जहाँ सांस मिले, वही घर होता है
शाम की हल्की ठंडक बालकनी में उतर रही थी। आसमान पर सूरज ढल रहा था, पर नंदिता के भीतर का दिन कब का ढल चुका था।
वह रेलिंग पकड़े खड़ी थी और नीचे खेलते बच्चों को देख रही थी। बच्चों की हँसी उसे अच्छी लगती थी, पर आज वह हँसी भी उसके मन तक नहीं पहुँच रही थी।
पीछे कमरे में उसका पति विवेक लैपटॉप पर काम कर रहा था।
“नंदिता, चाय मिलेगी?” विवेक ने बिना देखे ही आवाज़ लगाई।
नंदिता ने “हाँ” कहा, पर उसके कदम वहीं जमे रहे।
कुछ सेकंड बाद उसने खुद को संभाला और किचन की ओर बढ़ गई।
यह “हाँ” पिछले चार सालों से उसके जीवन का सबसे बड़ा जवाब था—
चाहे मन हो या न हो…
चाहे थकान हो या दर्द…
हर बात का जवाब “हाँ”।
विवेक बुरा इंसान नहीं था। वह जिम्मेदार था, मेहनती था।
पर उसके जीवन में एक जगह ऐसी थी, जहाँ नंदिता कभी पहुँच ही नहीं पाई—
वह जगह थी उसकी माँ, कमला देवी।
कमला देवी के लिए बहू का मतलब था—
घर संभालने वाली, चुप रहने वाली, और हर बात मानने वाली।
“बहू, ये ऐसे नहीं होता…”
“हमारे घर में ऐसा ही चलता है…”
“हमने भी सब सहा है…”
ये तीन वाक्य नंदिता की जिंदगी के नियम बन चुके थे।
सुबह 5 बजे उठना, पूजा करना, नाश्ता बनाना, सबकी पसंद अलग-अलग याद रखना…
फिर ऑफिस जाना…
और लौटकर फिर वही सब दोहराना।
कभी उसने कहा भी—
“माँ, मैं भी नौकरी करती हूँ…”
तो जवाब मिला—
“तो क्या हुआ? घर पहले आता है।”
विवेक सब सुनता था।
कभी-कभी कहता भी—
“माँ, रहने दो…”
पर उसकी आवाज़ हमेशा धीमी होती थी…
इतनी धीमी कि कभी असर ही नहीं करती थी।
धीरे-धीरे नंदिता ने बोलना कम कर दिया।
उसकी हँसी, जो पहले पूरे घर में गूंजती थी, अब सिर्फ याद बनकर रह गई थी।
ऑफिस में उसकी दोस्त रीमा ने एक दिन पूछा—
“सब ठीक है ना?”
नंदिता ने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ, सब ठीक है।”
पर उस दिन घर आकर वह बहुत रोई थी।
एक रविवार की सुबह, जब घर में सब अपने-अपने काम में लगे थे, विवेक अचानक उसके पास आया।
“नंदिता, एक बात कहूँ?”
“हम्म…”
“अगर हम… अलग घर में रहें… तो?”
नंदिता के हाथ रुक गए।
उसे लगा जैसे उसने कुछ गलत सुन लिया।
“क्या मतलब?”
“मतलब… बस हम दोनों। पास ही रहेंगे… माँ से मिलते रहेंगे।”
नंदिता ने उसकी आँखों में देखा।
पहली बार उसे वहाँ डर नहीं… हिम्मत दिखी।
“माँ मान जाएँगी?” उसने धीरे से पूछा।
विवेक चुप हो गया।
“नहीं… शायद नहीं।”
“तो फिर?”
विवेक ने गहरी साँस ली—
“तो इस बार… मैं मानूँगा नहीं।”
उस दिन के बाद घर में माहौल बदल गया।
कमला देवी को जब पता चला, तो जैसे तूफान आ गया।
“बहू ने दिमाग खराब कर दिया है तेरा!”
“हमने तुझे बड़ा किया इसी दिन के लिए?”
“अब माँ बोझ लगने लगी?”
