एक ससुर का कोमल दिल
रसोई में रखी चाय पूरी तरह ठंडी हो चुकी थी। गैस पर दूध उबल-उबलकर नीचे गिर रहा था, लेकिन पूजा का ध्यान कहीं और ही था। उसके हाथों में छह महीने की बेटी परी थी, जो लगातार रोए जा रही थी। पूरे घर में उसकी तेज आवाज गूंज रही थी।
पूजा कभी उसे कंधे से लगाती, कभी खिलौना दिखाती, कभी खिड़की के पास ले जाकर बाहर का दृश्य दिखाने लगती, लेकिन बच्ची चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
“हे भगवान… आखिर हुआ क्या है इसे?”
वो घबराकर खुद से ही बोली।
उसकी आंखों में थकान साफ दिखाई दे रही थी। पिछली रात भी परी ठीक से नहीं सोई थी। ऊपर से पति निखिल काम से बाहर शहर गए हुए थे। घर में सिर्फ पूजा और उसके ससुर दयाशंकर जी थे।
बरामदे में बैठे दयाशंकर जी काफी देर से बच्ची के रोने की आवाज सुन रहे थे। आखिर उनसे रहा नहीं गया।
उन्होंने कमरे की तरफ आते हुए पूछा—
“बहू, अभी तक चुप नहीं हुई क्या?”
पूजा परेशान होकर बोली—
“नहीं पापा जी… कुछ समझ ही नहीं आ रहा। दूध भी पी लिया, कपड़े भी बदल दिए, गोद में भी ले लिया… लेकिन बस रोए जा रही है।”
दयाशंकर जी ने बच्ची की तरफ गौर से देखा। फिर बोले—
“जरा हमें दो।”
पूजा ने धीरे से परी को उनकी गोद में दे दिया।
दयाशंकर जी ने बच्ची को सीने से लगाया और कमरे में धीरे-धीरे टहलने लगे।
“अरे मेरी गुड़िया… क्या परेशानी है तुम्हें?”
उनकी आवाज में इतना अपनापन था कि पूजा खुद थोड़ा शांत हो गई।
कुछ देर तक उन्होंने बच्ची को ध्यान से देखा। फिर उसके कान के पास हल्के से उंगली घुमाई।
“अच्छा… तो ये बात है।”
उन्होंने धीरे से कहा।
“क्या हुआ पापा जी?” पूजा तुरंत घबरा गई।
“लगता है कान में हल्का दर्द है। शायद हवा लग गई है।”
पूजा की चिंता और बढ़ गई।
“अब क्या करें?”
दयाशंकर जी मुस्कुराए।
“घबराओ मत। पहले छोटा सा उपाय करते हैं। अगर आराम ना मिला तो डॉक्टर के पास चलेंगे।”
उन्होंने रसोई से लहसुन और सरसों का तेल मंगवाया।
फिर एक छोटी कड़ाही में तेल गर्म किया और उसमें दो लहसुन की कलियां डाल दीं।
जब तेल हल्का गुनगुना रह गया तो उन्होंने अपनी हथेली पर थोड़ा सा तेल लिया और बच्ची के कान के पीछे हल्के-हल्के मालिश करने लगे।
साथ ही उसे गोद में लेकर धीरे-धीरे थपकी देते रहे।
कुछ ही देर बाद परी का रोना कम होने लगा।
पूजा हैरानी से उन्हें देखती रह गई।
“आपको ये सब कैसे पता?”
दयाशंकर जी हल्का हंस दिए।
“तुम्हारी सास बहुत बीमार रहती थीं ना आखिरी दिनों में… तब घर और बच्चों दोनों को संभालना सीखना पड़ा।”
इतना कहते ही उनका चेहरा अचानक उदास हो गया।
उन्होंने नजरें दूसरी तरफ फेर लीं।
पूजा धीरे से बोली—
“मम्मी जी की बहुत याद आती होगी ना?”
