस में एक नियम बनाया—
“काम ज़रूरी है… पर परिवार उससे ज़्यादा।”
धीरे-धीरे सब बदलने लगा।
अब हर रात डिनर साथ होता था।
हर वीकेंड पिहू की कहानियाँ सुनी जाती थीं।
और नीरा की बनाई खीर… अब अर्जुन कभी मना नहीं करता था।
उसे समझ आ गया था—
“कीमत चीज़ों की नहीं… रिश्तों की होती है।”
अगर यह कहानी दिल को छू गई हो, तो एक पल रुककर सोचिए—
क्या हम भी कहीं अर्जुन की तरह ‘सब कुछ’ पाकर ‘अपनों’ को खो तो नहीं रहे?
क्योंकि आखिर में…
घर वही होता है जहाँ लोग साथ हों, सिर्फ सामान नहीं।

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