आवाज़ अटकती थी, हौसला नहीं
दोपहर की तेज़ धूप पूरे मोहल्ले में फैली हुई थी। गली के बाहर सब्ज़ी वाले की आवाज़ गूंज रही थी और घरों की छतों पर सूखते कपड़े हवा में धीरे-धीरे हिल रहे थे।
लेकिन शर्मा परिवार के छोटे से घर के अंदर माहौल बिल्कुल अलग था।
रसोई में गैस पर दाल उबल रही थी और कमरे के कोने में बैठा रवि बार-बार अपने हाथों की उंगलियाँ मरोड़ रहा था। उसके सामने मेज पर एक पुराना मोबाइल रखा था जिसमें अभी-अभी एक मैसेज आया था।
“कल सुबह इंटरव्यू के लिए समय पर पहुंचिए।”
मैसेज पढ़कर भी रवि खुश नहीं था।
उसकी मां सावित्री देवी रसोई से बाहर आईं और बोलीं—
“क्या हुआ बेटा? सुबह से इतने परेशान क्यों बैठे हो?”
रवि धीमी आवाज़ में बोला—
“मां… इंटरव्यू तो है, लेकिन जाने का कोई फायदा नहीं। वहां बड़े-बड़े पढ़े लिखे लोग आएंगे। मेरा चयन थोड़ी होगा।”
सावित्री देवी उसके पास बैठ गईं।
“बेटा, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”
रवि हल्का सा मुस्कुराया लेकिन मन में डर अब भी था।
दरअसल रवि बहुत साधारण परिवार से था। पिता की छोटी सी सिलाई की दुकान थी। घर का खर्च किसी तरह चलता था। रवि पढ़ाई में अच्छा था लेकिन उसकी सबसे बड़ी परेशानी थी उसका हकलाना।
जब भी वह किसी नए इंसान से बात करता, उसकी जुबान लड़खड़ा जाती। लोग उसका मजाक उड़ाते।
इसी वजह से वह इंटरव्यू देने से डरता था।
अगली सुबह…
हल्की ठंडी हवा चल रही थी। सड़क पर ऑफिस जाने वालों की भीड़ थी। रवि पुराने इस्त्री किए हुए कपड़े पहनकर बस स्टैंड पर खड़ा था। हाथ में फाइल थी और चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
बस में बैठे हुए भी वह मन ही मन जवाब याद कर रहा था।
“अपना परिचय दीजिए…”
वह धीरे-धीरे बोलने की कोशिश करता, लेकिन शब्द अटक जाते।
करीब एक घंटे बाद वह शहर की बड़ी कंपनी के ऑफिस पहुंच गया।
ऑफिस की ऊंची बिल्डिंग देखकर ही उसके कदम रुक गए।
अंदर रिसेप्शन पर कई लड़के-लड़कियां बैठे थे। सभी महंगे कपड़ों में थे। कोई अंग्रेजी में बात कर रहा था, कोई लैपटॉप चला रहा था।
रवि खुद को वहां बिल्कुल छोटा महसूस कर रहा था।
तभी एक लड़का अपने दोस्तों से हंसते हुए बोला—
“भाई, यहां नौकरी उन्हीं को मिलेगी जिनकी अंग्रेजी फास्ट होगी।”
यह सुनकर रवि का दिल और बैठ गया।
उसने सोचा—
“मुझसे तो ठीक से हिंदी भी नहीं बोली जाती…”
इंटरव्यू शुरू हुए।
एक-एक करके उम्मीदवार अंदर जाते और बाहर आते।
कुछ देर बाद रिसेप्शनिस्ट ने आवाज लगाई—
“रवि शर्मा!”