विवेक चुपचाप सुनता रहा।
पहली बार उसने बीच में टोका नहीं…
बल्कि अंत तक सब सुन लिया।
फिर उसने धीरे से कहा—
“माँ, आप बोझ नहीं हैं… पर नंदिता भी इंसान है।”
कमला देवी रुक गईं।
“उसने चार साल बिना कुछ कहे सब किया…
अब मेरी बारी है उसका साथ देने की।”
घर में सन्नाटा छा गया।
दो हफ्ते बाद, नंदिता और विवेक अपने नए फ्लैट में आ गए।
घर छोटा था…
पर खुला था।
खिड़की से हवा आती थी…
और पहली बार, नंदिता को लगा—
वह साँस ले पा रही है।
पहली सुबह, वह देर से उठी।
घबराकर घड़ी देखी—
“ओह! 8 बज गए!”
वह भागकर किचन में गई।
विवेक वहाँ पहले से खड़ा था, चाय बनाते हुए।
“तुम…?”
विवेक मुस्कुराया—
“हाँ, आज मेरी ड्यूटी है।”
नंदिता उसे देखती रह गई।
“पर… ऑफिस?”
“आज देर से जाऊँगा।”
“क्यों?”
विवेक ने कप उसकी ओर बढ़ाया—
“क्योंकि आज… तुम्हें आराम करना है।”
नंदिता की आँखें भर आईं।
कुछ दिन बीते।
नया घर धीरे-धीरे बसने लगा।
नंदिता ने अपनी पसंद के परदे लगाए…
अपनी पसंद का खाना बनाया…
और सबसे जरूरी—
अपनी पसंद से जीना शुरू किया।
एक शाम, बालकनी में बैठकर वह चाय पी रही थी।
विवेक उसके पास आया।
“खुश हो?”
नंदिता ने मुस्कुराकर कहा—
“थोड़ी-सी।”
“बस थोड़ी?”
“हाँ… क्योंकि पूरी खुशी तब होगी…
जब मुझे डर नहीं लगेगा कि ये सब कभी खत्म हो जाएगा।”
विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया—
“अब नहीं होगा।”
कुछ दिनों बाद, उन्होंने कमला देवी के घर जाने का फैसला किया।
दरवाज़ा खुला।
कमला देवी सामने थीं।
उनकी आँखों में नाराज़गी थी…
पर अकेलापन भी।
नंदिता ने धीरे से कहा—
“नमस्ते, माँ।”
कमला देवी ने जवाब नहीं दिया।
विवेक आगे बढ़ा—
“माँ, हम मिलने आए हैं… रहने नहीं।”
कमला देवी चौंकीं।
“और एक बात…”
विवेक की आवाज़ अब साफ और मजबूत थी—
“अगर आप नंदिता से अच्छे से बात करेंगी…
तो हम बार-बार आएँगे।
वरना… कम आएँगे।”
कमला देवी ने पहली बार नंदिता को ध्यान से देखा।
वह वही बहू थी…
जो चार साल तक चुप रही थी।
पर आज उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी।
कमला देवी धीरे से बोलीं—
“अंदर आओ…”
उस दिन कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।
पर शुरुआत हो गई।
रात को घर लौटकर, नंदिता बालकनी में खड़ी थी।
विवेक पीछे से आया—
“क्या सोच रही हो?”
नंदिता ने आसमान की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा—
“घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता…”
विवेक ने हल्की जिज्ञासा से पूछा—
“तो फिर किससे बनता है?”
नंदिता ने उसकी ओर मुड़कर देखा, आँखों में सुकून था—
“घर वहाँ बनता है…
जहाँ डर कम हो और सम्मान ज्यादा हो।”
विवेक मुस्कुराया—
“तो क्या हमारा ये घर… सही है?”
नंदिता के चेहरे पर एक सच्ची, हल्की-सी मुस्कान आई—
“हाँ… क्योंकि यहाँ मैं सिर्फ ‘सहन’ नहीं कर रही…
मैं सच में ‘जी’ रही हूँ।”
उस रात हवा थोड़ी और ठंडी थी…
पर दिल थोड़ा और हल्का।
और पहली बार…
नंदिता को लगा—
उसने सिर्फ घर नहीं बदला…
उसने अपनी जिंदगी बदल ली।

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