दयाशंकर जी कुछ पल चुप रहे।
फिर धीमी आवाज में बोले—
“आदतें कभी नहीं जातीं बहू। आज भी सुबह उठकर लगता है वो रसोई से आवाज देंगी।”
पूजा की आंखें नम हो गईं।
उसे हमेशा लगता था कि पुरुष अपने दुख आसानी से नहीं दिखाते। लेकिन उस दिन पहली बार उसने अपने ससुर के अंदर छुपा अकेलापन महसूस किया।
उधर परी अब पूरी तरह शांत हो चुकी थी। उसने दादा जी की शर्ट पकड़ ली और उनींदी आंखों से उन्हें देखने लगी।
दयाशंकर जी मुस्कुराए।
“देखा… अब हमारी बिटिया ठीक हो गई।”
पूजा के चेहरे पर भी राहत आ गई।
“सच कहूं पापा जी… अगर आप ना होते ना तो मैं आज बहुत घबरा जाती।”
दयाशंकर जी ने प्यार से कहा—
“घर में बड़े सिर्फ डांटने के लिए नहीं होते बहू… मुश्किल समय में सहारा देने के लिए भी होते हैं।”
इतने में बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।
बिजली भी चली गई।
पूरा घर हल्के अंधेरे में डूब गया।
पूजा मोमबत्ती लेने जाने लगी तो दयाशंकर जी बोले—
“रुको, हमें पता है कहां रखी है।”
वो बिना लड़खड़ाए सीधे स्टोर रूम गए और मोमबत्ती निकाल लाए।
पूजा मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।
“आपको घर की हर चीज याद रहती है।”
दयाशंकर जी हंस पड़े।
“तुम्हारी सास रोज डांटती थीं कि ‘कुछ याद भी रखा करो।’ बस उसी डर में सब याद हो गया।”
दोनों हल्का हंस पड़े।
बरसात और अंधेरे के बीच घर में एक अजीब-सी गर्माहट महसूस हो रही थी।
रात को पूजा खाना परोस रही थी तभी दयाशंकर जी ने पूछा—
“तुमने खाना खाया?”
पूजा बोली—
“पहले आप खा लीजिए।”
दयाशंकर जी थोड़ा सख्त स्वर में बोले—
“ये आदत ठीक नहीं है। घर संभालने वाली अगर खुद का ध्यान नहीं रखेगी तो घर कैसे संभालेगी?”
पूजा चुप हो गई।
उसे अपने पापा की याद आ गई।
खाना खाने के बाद जब वो बर्तन धो रही थी तभी उसने देखा कि दयाशंकर जी चुपचाप परी के छोटे-छोटे कपड़े तह कर रहे हैं।
“अरे पापा जी! रहने दीजिए, मैं कर लूंगी।”
उन्होंने बिना सिर उठाए कहा—
“तुम सुबह से लगी हुई हो। थोड़ा काम हम भी कर लेंगे तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ेगा।”
पूजा की आंखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा—
“हर लड़की को आप जैसे ससुर मिलें तो शायद कोई बेटी ससुराल जाने से ना डरे।”
दयाशंकर जी कुछ नहीं बोले।
बस हल्का मुस्कुरा दिए।
रात काफी हो चुकी थी।
पूजा परी को सुलाकर अपने कमरे में चली गई।
लेकिन दयाशंकर जी अभी भी जाग रहे थे।
वो ड्रॉइंग रूम में टंगी पत्नी की तस्वीर के सामने जाकर खड़े हो गए।
कुछ देर तक तस्वीर को देखते रहे।
फिर धीमे से बोले—
“देखो शारदा… बहू बहुत अच्छी है। बस नई जिम्मेदारियों से डर जाती है।”
उनकी आंखें भर आईं।
“तुम्हारे जाने के बाद सोचता था घर सूना हो जाएगा… लेकिन ये बच्ची फिर से घर में रौनक ले आई।”
उन्होंने तस्वीर के सामने रखा छोटा सा दिया ठीक किया।
तभी पीछे से हल्की आवाज आई—
“पापा जी…”
उन्होंने मुड़कर देखा।
पूजा खड़ी थी।
“नींद नहीं आई?”
उन्होंने पूछा।
पूजा धीरे से बोली—
“पानी लेने उठी थी… फिर आपको यहां देख लिया।”
दयाशंकर जी जल्दी से अपनी आंखें पोंछने लगे।
लेकिन पूजा समझ चुकी थी।
वो पास आकर बोली—
“आप अकेले नहीं हैं।”
बस इतना सुनते ही दयाशंकर जी की आंखें फिर भर आईं।
उन्होंने पहली बार खुलकर कहा—
“कभी-कभी बहुत याद आती है उसकी।”
पूजा ने धीरे से कहा—
“मां कहीं नहीं जातीं पापा जी… वो बस लोगों के व्यवहार में रह जाती हैं।”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
फिर अंदर कमरे से परी की हल्की हंसी सुनाई दी।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और मुस्कुरा दिए।
जैसे उस छोटी-सी बच्ची ने घर के हर दर्द को थोड़ी देर के लिए हल्का कर दिया हो।

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