सोच बदली, रिश्ते बदल गए
प्रेशर कुकर की धीमी आँच पर रखी दाल उबलते-उबलते जैसे खुद से बात कर रही थी…
सीटी नहीं, एक लंबी साँस-सी निकल रही थी — थकी हुई, दबे हुए एहसासों जैसी।
रसोई में खड़ी कृतिका चम्मच चला रही थी, लेकिन उसका ध्यान हर बार दरवाज़े की तरफ चला जाता।
जैसे किसी के आने का इंतज़ार हो… या शायद किसी बात के कहे जाने का।
“कृतिका, नमक डाल दिया क्या?”
सासू माँ की आवाज़ आई।
“हाँ मम्मी जी…” उसने धीमे से कहा।
आवाज़ में न गर्माहट थी, न ठंडापन — बस एक आदत थी।
तीन साल हो चुके थे इस घर में आए हुए।
पति, आरव — अच्छा इंसान, समझदार।
एक प्यारी-सी बेटी, परी — जो उसकी दुनिया थी।
सब कुछ ठीक था… फिर भी कुछ खाली-खाली था।
कृतिका घर के हर काम में लगी रहती, लेकिन रिश्तों में नहीं।
सास से औपचारिक बात, देवर से दूरी, और ननद से तो जैसे कोई रिश्ता ही नहीं।
वो हमेशा यही सोचती—
“मैं जितना कम बोलूँगी, उतना कम उलझूँगी।”
उसकी माँ ने शादी से पहले यही समझाया था—
“बहुत अपनापन दिखाओगी, तो लोग उसका फायदा उठाएंगे।”
कृतिका ने वही किया।
हर काम किया, लेकिन दिल से नहीं… बस ज़िम्मेदारी निभाई।
पर फिर एक दिन…
घर में अचानक हलचल मच गई।
ननद, सिया — जो बाहर शहर में रहती थी, अचानक घर लौटी।
चेहरे पर घबराहट, आँखों में डर।
“माँ… पापा की तबीयत ठीक नहीं लग रही…” उसने आते ही कहा।
पापा जी को चक्कर आ गया था।
सभी घबरा गए।
आरव उन्हें अस्पताल ले गया।
घर में सिर्फ कृतिका और सिया रह गईं।
पहली बार… दोनों एक ही कमरे में, बिना किसी दीवार के खड़ी थीं।
सिया ने धीरे से पूछा—
“भाभी… पानी मिलेगा?”
कृतिका ने गिलास बढ़ाया।
कुछ पल चुप्पी रही… फिर सिया बोली—
“आप मुझसे नाराज़ हो क्या?”
कृतिका चौंकी—
“नहीं तो…”
“फिर… आपने कभी मुझे अपना समझा ही नहीं…”
सिया की आवाज़ हल्की काँप रही थी।
ये सुनकर कृतिका के हाथ रुक गए।
उसने पहली बार सिया की आँखों में देखा—
वहाँ शिकायत नहीं, बस इंतज़ार था।
“मैं… बस…” कृतिका कुछ कह नहीं पाई।
सिया मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोली—
“मैं जब भी आती हूँ, सोचती हूँ इस बार आपसे खुलकर बात करूँगी…
पर आप इतनी दूर-दूर रहती हो कि हिम्मत ही नहीं होती।”
कृतिका का दिल जैसे धीरे-धीरे पिघलने लगा।
उसे पहली बार एहसास हुआ—
दूरी सिर्फ उसने बनाई थी… और दर्द सामने वाला भी महसूस कर रहा था।
उसी वक्त फोन आया—
आरव का।
“पापा अब ठीक हैं… डॉक्टर ने कहा है टेंशन की वजह से हुआ था।”
दोनों ने राहत की साँस ली।
फोन रखते ही सिया ने धीरे से कहा—
“भाभी… अगर मैं कुछ गलत करूँ, तो डाँट देना… पर ऐसे दूर मत रहो।”
बस… यही बात दिल में उतर गई।
उस रात कृतिका सो नहीं पाई।
उसे अपनी माँ की बातें याद आईं…
और फिर अपने व्यवहार का असर भी।
“क्या सच में सब गलत हैं? या मेरी सोच ने ही सबको दूर कर दिया?”
अगले दिन…
रसोई में वही दाल बन रही थी।
लेकिन इस बार कृतिका ने खुद आवाज़ लगाई—
“सिया, ज़रा आओ… चखकर बताओ नमक कैसा है?”
सिया चौंक गई… फिर मुस्कराते हुए आ गई।
“थोड़ा और डालो भाभी…” उसने हँसते हुए कहा।
दोनों की हँसी पहली बार साथ गूँजी।
धीरे-धीरे…
कृतिका ने सास के साथ बैठकर बातें करनी शुरू कीं,
देवर के मज़ाक पर मुस्कराना सीखा,
और सिया के साथ चाय पीना उसकी आदत बन गया।
घर वही था… लोग वही थे…
पर माहौल बदल गया था।
कुछ हफ्तों बाद…
पापा जी अखबार पढ़ते हुए बोले—
“अब घर में पहले जैसी खामोशी नहीं रही… अच्छा लगता है।”
सासू माँ ने हँसते हुए कहा—
“कृतिका की चाय में अब स्वाद ही नहीं, अपनापन भी आ गया है।”
कृतिका मुस्करा दी।
उसने धीमे से कहा—
“मैंने हमेशा सोचा था कि दूरी से शांति मिलेगी…
पर असली सुकून तो रिश्तों में घुलने से मिलता है।”
सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“अब आप सिर्फ भाभी नहीं… मेरी दोस्त भी हो।”
कृतिका की आँखें हल्की-सी नम हो गईं।
उसने मन ही मन सोचा—
“रिश्ते कभी मुश्किल नहीं होते…
हमारी सोच उन्हें मुश्किल बना देती है।”
और उसी वक्त कुकर ने सीटी दी—
इस बार तेज़, साफ और खुश।
जैसे कह रहा हो—
“अब सब ठीक है…”

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