रवि के हाथ कांपने लगे।
वह धीरे-धीरे इंटरव्यू रूम के अंदर पहुंचा।
कमरे में तीन लोग बैठे थे। बीच में कंपनी के मालिक अरुण मेहरा थे। सफेद शर्ट, गंभीर चेहरा और तेज आवाज।
उन्होंने रवि की फाइल देखते हुए पूछा—
“तो रवि… अपने बारे में बताइए।”
रवि ने बोलना शुरू किया—
“स…स…सर… मेरा नाम र…रवि शर्मा है…”
शब्द अटकने लगे।
कमरे में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया।
रवि का चेहरा शर्म से झुक गया। उसे लगा अब सब खत्म हो गया।
लेकिन तभी अरुण मेहरा कुर्सी से थोड़ा आगे झुके और शांत आवाज़ में बोले—
“आराम से बोलो बेटा… यहां कोई जल्दी नहीं है।”
रवि ने गहरी सांस ली।
फिर धीरे-धीरे अपने बारे में बताने लगा।
उसने अपनी पढ़ाई, परिवार और मेहनत के बारे में बताया।
इंटरव्यू ज्यादा देर नहीं चला।
बाहर निकलते ही रवि को लगा कि उसका चयन नहीं होगा।
वह उदास मन से घर लौट आया।
शाम को मोहल्ले में बिजली चली गई थी। घर के बाहर बच्चे खेल रहे थे और अंदर सावित्री देवी चिंता में बैठी थीं।
तभी रवि का मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर कंपनी का नंबर चमक रहा था।
रवि ने कांपते हाथों से फोन उठाया।
“हेलो…”
उधर से आवाज आई—
“क्या मैं रवि शर्मा से बात कर रहा हूं?”
“ज…जी…”
“बधाई हो। आपका चयन हो गया है। कल से जॉइन कर लीजिए।”
रवि कुछ सेकंड तक चुप रह गया।
उसे यकीन ही नहीं हुआ।
सावित्री देवी घबराकर बोलीं—
“क्या हुआ बेटा?”
रवि की आंखों में आंसू आ गए।
“मां… नौकरी लग गई…”
सावित्री देवी खुशी से भगवान का नाम लेने लगीं।
अगले दिन रवि कंपनी पहुंचा।
ऑफिस में उसका स्वागत हुआ।
कुछ देर बाद कंपनी के मालिक अरुण मेहरा ने उसे अपने केबिन में बुलाया।
रवि घबराते हुए अंदर गया।
अरुण मेहरा मुस्कुराकर बोले—
“तुम सोच रहे होगे कि हमने तुम्हें नौकरी क्यों दी?”
रवि चुपचाप खड़ा रहा।
तब अरुण मेहरा ने कहा—
“कल इंटरव्यू में कई लोग आए थे। सबकी अंग्रेजी अच्छी थी, सब आत्मविश्वास से भरे हुए थे। लेकिन उनमें से कोई भी सच्चा नहीं लगा।”
उन्होंने रवि की तरफ देखते हुए कहा—
“तुम हकलाते जरूर हो… लेकिन झूठ नहीं बोलते। तुम्हारी आंखों में मेहनत दिखाई देती है।”
रवि ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था।
तभी अरुण मेहरा धीरे से मुस्कुराए और बोले—
“जानते हो… बचपन में मैं भी हकलाता था।”
रवि ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
“स्कूल में बच्चे मेरा मजाक उड़ाते थे। कई बार मैं रोकर घर आता था। लेकिन मेरे पिता हमेशा कहते थे— इंसान की आवाज नहीं, उसका चरित्र बड़ा होना चाहिए।”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
फिर उन्होंने रवि के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—
“कमजोरी वही होती है जिसे इंसान खुद कमजोरी मान ले।”
रवि की आंखें भर आईं।
उस दिन पहली बार उसे अपने आप पर शर्म नहीं, गर्व महसूस हुआ।
धीरे-धीरे समय बीतता गया।
रवि मेहनत से काम करने लगा। ऑफिस के लोग भी उसकी इज्जत करने लगे।
एक दिन कंपनी में नए कर्मचारियों की मीटिंग चल रही थी।
रवि अब टीम लीडर बन चुका था।
सामने बैठे नए लड़के-लड़कियों में एक लड़का घबराया हुआ था। बोलते समय उसकी आवाज कांप रही थी।
रवि तुरंत अपनी कुर्सी से उठा और मुस्कुराकर बोला—
“आराम से बोलो… यहां कोई जल्दी नहीं है।”
वही शब्द… जो कभी किसी ने उससे कहे थे।

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