जब सास को बहू का दर्द समझ आया
रसोई में गैस पर चाय उबल रही थी और ड्रॉइंग रूम में टीवी की धीमी आवाज़ चल रही थी। घर के बाकी लोग अपने-अपने काम में लगे थे, लेकिन पूजा की आँखों के नीचे पड़े काले घेरे उसकी थकान साफ बता रहे थे।
वह जल्दी-जल्दी सबके लिए पराठे सेंक रही थी। तभी उसका छोटा बेटा चिंटू रोने लगा। पूजा तुरंत हाथ पोंछकर उसे गोद में उठाने लगी।
तभी उसके पति अमित ने कहा—
“पूजा, तुम बैठ जाओ। मैं चिंटू को संभाल लेता हूँ। तुमने रात भर ठीक से सोया भी नहीं।”
इतना सुनते ही सास कमला देवी ने ताना मारते हुए कहा—
“अरे वाह! अब बहुओं को बच्चे संभालने में भी परेशानी होने लगी? हमने भी बच्चे पाले हैं। तब तो कोई मदद करने वाला नहीं था।”
अमित ने शांत आवाज़ में कहा—
“माँ, परेशानी की बात नहीं है। बस पूजा कई दिनों से ठीक से सो नहीं पा रही। चिंटू रात-भर उठता रहता है।”
कमला देवी बोलीं—
“तो क्या हुआ? माँ बनने के बाद औरतों को इतना तो करना ही पड़ता है। बच्चा पैदा करना आसान है क्या?”
पूजा चुपचाप सब सुन रही थी। उसने कुछ नहीं कहा और फिर रसोई के काम में लग गई।
अमित ऑफिस जाने लगा तो उसने जाते-जाते कहा—
“पूजा, तुम थोड़ी देर आराम कर लेना। बाकी काम बाद में हो जाएंगे।”
कमला देवी ने फिर ताना मारा—
“हाँ हाँ, अब घर के काम भी इंतज़ार करेंगे महारानी जी के उठने तक।”
अमित बिना कुछ बोले निकल गया।
कुछ देर बाद पूजा ने सारा काम निपटाया और चिंटू को लेकर कमरे में चली गई। बच्चा दूध पीते-पीते सो गया और पूजा की भी आँख लग गई।
उधर कमला देवी गुस्से में बड़बड़ाने लगीं—
“आजकल की बहुएँ बस आराम चाहती हैं। घर-गृहस्थी चलाना आता ही नहीं।”
पास बैठे उनके पति महेश जी अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“कमला, तुम्हें याद है जब हमारी शादी हुई थी, तब तुम भी तो यही शिकायत करती थीं कि मेरी माँ तुम्हें आराम नहीं करने देती।”
कमला देवी तुरंत बोलीं—
“वो अलग बात थी।”
महेश जी हँस पड़े—
“कैसे अलग बात थी? तब तुम चाहती थीं कि कोई तुम्हारी तकलीफ़ समझे। अब अपनी बहू की बारी आई तो तुम सब भूल गई?”
कमला देवी ने नाराज़ होकर कहा—
“आपको तो बस हमेशा मेरी गलती ही दिखती है।”
महेश जी धीरे से बोले—
“गलती नहीं दिख रही, बस समय का फर्क दिख रहा है।”
इतने में चिंटू रोने लगा। महेश जी उठे और उसे गोद में उठा लिया।
“लाओ, मैं इसे बाहर घुमा लाता हूँ। बहू थोड़ी देर चैन से सो लेगी।”
कमला देवी ने आश्चर्य से पूछा—
“आप भी अब बहू का पक्ष लेने लगे?”
महेश जी बोले—
“पक्ष नहीं ले रहा, इंसानियत निभा रहा हूँ।”
करीब एक घंटे बाद पूजा उठी। वह जल्दी से बाहर आई और बोली—
“मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए। पता ही नहीं चला कब नींद लग गई।”
कमला देवी ने ठंडे स्वर में कहा—
“कोई बात नहीं। आदत डाल लो आराम करने की।”
पूजा ने उनकी बात अनसुनी की और तुरंत रसोई में जाकर खाना बनाने लगी।
महेश जी ने धीरे से कहा—
“बहू, आराम से काम करो। जल्दी की जरूरत नहीं है।”
पूजा मुस्कुरा दी।
दिन गुजरते गए। चिंटू अब भी रात में कई बार उठता था। पूजा की नींद पूरी नहीं होती थी, लेकिन वह फिर भी पूरे घर का काम संभालती रहती।
एक दिन कमला देवी की तबीयत अचानक खराब हो गई। उन्हें तेज़ बुखार था और कमजोरी के कारण उठना भी मुश्किल हो रहा था।
पूजा तुरंत उनके पास बैठ गई।
“मम्मी जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं हूँ ना।”
उसने उनके सिर पर ठंडी पट्टियाँ रखीं, समय पर दवा दी और पूरी रात उनके पास बैठी रही।
कमला देवी ने कमजोर आवाज़ में कहा—
“तू सो जा बहू… पूरी रात जाग रही है।”
पूजा मुस्कुराकर बोली—
“माँ की तबीयत खराब हो तो बेटी कैसे सो सकती है?”
यह सुनते ही कमला देवी की आँखें भर आईं।
उन्हें याद आने लगा कि कैसे वह छोटी-छोटी बातों पर पूजा को ताने देती थीं। लेकिन वही बहू बिना शिकायत उनकी सेवा कर रही थी।
अगले दिन जब उनकी तबीयत थोड़ी ठीक हुई तो उन्होंने पूजा को अपने पास बुलाया।
पूजा घबराकर उनके पास आई—
“जी मम्मी जी?”
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे माफ कर दे बहू। मैं हमेशा तुझे गलत समझती रही।”
पूजा तुरंत बोली—
“ऐसा मत कहिए मम्मी जी।”
कमला देवी की आँखों से आँसू निकल पड़े—
“नहीं बहू, आज समझ आया कि घर सिर्फ काम से नहीं चलता, अपनापन भी चाहिए होता है।”
पास खड़े महेश जी मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा—
“रिश्ते हुक्म चलाने से नहीं, एक-दूसरे की तकलीफ़ समझने से मजबूत होते हैं।”
इतने में छोटा चिंटू भागता हुआ आया और दादी की गोद में चढ़ गया।
कमला देवी ने उसे प्यार से सीने से लगा लिया और फिर पूजा की तरफ देखकर बोलीं—
“अब से तू सिर्फ इस घर की बहू नहीं, मेरी बेटी भी है।”
पूजा की आँखें नम हो गईं।
उस दिन घर का माहौल बदला हुआ था। पहली बार कमला देवी के शब्दों में ताने नहीं, अपनापन था।

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