रसोई की खुशबू
सुबह के करीब साढ़े छह बजे होंगे। खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही थी और बाहर गली में दूध वाले की साइकिल की घंटी सुनाई दे रही थी।
मीना जी धीरे-धीरे उठीं। उम्र के साथ नींद वैसे भी हल्की हो जाती है, और आज तो मन भी कुछ भारी-सा था। कल ही वे बेटे के नए फ्लैट में रहने आई थीं।
उन्होंने कमरे के चारों तरफ नजर घुमाई—साफ-सुथरा कमरा, हल्के रंग के पर्दे, और एकदम सलीके से रखा सामान। सब कुछ बहुत अच्छा था… पर फिर भी कुछ कमी-सी लग रही थी।
उन्होंने धीरे से खुद से कहा,
“घर तो सुंदर है… पर वो अपनापन कहाँ है?”
मीना जी को अपने पुराने घर की याद आ गई—जहाँ सुबह होते ही रसोई में चाय चढ़ जाती थी, रेडियो पर पुराने गाने बजते थे, और पूरे घर में अदरक-इलायची की खुशबू फैल जाती थी।
यहाँ… सब कुछ शांत था।
थोड़ी देर बाद वे रसोई की तरफ बढ़ीं। अंदर बहू रिया खड़ी थी—हेडफोन लगाए, मोबाइल स्टैंड पर कोई रेसिपी वीडियो चल रहा था, और गैस पर कुछ उबल रहा था।
मीना जी चुपचाप दरवाजे पर खड़ी होकर देखने लगीं।
रिया ने उन्हें देखा और जल्दी से हेडफोन उतार दिए।
“अरे मम्मी जी! आप उठ गईं? मुझे बुला लेतीं न!”
“नहीं बेटा, आदत है जल्दी उठने की,” मीना जी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“बस पाँच मिनट में नाश्ता तैयार हो जाएगा,” रिया ने कहा।
मीना जी ने उत्सुकता से पूछा, “क्या बना रही हो?”
रिया ने खुशी से बताया, “ओट्स उपमा! हेल्दी भी है और जल्दी भी बन जाता है।”
मीना जी ने हल्का-सा सिर हिलाया, पर मन में सोचा—
“उपमा तो ठीक… पर ये ओट्स वाला क्या नया चक्कर है?”
कुछ देर बाद दोनों टेबल पर बैठीं। बेटा रोहन भी ऑफिस के लिए तैयार होकर आ गया।
रिया ने प्लेट में ओट्स उपमा परोसा।
मीना जी ने पहला कौर लिया… और बस चुप हो गईं।
स्वाद बुरा नहीं था… पर वो “मज़ा” नहीं था।
रोहन ने पूछा, “कैसा लगा माँ?”
मीना जी ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा है बेटा… हल्का है।”
रिया खुश हो गई, “मैं रोज कुछ नया ट्राय करती हूँ मम्मी जी!”
मीना जी ने हामी भर दी, पर मन कहीं और था।
दोपहर में रोहन ऑफिस चला गया और रिया अपने लैपटॉप पर काम करने लगी।
मीना जी अकेली बैठी थीं। टीवी चल रहा था, पर ध्यान कहीं और था।
कुछ देर बाद वे उठीं और धीरे से रसोई में चली गईं।
उन्होंने रसोई के डिब्बे खोले—सब कुछ था… पर उनके अपने मसाले नहीं।
उन्होंने एक लंबी सांस ली और सोचा,
“चलो… आज कुछ अपना बना लेती हूँ।”
उन्होंने धीरे-धीरे आटा गूंथा, सब्जी काटी, और सरसों के तेल में तड़का लगाया।
जैसे ही तड़का लगा—पूरी रसोई खुशबू से भर गई।
मीना जी के चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान आई।
“बस… यही तो है घर की खुशबू,” उन्होंने खुद से कहा।
करीब एक घंटे बाद रिया रसोई में आई—और खुशबू सूंघते ही रुक गई।
“वाह… ये क्या बन रहा है?”
मीना जी थोड़ी घबराईं, “बस… सोचा आलू की सब्जी बना लूँ।”
रिया ने चखकर देखा… और उसकी आँखें चमक उठीं।
“मम्मी जी! ये तो बहुत टेस्टी है!”
मीना जी को यकीन ही नहीं हुआ,
“सच में?”
“बिलकुल! ऐसा स्वाद मैंने पहले नहीं खाया,” रिया ने कहा।
मीना जी के चेहरे पर हल्की-सी शर्म और खुशी दोनों आ गई।
शाम को जब रोहन आया, तो रिया ने उत्साह से कहा,
“आज मम्मी जी ने खाना बनाया है!”
रोहन ने पहला कौर लिया और तुरंत बोला,
“माँ… ये तो वही पुराना वाला स्वाद है!”
मीना जी हँस पड़ीं, “पुराना नहीं बेटा… असली स्वाद है।”
रिया ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी… एक बात कहूँ?”
“हाँ बेटा?”
“आप रोज थोड़ा-थोड़ा सिखाएँगी मुझे? मैं भी ऐसा ही खाना बनाना सीखना चाहती हूँ।”
मीना जी कुछ पल के लिए चुप रह गईं।
फिर बोलीं,
“और तुम मुझे वो… क्या कहते हैं… ओट्स वाला बनाना सिखाओगी?”
रिया हँस पड़ी,
“डील पक्की!”
अगले दिन सुबह रसोई में दोनों साथ खड़ी थीं।
एक तरफ मीना जी तड़का लगा रही थीं, और दूसरी तरफ रिया ओट्स बना रही थी।
बीच-बीच में दोनों हँस भी रही थीं।
रोहन बाहर बैठा ये सब देख रहा था और मुस्कुरा रहा था।
उसे समझ आ गया था—
घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता…
घर बनता है रसोई की खुशबू,
थोड़ी समझ,
और थोड़ा प्यार से।
उस दिन के बाद उस घर में सिर्फ खाना नहीं बनता था…
वहाँ रिश्ते पकते थे।
कभी सरसों के तेल में,
तो कभी ओट्स की हल्की भाप में।
क्योंकि अब दोनों को समझ आ गया था—
स्वाद सिर्फ खाने में नहीं… अपनापन में होता है।

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